کتابخانه:اخلاق اسلامی (ریا): تفاوت بین نسخهها
(اصلاح نویسههای عربی) |
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مـسـاءله اخلاق و تهذيب نفس ، در اسلام ، از اهميت بسيار بالايى برخوردار است ، بطورى كه از اهـداف نـزول قـرآن كـريم تربيت اخلاقى ، تهذيب انسان و رشد و هدايت جامعه است و خصلتهاى اخـلاقـى را مـلاك ارزش انسان مى داند؛ زيرا در مقام ستايش وتمجيد پيامبران الهى ، آنان را به جـهـت دارا بـودن صـفـات اخـلاقـى نـيـكـو مـى سـتـايـد. بـراى مثال ، حضرت ابراهيم عليه السلام را به خاطر برخوردارى از سه صفت عالى اخلاقى ستوده ، مى فرمايد: | مـسـاءله اخلاق و تهذيب نفس ، در اسلام ، از اهميت بسيار بالايى برخوردار است ، بطورى كه از اهـداف نـزول قـرآن كـريم تربيت اخلاقى ، تهذيب انسان و رشد و هدايت جامعه است و خصلتهاى اخـلاقـى را مـلاك ارزش انسان مى داند؛ زيرا در مقام ستايش وتمجيد پيامبران الهى ، آنان را به جـهـت دارا بـودن صـفـات اخـلاقـى نـيـكـو مـى سـتـايـد. بـراى مثال ، حضرت ابراهيم عليه السلام را به خاطر برخوردارى از سه صفت عالى اخلاقى ستوده ، مى فرمايد: | ||
| − | (إِنَّ اِبْراهيمَ لَحَليمٌ اَوّاهٌ مُنيبٌ) | + | (إِنَّ اِبْراهيمَ لَحَليمٌ اَوّاهٌ مُنيبٌ)<ref>هود، آيه 75</ref> |
همانا ابراهيم بردبار، بسيار مهربان و بازگشت كننده (به سوى خدا) بود. | همانا ابراهيم بردبار، بسيار مهربان و بازگشت كننده (به سوى خدا) بود. | ||
| سطر ۲۵: | سطر ۲۵: | ||
درباره پيامبر اكرم (ص ) مى فرمايد: | درباره پيامبر اكرم (ص ) مى فرمايد: | ||
| − | (وَإِنَّكَ لَعَلى خُلُقٍ عَظيمٍ) | + | (وَإِنَّكَ لَعَلى خُلُقٍ عَظيمٍ)<ref>قلم ، آيه 4</ref> |
همانا تو صاحب اخلاق عظيم و برجسته اى هستى . | همانا تو صاحب اخلاق عظيم و برجسته اى هستى . | ||
| سطر ۲٬۰۸۰: | سطر ۲٬۰۸۰: | ||
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نسخهٔ ۲۶ آذر ۱۳۹۵، ساعت ۱۹:۴۶
اخلاق اسلامي موضوع : اخلاق اسلامي تهيه کننده :مرکز تحقيقات اسلامي سپاه تاريخ انتشار : 1375 پاييز اخلاق اسلامي: [برگزيده] الهامي نيا، علي اصغر، پدیدآور:الهامي نيا، علي اصغر، 1336- عنوان:اخلاق اسلامي: [برگزيده] [منبع الكترونيكي] / علي اصغر الهامي نيا، نعمت الله يوسفيان؛ تهيه كننده مركز تحقيقات اسلامي سپاه. ناشر:موسسه تحقيقات و نشر معارف اهل البيت (ع) توصیف ظاهری:1 متن الكترونيكي: بايگاني HTML؛ داده هاي الكترونيكي (59 بايگاني: 296.1KB) یادداشت:كتابنامه موضوع:اخلاق اسلامي. شناسه افزوده:يوسفيان، نعمت الله، 1340- نويسنده همكار. شناسه افزوده:سپاه پاسداران انقلاب اسلامي. نمايندگي ولي فقيه پژوهشكده تحقيقات اسلامي.
محتویات
جايگاه اخلاق در اسلام
مـسـاءله اخلاق و تهذيب نفس ، در اسلام ، از اهميت بسيار بالايى برخوردار است ، بطورى كه از اهـداف نـزول قـرآن كـريم تربيت اخلاقى ، تهذيب انسان و رشد و هدايت جامعه است و خصلتهاى اخـلاقـى را مـلاك ارزش انسان مى داند؛ زيرا در مقام ستايش وتمجيد پيامبران الهى ، آنان را به جـهـت دارا بـودن صـفـات اخـلاقـى نـيـكـو مـى سـتـايـد. بـراى مثال ، حضرت ابراهيم عليه السلام را به خاطر برخوردارى از سه صفت عالى اخلاقى ستوده ، مى فرمايد:
(إِنَّ اِبْراهيمَ لَحَليمٌ اَوّاهٌ مُنيبٌ)[۱]
همانا ابراهيم بردبار، بسيار مهربان و بازگشت كننده (به سوى خدا) بود.
درباره پيامبر اكرم (ص ) مى فرمايد:
(وَإِنَّكَ لَعَلى خُلُقٍ عَظيمٍ)[۲]
همانا تو صاحب اخلاق عظيم و برجسته اى هستى .
در اهـمـيـت اخـلاق و تـزكـيـه نـفـس هـمـيـن بـس كـه قـرآن كـريـم رمـز مـوفـقـيـت رسـول خدا(ص ) را در ايفاى رسالت خويش و گسترش توحيد، اخلاق نيكوى آن حضرت مى داند و مى فرمايد:
(فـَبـِمـا رَحـْمـَةٍ مـِنَ اللّهِ لِنـْتَ لَهـُمْ وَلَوْ كـُنـْتَ فـَظـّاً غـَليـظَ الْقـَلْبِ لاَ نـْفـَضُّوا مـِنـْ حَوْلِكَ)(6)
در پرتو رحمت الهى ، تو بامردم مهربان شدى ، در حالى كه اگر خشن ، تندخو و سنگدل بودى از اطراف تو پراكنده مى شدند.
با دقت در روايات اسلامى و زندگانى معصومين عليهم السلام به خوبى در مى يابيم كه تمام شؤ ون زندگى آن بزرگواران ، مظهر تجلّى صفات اخلاقى و خصلتهاى ارزنده انسانى بوده و بـه تـمـام مـعـنـا اخـلاق الهـى را در وجـودشـان بـه كـمـال رسـانـدنـد و پـرچـمـدار تـقـوا، فضايل و اخلاق پسنديده انسانى شدند.
با توجه به اينكه انسان موجودى با اراده و مختار است ، بايد آگاهانه و آزادانه در پى اجراى دسـتـورات الهـى قـيـام كـنـد و ايـن گـونـه حـركـت ، بـا وضـع قـوانـيـن خـشـك و اعـمـال قـدرت تـحـقـق نـمـى يـابـد، بلكه بايد انگيزه لازم در انسان پديد آيد تا انسان بدون احـسـاس فشار وتنگنا در اين راستا قيام كند و اين انگيزه را ايمان و اخلاق پديد مى آورد و قوّت مـى بـخـشـد و قـوانـيـن الهـى در كـنـار ارزشـهـاى اخـلاقـى قابل اجراء مى گردد. بنابراين ارزشهاى اخلاقى نگهبان دين و ضامن اجراى قوانين خواهند بود.
بـعـلاوه ، رشـد وتـكـامـل ديـنى بشر نبايد در حدّ اجراى قوانين الهى متبلور در واجب و حرام متوقف شود، از اين رو، تكامل دينى بيشتر، نيازمند ارزشهايى فراتر از حد ضرورت شريعت است و آن ارزشها در اخلاق نمودار مى گردد.
رسول خدا صلى الله عليه وآله فرمود:
(اَلاَْخْلاقُ وِعاءُالدّينِ)(7)
اخلاق ظرف دين است .
(يعنى دين در ظرف اخلاق پديد مى آيد، رشد مى كند و باقى مى ماند) و حتى بعضى از احاديث ، داشـتـن فـضـايل انسانى و اخلاق نيكو را، مساوى با تمام دين يا نصف دين دانسته و از ريشه دار بـودن آن در ديـن وتـعاليم دينى پرده بر مى دارد، بگونه اى كه آن را از بخششهاى الهى مى شمارد. پيامبر اكرم (ص ) فرمود:
(اَلاَْخْلاقُ مَنايِحُ مِنَ اللّهِ عَزَّ وَجَلَّ ...)(8)
اخلاق ، بخششهايى از خداوند بزرگ است ... .
ارزشهاى اخلاقى ، صرف نظر از جنبه مذهبى از ضروريات زندگى يك جامعه سعادتمند است . امير مؤ منان على عليه السلام در اين باره مى فرمايد:
(لَوْكـُنـّا لانـَرْجـُوا جـَنَّةً وَلا نـَخـْشـى نـاراً وَلا ثـَوابـاً وَلا عِقاباً لَكانَ يَنْبَغى لَنا اَنْ نُطالِبَ بِمَكارِمِ الاَْخْلاقِ فَإِنَّها مِمّا تَدُلُّ عَلى سَبيلِ النَّجاحِ)(9)
اگـر بـه بـهـشـت و ثـواب (آخـرت ) امـيدوار نباشيم و از آتش و عذاب (جهنم ) نهراسيم ، باز هم شـايـسـتـه اسـت كـه فـضـيـلتـهـاى اخـلاقـى را طـلب كـنـيـم ؛ زيـرا فضايل اخلاقى ، از چيزهايى است كه مارا به راه رستگارى هدايت مى كند.
ضرورت اخلاق و خودسازى
در دنياى امروز، انسانيت و ارزشهاى اخلاقى درمسلخ تمدن جديد و فرهنگ پَست آن قربانى شده ، بـى بـنـد و بارى و افسار گسيختگى جايگزين آن گرديده است و اين امر چنان روشن است كه احـتـيـاج بـه تـوضـيـح نـدارد و هـر آگاه دلى مى تواند نتايج زيانبار آن را حتى در جامعه هاى اسلامى نيز مشاهده كند و پيامدهاى ويرانگر آن را بروشنى دريابد.
بـراى سـعـادتـمـند شدن و نجات از گرفتاريهاى فردى واجتماعى كه بر اثر فراموش كردن اصـول اخـلاقـى اسـلام ، گـريـبـانگير انسان مى شود، برهمه بويژه جوانان عزيز لازم است ، كـوشـش كـرده ، ارزشـهـاى اصـيـل اخـلاقـى را آمـوخـتـه و بـه كـار بـنـدنـد و از رذايـل اخـلاقـى پـرهيز كنند تا غرور جوانى ، آنان را به ورطه هلاكت ، گرفتار نكند و بدانند كـه اسـلام ، بـراى سـعـادتـشـان برنامه دارد و اگر خود را به اسلام مقيّد كنند و به ارزشهاى اخلاقى بيارايند خداى تعالى نيز از آنان خشنود خواهد شد. پيامبر اكرم (ص ) فرمود:
(إِنَّ لِلّهِ تـَعـالى مـَلَكـاً يـَنـْزِلُ فـى كـُلِّ لَيـْلَةٍ فـَيـُنـادى : يـا اَبـْنـاءَ الْعـِشـْريـنَ جـِدُّوا وَاجْتَهِدُوا)(10)
خداى متعال را فرشته اى است كه هر شب فرود آمده ، ندا مى دهد: اى جوانان بيست ساله ! كوشش كنيد و (براى نيل به كمال و سعادت خود) مجاهده نماييد.
آغاز سنين جوانى ، بهار به دست آوردن فضيلتهاى انسانى است .
على عليه السلام در نامه خود به امام حسن مجتبى عليه السلام فرمود:
(... إِنَّما قَلْبُ الْحَدَثِ كَالاَْرْضِ الْخالِيَةِما اُلْقِىَ فيها مِنْ شَىْءٍ قَبِلَتْهُ فَبادَرْتُكَ بِالاَْدَبِ قَبْلَ اَنْ يَقْسُوَ قَلْبُكَ...)(11)
دل نوجوان ، مانند زمين خالى است كه هر بذرى در آن افشانده شود، مى پذيرد. از اين رو، پيش از آنكه (عمر زيادى برتو بگذرد و) دلت سخت گردد، به ادب و تربيت تو پرداختم ...
درجاى ديگر به همه جوانان خداجو و آرمان خواه سفارش مى كند:
-(يامَعْشَرَالْفِتْيانِ، حَصِّنُوا اَعْراضَكُمْ بِالاَْدَبِ...)(12)
اى قشر جوان ! آبروى خويش را با ادب حفظ كنيد... .
امام خمينى قدس سرّه نيز خطاب به جوانان مى فرمايد:
(جـوانـان نـنـشـيـنند كه گرد پيرى سر و روى آنان را سفيد كند. ما به پيرى رسيده ايم و به مـصـايـب و مـشـكـلات آن واقـفيم . شما تا جوان هستيد، مى توانيد كارى انجام دهيد، تا نيرو واراده جـوانى داريد، مى توانيد هواهاى نفسانى ، مشتهيات دنيايى و خواسته هاى حيوانى را از خود دور سـازيـد، ولى اگـر درجـوانى به فكر اصلاح و ساختن خود نباشيد ديگر در پيرى كار از كار گذشته است . تا جوانيد فكر كنيد، نگذاريد پير و فرسوده شويد، قلب جوان لطيف و ملكوتى است ، انگيزه هاى فساد در آن ، ضعيف مى باشد، ليكن هر چه سن بالا رود، ريشه گناه ، در قلب قـويـتـر و مـحـكـمـتـر مـى گـردد، تـا جـايـى كـه كـنـدن آن از دل ، ممكن نيست .)(13)
روش اخلاقى قرآن
بـراى حـاكـمـيـت اخـلاق نـيـكو در جامعه مى توان به درمان بيماريهاى اخلاقى پرداخت و نيز مى تـوان اقـدام بـه بـهداشت اخلاقى و پيشگيرى از پيدايش ناهنجاريهاى اخلاقى كرد. روش قرآن ايـن اسـت كـه بـا تـربـيـت ديـنـى و رشـد ايـمـان واعـتـقـاد بـه خـدا جـلو پـيـدايـش رذايل اخلاقى را مى گيرد و به عبارت ديگر، روش قرآن بهداشت وپيگيرى روحى واخلاقى است ، نـه آنـكـه اجـازه دهد بيماريهاى اخلاقى پديد آيد و به درمان آن بپردازد، البته اسلام براى زشـتـيـهـاى اخـلاقـى راه درمان را نيز نشان داده است ؛ اما در آغاز اقدام به جلوگيرى ازپيدايش و رشد ناهنجاريهاى اخلاقى مى كند و همواره پيشگيرى آسانتر و بهتر از درمان بيمارى است .
(اسـلام از آغـاز دل انـسـان را بـا ايـمـان و عـشق به خدا پر مى كند. نتيجه ايمان به خدانيز جز اعـمـال و صـفـات نـيـكـو نـيـسـت ، پـس روش قـرآن بـر اسـاس تـوحـيـد خـالص و كامل بنا شده است ، توحيدى كه تنها در اسلام ديده مى شود و ضامن اسلام است ).(14)
رابطه اخلاق وايمان
هـمـان گـونـه كـه در درس اوّل بـيان شد، روش قرآن در مورد اخلاق ، بر پايه ايمان و توحيد ناب ، استوار است ؛ به اين معنا كه ايمان ، پشتوانه اخلاق و ارزشهاى اخلاقى است و ارزشهاى اخلاقى نيز، بدون پشتوانه ايمان ، در اثر تغيير شرايط، زود از هم مى پاشد.
اكـنـون بـبـينيم ، ايمان چيست ؟ چه آثارى دارد؟ و چگونه پشتوانه اخلاق و صفات اخلاقى است ؟ به عبارت ديگر، ارتباط اخلاق و ايمان چگونه است ؟
ايمان چيست ؟
ايـمـان در لغـت بـه مـعـنـى (گـرويـدن )(15) و (تـسـليـم تـواءم بـا اطـمـيـنـان خاطر)(16) است . ايمان مربوط به دل و اعتقاد است . چنانكه عده اى از اعراب باديه نشين ، خدمت پيغمبر اكرم صلى الله عليه و آله آمده ، گفتند:
يا رسول الله ! ايمان آورديم ، آيه نازل شد:
(قـالَتِ الاَْعـْرابُ امـَنـّا قـُلْ لَمْ تـُؤْمـِنـُوا وَلكـِنْ قـُولُوا اَسـْلَمـْنـا وَلَمـّا يـَدْخـُلِ الاْ يـمـانُ فـى قُلُوبِكُمْ)(17) بـاديـه نـشـيـنان (به رسول خدا) گفتند ايمان آورديم . (اى پيامبر! به آنان ) بگو: شما ايمان نـيـاورده ايـد و ليـكـن بـگـويـيـد اسـلام آورديـم و ايـمـان هـنـوز در دل شما وارد نشده است .
از ايـن آيـه مـى فهميم كه ايمان در اصطلاح قرآن ، واقعيت و حقيقتى مربوط به قلب انسان است نـه مـربـوط بـه بـدن انـسـان ، نه مربوط به پيشانى انسان كه آثار سجده داشته باشد يا نـداشـتـه بـاشد و نه مربوط به زبان انسان كه ذكر خدا بگويد يا نگويد، بلكه به ريشه اين امور كه يك حالت قلبى ، فكرى و اعتقادى است ، مربوط مى شود.(18)
ايـمـانـى كـه اسـاسـى تـريـن گـام در راه اخلاق و معيار تمام ارزشهاى انسانى و حلقه ارتباط انـسـان بـا خـداسـت ، مـجـمـوعـه اى از ايـمـانـهاى هماهنگ و پيوسته (به خدا، پيامبران ، كتابهاى آسـمـانـى ، فـرشـتـگـان الهى ، روز قيامت و مانند آن ) است كه قرآن كريم ، همه آنها را در كلمه (ايمان به غيب ) خلاصه كرده است ، آنجا كه مى فرمايد:
(ذلِكَ الْكِتابُ لارَيْبَ فيهِ هُدىً لِلْمُتَّقينَ الَّذينَ يُؤْمِنُونَ بِالْغَيْبِ)(19)
اين همان كتابى است كه در آن هيچ شكى نيست . پرهيز كاران را راهنماست ، آنان كه به غيب ايمان دارند.
افـراد پرهيزكار كسانى هستند كه در پرتو ايمان به غيب ، به اخلاق و آداب الهى خوگرفته انـد و آن ايـمـان (بـه غـيـب و حقايق نهانى ، ايمان به خدا و صفات او، ايمان به امدادهاى غيبى و مـانـنـد آن ) طـورى آنـان رادگـرگـون ، و مـشـتـاق فـضـايـل انـسـانـى ، كـمـال معنوى و قرب الهى كرده كه به آسانى فرمانبردار فرمانهاى الهى و بزرگان دين مى شـونـد. ريـشـه ايـن فضايل در روح انسان به امانت نهاده شده و در اخلاق و رفتار او تجلّى مى يابد.
على عليه السلام مى فرمايد:
(اءَلاْ يمانُ مَعْرِفَةٌ بِالْقَلْبِ وَإِقْرارٌ بِاللِّسانِ وعَمَلٌ بِاْلاَْرْكانِ)(20)
ايمان شناختى است با قلب ، اقرارى است با زبان و عملى است با اندام .
همچنين مى فرمايد:
(اَصْلُ الاْ يمانِ، حُسْنُ التَّسْليمِ لاَِمْرِاللّهِ)(21)
ريشه ايمان ، خوب تسليم شدن در برابر فرمان خداست .
آثار ايمان
ايمان ، سبب پيدايش صفات اخلاقى و پايدارى آن در فرد و اجتماع مى شود و آثار بسيار مهمّى در سعادت انسان دارد. اينك بعضى از آن آثار را بيان مى كنيم :
الف ـ احـسـاس عـشق و دلگرمى : كسى كه ايمان به خدا دارد و مى داند تمام كارهايش زير نظر اسـت و هـيـچ عـمـلى از او نابود نمى شود و خدا با قيمت بهشت و رضوان ، خريدار تلاش اوست و حـتـى گـاهـى بـدون تلاش و تنها به خاطر حُسن نيّت انسان ، اجر و پاداش مرحمت مى كند؛ چنين شخصى ، در راه كسب فضايل و رسيدن به سعادت و رضاى خدا، با عشق و دلگرمى ، زندگى مى كند و از اين همه تلاش و كوشش ، احساس لذّت مى كند.(22)
ب ـ آرامش روح و جسم : ايمان مايه آرامش روح و جسم بوده ، نگرانى را از انسان دور مى كند. نگرانى گاهى بر اثر گناهان و لغزشهاى گذشته است كه ايمان به غيب و يادخداى آمرزنده و رحـيم ، آن را به آرامش تبديل مى كند؛ زيرا او گناهان را بخشيده و توبه را مى پذيرد. گاهى ريـشـه دلهـره ، احـسـاس تنهايى است كه ايمان به خداى حاضر و ناظر، اين دلهره را به آرامش تـبـديـل مـى كـنـد؛ زيرا، او همدم انسان بوده ، حرفش را شنيده ، كارش را مى بيند و نسبت به او مـهـربـان است . گاهى اضطراب و نگرانى به خاطر احساس پوچى و بى هدفى است كه ايمان به خداى حكيمى كه در اين عالم ، هر چيزى را طبق حكمت و براى هدفى آفريده ، اين اضطراب را نـيـز بـر طـرف مـى كند. گاهى ناراحتى به خاطر آن است كه انسان در راضى كردن همه افراد مـوفـق نـشـده و نـاراحت است كه چرا فلان شخص ، يا فلان گروه را از خود رنجانده است ، ولى ايمان به اينكه فقط بايد خدا را راضى كرد و عزت و ذلّت به دست اوست ، اين نگرانى را نيز از بين مى برد.(23)
قرآن كريم اين حقيقت را چنين بيان كرده است :
(اءَلا بِذِكْرِاللّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ)(24)
آگاه باشيد با ياد خدا دلها آرام مى شود.
ج ـ دورى از رذايل اخلاقى : كسى كه خود را د رمحضر خدا مى داند، از انحرافات اخلاقى ، دورى كرده و دل خود را آماج زشتيها قرار نمى دهد.
على عليه السلام مى فرمايد:
(اَلْمُؤْمِنُ مَنْ طَهَّرَ قَلْبَهُ مِنَ الدَّنِيَّةِ)(25)
مؤ من كسى است كه دلش را از پستى پاك كرده است .
د ـ صـبـر و پـايـدارى : چـهـارمـين اثر ايمان ، صبر در برابر گرفتاريها، اطاعت و بندگى و گناه مى باشد. شخص مؤ من در اثر ايمان به خدا و امدادهاى غيبى همچون دژى استوار در برابر ناملايمات زندگى صبر كرده ، ايمان خود را حفظ مى كند.
اميرمؤ منان على (ع ) فرمود:
(اَلصَّبْرُ ثَمَرَةُ الاْ يمانِ)(26)
صبر، ميوه ايمان است .
براى مثال ، در يكى از جنگهاى صدر اسلام ، دوازده نفر از سربازان اسلام ، اسير روميها شدند و آنـان را بـه مـركـز كـشـور، نـزد امـپـراتـور بـردنـد. امـپـراتـور دربـاره شـكـل و اخـلاق آنـان فكر مى كرد كه چگونه با نيروى اندك همه جا پيروز مى شوند؟ به آنان گـفـت : اگـر سـربـازان مـرا طـورى تـربـيـت كـنـيـد كـه مثل شما شوند، من در عوض ، حقوق بسيارى به شما خواهم داد. گفتند: دين ما به ما اجازه نمى دهد كه به شما كمك كنيم و اين آيه را خواندند:
(قالَ رَبِّ بِما اَنْعَمْتَ عَلَىَّ فَلَنْ اَكُونَ ظَهيراً لِلْمُجْرِمينَ)(27)
گفت پروردگارا! به وسيله نعمتهايى كه به من عطا كردى ، هرگز پشتيبان گناهكاران نخواهم بود. امـپـراتـور دسـتـور داد، آنـهـا را بـه كـليـسا ببرند و دختران زيبا را به آنها نشان بدهند، (به نـمـايـش بـگـذارنـد) اگـر بـه آنـان عـلاقـه مـنـد شـدنـد، وعـده وصل بدهند، به شرطى كه پيشنهاد امپراتور را بپذيرند.
آنـهـا را بـه كـليـسـا بـردنـد، چـون چـشمشان به دختران زيبا افتاد، چشمها را به زير افكنده ، گفتند: اينجا شهوتخانه است ، نه پرستشگاه .
بـه امـپراتور خبر دادند كه آنها به دخترها، ميلى پيدا نكرده ، از آنان رو گرداندند. گفت : به آنـهـا بـگـوييد: اگر پيشنهاد مرا نپذيريد، شما را مى كشم . همه باخوشحالى گفتند: آرزوى ما كـشـتـه شـدن در راه خداست ؛ زيرا پيغمبر ما فرموده اگر در بستر بميريد، ممكن است به بهشت بـرويـد و مـمـكـن اسـت نـرويـد، ولى اگـر در راه خـدا كـشـتـه شـويـد، بـدون شـك اهل بهشت خواهيد بود.(28)
ايمان ، اين گونه صبر و مقاومت سربازان اسلام را در برابر ترفندهاى دشمن ، شكوفا ساخت و عزّت اسلام و پيروان واقعى اش را به نمايش گذاشت .
هـ تحكيم برادرى و روابط اجتماعى : ايمان روح برادرى را در جامعه ايجاد كرده ، پايدارى مى بـخـشد. مؤ منان بر اثر ايمان ، با اخلاق پسنديده ، مهربانى و نرمخويى با همنوعان خود اُنس مى گيرند، در برابر آنان متواضعند، وظايف خود را در برابر آنها انجام داده ، حقوق همديگر را محترم مى شمارند.
قرآن كريم مى فرمايد:
(إِنَّماَالْمُؤْمِنُونَ إِخْوَةٌ)(29)
به درستى كه ، مؤ منان با هم برادرند.
شهيد مطهرى در اين باره مى نويسد:
(آن چيزى كه بيش از هر چيز حق را محترم ، عدالت را مقدّس ، دلها را به يكديگر مهربان و اعتماد مـتـقـابـل را مـيـان افـراد بر قرار مى سازد، تقوا و عفاف را تا عمق وجدان آدمى نفوذ مى دهد، به ارزشـهـاى اخـلاقـى اعـتـبـار مـى بخشد، شجاعت مقابله با ستم ايجاد مى كند و همه افراد را مانند اعضاى يك پيكر به هم پيوند مى دهد و متحد مى كند، ايمان مذهبى است .)(30)
رابطه اخلاق و ايمان
تـرديـدى نـيـسـت كـه دنـيـاى امـروز، بـر اثـر بـى پـنـاهـى و بـى ايـمـانـى مـى سـوزد. اگـر نـسـل جـوان در بـرابـر فرهنگ پست دنياى استكبار، ايمان واعتقاد به خدا داشته و خود را بنده او بداند، اعتمادش به او باشد و خود را از افسار گسيختگى و بى بند و بارى ، نجات داده و به وظـايـف بـنـدگى خود عمل كند، استعدادها و نيروهاى باطنى او، شكوفا مى شود. بخشش الهى و زيـنـت انـسـانـى كـه هـمـانـا داشـتـن اخـلاق پـسـنـديـده و سـجـايـاى اخـلاقـى اسـت ، شـامـل حالش مى گردد، بطورى كه پناهگاه مطمئن پيدا كرده و در بن بستهاى زندگى ، تن به خودكشى ، اعتياد، فحشا و مانند آن نمى دهد.
دشـمـنـان اسـلام ، هـمـواره ايمان ملّتها، بويژه نسل جوان را، نشانه گرفته و مى خواهند آن نور الهـى را خـامـوش كـنـنـد. بـديـهـى اسـت كـه وقـتـى چـراغ ايـمـان ، در دلهـا خـامـوش شـد، اصـول انـسـانـى و ارزشهاى والاى اخلاقى ، زود ضربه پذير گشته و از هم مى پاشد؛ زيرا اخـلاق و ايـمـان ، رابـطـه مـتـقابل با همديگر دارند.ايمان مانند درختى است كه اخلاق پسنديده و خـصـلتـهـاى پـاك انـسانى نظير سخاوت ، شجاعت ، عدالت ، عفت ، صبر و شكيبايى و... شاخ و بـرگـهـاى آن هـسـتـنـد. وقـتى اصل درخت از ريشه خشكيد، شاخه هايش نيز خشكيده ، بى ثمر مى گردد و برگهايش نيز به زمين ريخته ، لگدمال مى شود.
از آنچه بيان شد، معلوم مى شود كه ايمان ، پشتوانه اخلاق پسنديده است و بدون آن ارزشهاى اخـلاقـى فـرو مـى پاشد. اخلاق به وسيله ايمان ضمانت شده و ايمان نيز به وسيله اخلاق حفظ مـى گـردد. ايـمان در اخلاق و رفتار انسان تجلّى كرده و اخلاق نيز ايمان را تقويت كرده ، رشد مـى دهـد و بـه كـمـال مـى رسـانـد. بـا وجـود ايـمـان ، دلهـا ازتـاخـت و تاز خواسته هاى حيوانى وانحرافات اخلاقى ايمن مانده ، حفظ مى شود.
ايـنـك بـراى تـكـمـيـل بحث (ارتباط اخلاق و ايمان )به چند حديث از اميرمؤ منان على عليه السلام اشاره مى كنيم :
(اَلاْ يمانُ شَجَرَةٌ، اَصْلُهاَالْيَقينُ، وَفَرْعُهَاالتُّقى وَنُورُهَا الْحَياءُ وَثَمَرُهَا السَّخاءُ)(31)
ايمان درختى است كه ريشه اش يقين ، شاخه اش تقوا، شكوفه اش حيا و ميوه اش سخاوت است .
(رَاءْسُ الاْ يمانِ حُسْنُ الْخُلْقِ وَالتَّحَلّى بِالصِّدْقِ)(32)
خوش اخلاقى و به راستى آراسته بودن ، سرِ ايمان است .
(اَكْمَلُكُمْ ايماناً اَحْسَنُكُمْ اَخْلاقاً)(33)
كاملترين شما از نظر ايمان ، نيكوترين شما از حيث اخلاق است .
حُسن خُلق
از آنجا كه مراد از اخلاق ، مجموع ملكات و خصلتهاى باطنى است و ملكات اخلاقى نيز ممكن است ، صـفـاتـى نـيـك يا بد باشند، اخلاق ، به تمام خصلتهاى باطنى اطلاق مى گردد. بنابراين ، خلقهاى نفسانى دو گونه است :
1ـ خُلق حَسَن : يعنى خوى و طبع نيك ، خُلق خوش .
2ـ خـُلق سـَيِّى ءْ و زشـت : آن حـالت نـفـسـانـى كـه شـخـص را بـر اعمال ناشايست وادار مى كند، خلق سَيِّى ء ناميده مى شود در اين باره پس از بيان (حسن خلق ) و فضايل اخلاقى ، به تفصيل ، توضيح خواهيم داد.
اهميت حُسن خلق
قـرآن كـريـم كـه كـتـاب انـسـان سـازى اسـت و بـراى رشـد، تـرقـى و تـربـيـت انـسـان نازل شده است ، تزكيه را يكى از اهداف بعثت پيامبر، شمرده ، مى فرمايد:
(لَقـَدْ مَنَّ اللّهُ عَلَى الْمُؤْمِنينَ إِذْ بَعَثَ فيهِمْ رَسُولاً مِنْ اَنْفُسِهِمْ يَتْلُوا عَلَيْهِمْ اياتِهِ وَ يُزَكّيهِمْ وَ يُعَلِّمُهُمُ الْكِتابَ وَالْحِكْمَةَ... )(34)
خـداونـد بر مؤ منان منّت نهاد (نعمتى بزرگ بخشيد) هنگامى كه درميان آنان پيامبرى از خودشان برانگيخت كه آيات او را بر آنها بخواند و پاكشان كند و كتاب و حكمت به آنها بياموزد... .
همچنين رستگارى را در پرتو تزكيه نفس دانسته ، مى فرمايد:
(وَنـَفـْسٍ وَمـا سـَوّيـهـا. فـَاَلْهـَمـَهـا فـُجـُورَهـا وَتـَقـْويـهـا. قـَدْ اَفـْلَحَ مـَنْ زَكـّيها. وَقَدْ خابَ مَنْ دَسّيها)(35)
سـوگند به نفس و آنچه موزونش ساخته است و زشتيها و پرهيزگاريهايش را به او الهام كرد، به تحقيق هر كس آن را تزكيه كرد، رستگار است و هر كه آن را آلوده ساخت زيانكار است .
بـانـگاهى به زندگى اولياى گرامى اسلام وتاءمل در سخنان گهربار آنان ، به اهميت اخلاق نـيـك و تـزكـيـه نـفـس ، بـيـشـتـر پـى بـرده ، گـسـتـردگـى مسائل اخلاقى را نه تنها در گفتار، بلكه درتمام شؤ ون فردى و اجتماعى آنان مشاهده مى كنيم . تمام وجودشان را سجاياى اخلاقى و خصلتهاى نيك فرا گرفته است . آنان اخلاق الهى را به تـمـام مـعـنا در وجود خود به كمال رسانده و مظهر تجلّى (اَخلاقُ اللّه ) و (آدابُ اللّه ) گشته اند.
آنان براى رسيدن به مقامات بالاتر اخلاقى ، از درگاه خدا، استمداد مى كردند. چنانكه پيامبر اكرم (ص ) از خدا مى خواست :
(اَللّهُمَّ اهْدِنى لاَِحْسَنِ الاَْخْلاقِ...)(36)
خداوندا! به نيكوترين اخلاق هدايتم كن ...
(اَللّهُمَّ كَما حَسَّنْتَ خَلْقى فَحَسِّنْ خُلْقى )(37)
خداوندا! همان گونه كه مرا نيكو آفريدى ، خلق مرا (نيز) نيكو گردان .
اولياى گرامى اسلام براى پيروان خود، نقش و ارزش اخلاق را در دين يادآور شده ، آنان را به اخلاق نيكو تشويق مى كردند.
پيامبر اكرم (ص ) مى فرمايد:
(اَلاِْسْلامُ حُسْنُ الْخُلْقِ)(38)
اسلام خوش خلقى است .
درجاى ديگر مى فرمايد:
(تَخَلَّقُوا بِاءَخْلاقِ اللّهِ)(39)
خودتان را به اخلاق الهى بياراييد.
امام صادق عليه السلام فرمود:
(إِنْ اُجِّلْتَ فـى عـُمـْرِكَ يـَوْمـَيـْنِ فـَاجـْعـَلْ اَحـَدَهـُمـا لاَِدَبـِكَ لِتـَسـْتـَعـيـنَ بـِهِ عـَلى يـَوْمـِ مَوْتِكَ)(40)
اگـر درعـمرت دو روز مهلت يافتى ، يك روزش را به فراگرفتن ادب و تربيت اختصاص بده تا روز مرگت ، از آن كمك بگيرى .
نمونه هايى از رفتار معصومين (ع )
مـعـصـومـيـن عـليـهـم السلام درتمام شؤ ون زندگى و تمام صحنه هاى اجتماعى ، سياسى و حتى نظامى موازين اخلاقى را رعايت مى كردند و درهمه زمينه ها نيكوترين الگوى پيروان خود هستند. در اينجا به دو نمونه از رفتار پيامبر اكرم (ص ) اشاره مى كنيم :
(عـدى ) فرزند حاتم طايى كه مشتاق ديدار رسول خدا صلى الله عليه وآله بود، وارد مدينه شـد و سـراغ آن حـضـرت رفـتـه و او را در مـسـجـد يـافت . در برابر آن حضرت نشست و خود را معرفى كرد. وقتى پيامبر او را شناخت ، از جاى خود برخاست ، دستش را گرفته ، به خانه خود برد. او مى گويد:
(در نـيـمـه راه پـيـرزنـى جـلو راه او را گـرفـت و بـا او سـخـن گـفـت . مـن ديـدم كـه بـا كـمـال فـروتـنـى بـه سـخنان پيرزن گوش مى دهد و به او پاسخ مى گويد. مكارم اخلاق او مـرامـجـذوب وى ساخت و با خود گفتم كه او هرگز فرمانروايى عادى نيست . وقتى وارد خانه او شـدم ، زنـدگـى سـاده وى تـوجـه مـراجـلب كـرد... از فـروتـنـى او غرق حيرت شدم و از اخلاق پـسـنـديـده و مـلكـات فـاضـله و از احـتـرام فـوق العـاده اى كـه نـسـبـت بـه تـمـام افـراد بـشـر قايل است ، دريافتم كه او فرد عادى و فرمانرواى معمولى نيست .)(41)
(روزى شخصى به محضر رسول خدا صلى الله عليه وآله رسيد و هيبت حضرت او را گرفت و زبانش بند آمد و حضرت دست خود را روى سينه او نهاد و فرمود:
بر خود آسان بگير من كه پادشاه نيستم . من فرزند زنى هستم كه با دست خود گوسفند خويش را مى دوشيد).(42)
آثار حُسن خلق
اخـلاق پـسـنـديـده ، آثـار و فـوايـد ارزنـده اى در سـعـادت دنيوى و اخروى انسان دارد و روايات فـراوانـى در ايـن زمـيـنـه ، از پيشوايان اسلام ، نقل شده كه بعضى از آنها را در دو بخش آثار دنيوى و اخروى بيان مى كنيم :
1ـ آثار دنيوى :
بـا تـوجـه بـه سـخـنان اولياى گرامى اسلام در مى يابيم كه حُسْن خلق آثار و فوايد مهمى درانسان واجتماع دارد كه در اينجا به بعضى از آن آثار اشاره مى كنيم :
1ـ عامل عزّت : على عليه السلام فرمود:
( رُبَّ ... ذَليلٍ اَعَزَّهُ خُلْقُهُ)(43)
چه بسا (انسان ) ذليلى كه خلق و خويش او را عزيز كرده است .
2ـ طول عمر: امام صادق عليه السلام فرمود:
(اءَلْبِرُّ وَحُسْنُ الْخُلْقِ... يَزيدانِ فِى الاَْعْمارِ)(44)
نيكى و خوش اخلاقى عمر را زياد مى كنند.
3ـ زياد شدن روزى : امام صادق عليه السلام فرمود:
(حُسْنُ الْخُلْقِ مِنَ الدّينِ وَهُوَ يَزيدُ فِى الرِّزْقِ)(45)
حسن خلق جزئى از دين است و روزى را زياد مى كند.
4ـ تحكيم پيوند دوستى : پيامبر اكرم صلى الله عليه و آله فرمود:
(حُسْنُ الْخُلْقِ يُثْبِتُ الْمَوَدَّةَ)(46)
نيك خلقى ، مودّت و دوستى رامحكم مى گرداند.
5ـ همبستگى و الفت : على عليه السلام فرمود:
(مَنْ حَسُنَ خُلْقُهُ كَثُرَ مُحِبُّوهُ وَانَسَتِ النُّفُوسُ بِهِ)(47)
كسى كه خلقش نيكو باشد، دوستدارانش زياد شده ، انسانها با او اُنس مى گيرند.
ب ـ آثار اُخروى :
خـوش اخـلاقـى آثـار ارزنـده اى در سـعادت اخروى انسان دارد كه دراينجا به برخى از آن آثار اشاره مى كنيم :
1ـ زدودن لغزشها: امام صادق (ع ) فرمود:
(اِنَّ الْخُلْقَ الْحَسَنَ يَميثُ الْخَطيئَةَ كَما تَميثُ الشَّمْسُ الْجَليدَ)(48)
همانا خوش خلقى گناه را ذوب مى كند، چنان كه خورشيد يخ را ذوب مى سازد.
2ـ آسانى حساب : على عليه السلام فرمود:
(... حَسِّنْ خُلْقَكَ يُخَفِّفِ اللّهُ حِسابَكَ)(49)
خلق خود را نيكو گردان تا خداوند حساب تو را (در قيامت ) آسان گيرد.
3ـ برترى درجه : رسول خدا صلى الله عليه وآله فرمود:
(إِنَّ الْعـَبـْدَ لَيـَبـْلُغُ بـِحـُسـْنِ خـُلْقـِهِ عـَظـيـمَ دَرَجـاتِ الاْ خـِرَةِ وَاءَشـْرَفَ الْمـَنازِلِ وَإِنَّه لَضَعيفُ الْعِبادَةِ)(50)
همانا بنده در سايه نيكى خلقش به بلندترين درجات آخرت و عاليترين جايگاهها مى رسد، در حالى كه در عبادت ضعيف و ناتوان است .
فضايل اخلاقى
هـمـان گـونـه كـه روشن شد، حسن خلق ، آثار ارزنده اى در سعادت ابدى انسان دارد. هر كس مى خـواهـد، بـه سـعـادت ابـدى ، دسـت يـابـد، لازم اسـت كـه صـفـحـه دلش را از رذايل اخلاقى و اخلاق ناپسند پاك كرده ، فضايل اخلاقى را جايگزين آن نمايد.
اخـلاق پـسـنـديده ،مجموعه اى از فضايل انسانى است كه انسان را زينت بخشيده ، به رستگارى مـى رسـانـد. ايـنـك فـهـرست برخى از فضايل اخلاقى را با توجه به نياز برادران عزيز در زير مى آوريم :
1ـ فـضـايـلى كـه در ارتـبـاط بـا خـدا و ديـن اسـلام مـطـرح اسـت از قبيل اهميت دادن به نماز، دعا، ذكر، پرهيز از ريا، خوف و رجا، پايدارى در ميدان نبرد، پرهيز از سستى و فرار از جنگ . 2ـ فـضـايـلى كه در ارتباط با خود انسان مطرح است مانند روحيه عزت طلبى ، اغتنام فرصت ، نظم و انضباط، دورى از بيهودگى و چشم پاكى .
3ـ فـضـايـلى كـه در ارتـبـاط بـا ديـگـران مـطـرح است مانند تواضع ، راستى و راستگويى ، بـرادرى و اتـحـاد، مـردم دارى ، رعـايـت احـتـرام امـوال ديـگـران ، فـرو خـوردن خشم ، امانتدارى ، رازدارى ، يارى مظلوم ، صله رحم ، حقوق مربى واستاد و حقوق پدر و مادر.
بد خُلقى
بد خلقى ، ضد حسن خلق است . به همان اندازه كه خوش خلقى ، پسنديده ونيكوست ، بداخلاقى ، نـكـوهـيـده و زشـت اسـت و هـر قـدر حـسـن خـلق جـاذبـه دارد و كمال به حساب مى آيد. بدخلقى دافعه دارد و نقص محسوب مى شود.
نكوهش بد خلقى
بدخلقى ، بدترين همنشين انسان ، نشانه پستى و فرومايگى و مايه بدبختى بوده و خير دنيا و آخرت را از انسان سلب مى كند. از اين رو، درتعاليم اسلامى مورد نكوهش قرار گرفته است .
پيامبر اكرم (ص ) مى فرمايد:
(مِنْ سَعادَةِ الْمَرْءِ حُسْنُ الْخُلْقِ وَمِنْ شَقاوَتِهِ سُوَّءُ الْخُلْقِ)(51)
خوش خلقى از سعادت مرد و بد خلقى از شقاوت و بدبختى اوست .
اميرمؤ منان على عليه السلام مى فرمايد:
(سُوءُالْخُلْقِ شَرُّقَرينٍ)(52)
بدخلقى بدترين همنشين وهمراه انسان است .
همچنين مى فرمايد:
(مِنَ اللُّؤْمِ سُوءُ الْخُلْقِ)(53)
بد خلقى از (نشانه هاى ) فرومايگى و پستى است .
پيامدهاى بداخلاقى
ائمّه معصومين عليهم السلام در روايات اسلامى براى سوء خلق ، آثارى اعم از
دنـيـوى و اخـروى ذكر كرده اند. با دقت در زندگى و سرنوشت افراد بد خلق ، انسان بخوبى در مى يابد كه چگونه عرصه زندگى بر بدخلقها تنگ شده و درنهايت ، كارشان به فلاكت و بـدبـخـتـى مـنـجر شده و مى شود. درمقابل ، انسانهاى خوش اخلاق را مى بينيد كه در اثر حسن خـلق ازمـوفـقـيـتـهـا و گشايشهايى بهره مند شده ومى شوند. اينك به برخى از آثار بد خلقى اشاره مى كنيم :
الف ـ آثار و پيامدهاى دنيوى :
1ـ زندگى محنت بار: امير مؤ منان على عليه السلام مى فرمايد:
(سُوءُ الْخُلْقِ نَكْدُ الْعَيْشِ وَعَذابُ النَّفْسِ)(54)
بدخلقى (مايه ) تلخى و ناگوارى زندگى وعذاب نفس (شكنجه روحى ) است .
2ـ اضطراب وتنهايى : حضرت على عليه السلام مى فرمايد:
(سُوءُ الْخُلْقِ يُوحِشُ النَّفْسَ وَيَرْفَعُ الاُْنْسَ)(55)
بدخلقى ، نفس را تنها مى سازد و اُنس را برطرف مى كند.
يعنى انسان بدخلق تنها مى شود، درحالى كه با آدم خوش اخلاق ديگران اُنس مى گيرند.
3ـ تـبـاهـى ايـمـان و عـمـل : بـه رسول خدا(ص ) عرض شد كه فلان زن ، روزها روزه مى گيرد وشـبـهـا را بـه عـبـادت مشغول است ، ليكن زنى بداخلاق است و به همسايگانش آزار مى رساند. حضرت فرمود: خيرى در او نيست و اهل دوزخ است .(56)
امام صادق عليه السلام مى فرمايد:
(إِنَّ سُوءَ الْخُلْقِ لَيُفْسِدُ الْعَمَلَ كَما يُفْسِدُ الْخَلُّ الْعَسَلَ)(57)
هـمـانـا بـدخـلقـى ، عـمـل را تـبـاه مـى سـازد، چـنـان كـه سـركـه عسل را تباه مى كند.
و نيز درجاى ديگر مى فرمايد:
(إِنَّ سُوءَ الْخُلْقِ لَيُفْسِدُ الاْ يمانَ كَما يُفْسِدُ الْخَلُّ الْعَسَلَ)(58)
هـمـانـا بـدخـلقـى ، ايـمـان را تـبـاه مـى سـازد، چـنـان كـه سـركـه عسل را تباه مى كند.
4ـ محروميت از توبه : رسول خدا(ص ) مى فرمايد:
(اءَبـَى اللّهُ لِصـاحـِبِ الْخـُلْقِ السَّيِّى ءِ بـِالتَّوْبـَةِ، فَقيلَ: يارَسُولَ اللّهِ وَكَيْفَ ذلِكَ؟ قالَ: لاَِنَّهُ إِذاتابَ مِنْ ذَنْبٍ وَقَعَ فى اءَعْظَمَ مِنَ الذَّنْبِ الَّذى تابَ مِنْهُ)(59)
خـداونـد تـوبـه بـداخـلاق را نـمـى پـذيـرد، سـؤ ال شـد: چـگـونـه ، اى رسول خدا؟ فرمود: زيرا آدم بدخلق ، هرگاه ازگناهى توبه كند، باز مرتكب گناهى بزرگتر از گناه اوّل مى شود.
5ـ دورى از خداوند: يكى از وصاياى پيامبراكرم (ص ) به ابوذر اين است كه فرمود:
(يا اءَباذَرِّ لايَزالُ الْعَبْدُ يَزْدادُ مِنَ اللّهِ تَعالى بُعْداً ماساءَ خُلْقُهُ)(60)
اى ابـاذر! بـنـده تـازمانى كه ، بدخلق است ، همواره بر دورى اش از خداوند تعالى افزوده مى شود.
ب ـ آثار و پيامدهاى اخروى
1ـ فشار قبر: امام صادق عليه السلام مى فرمايد:
(بـه پـيـامـبـر اكـرم (ص ) خـبر رسيد كه (سعدبن معاذ) از دنيا رفت . پيامبر (ص ) به همراه اصـحـاب بـرخـاسـتـه و بـه طـرف خـانـه او حـركـت كـرد. حـضـرت امـر فرمود تا بدن سعد را غـسـل داده ، كـفـن نـمـايـنـد. سپس به طرف قبرستان حركت كردند. پيامبر(ص ) با پاى برهنه و بـدون عـبـا در تـشييع جنازه او شركت نمود. گاهى طرف راست و گاهى طرف چپ تابوت را به دوش مـى گـرفـت ، تـا بـه كـنـار قـبـر رسـيـدنـد. حـضـرت خـود داخـل قـبر رفته ، جسد سعد را در قبر گذاشت و با دست خود سنگ قبر را چيد و آن را هموار ومحكم نمود... پس از دفن سعد، مادرش كه در كنار قبر ايستاده بود، با صداى بلند گفت :
(يا سَعْدُ! هنَيئاً لَكَ الْجَنَّةُ)
اى سعد! بهشت ، برتوگوارا باد.
در ايـن هـنـگـام ، پـيـامـبـر(ص ) كه صداى او را شنيد، به او فرمود: ساكت باش درامرى كه به پروردگار مربوط است با قاطعيت ، سخن مگو، زيرا هم اكنون سعد به فشار قبرمبتلا است .
پس از بازگشت از قبرستان ، مردم به حضرت ، عرض كردند: شما نسبت به جنازه سعد، بسيار احـتـرام كـرديـد و درباره او رفتارى نموديد كه با هيچ كس ديگر چنين رفتارى نكرديد. حضرت فرمود:
آنـچـه مـن در تـشـيـيـع جـنـازه سـعـد، انـجـام دادم بـه پـيـروى از فـرشـتـگـان و حـضـرت جبرئيل بود، كه در اين تشييع حضور داشتند.
اصحاب عرض كردند، با اين وصف ، چگونه فرموديد: سعد دچار فشار است ؟!
حضرت درجواب فرمود:
(نَعَمْ، إِنَّهُ كانَ فى خُلْقِهِ مَعَ اءَهْلِهِ سُوءٌ)(61)
آرى ، زيرا سعد با اهل خانه اش ، بداخلاق بود.
2ـ هلاكت در قعر جهنم : پيامبر اكرم (ص ) مى فرمايد:
(إِنَّ الْعَبْدَ لَيَبْلُغُ مِنْ سُوءِ خُلْقِهِ اءَسْفَلَ دَرَكِ جَهَنَّمَ)(62)
همانابنده به سبب بدخلقى خود به پايين ترين درجه جهنم مى رسد.
رذايل اخلاقى
رذايـل اخلاقى ، صفات و حالاتى است كه نتيجه فراموشى و غفلت از خدا بوده و موجب بدبختى هميشگى انسان مى گردد. اين صفات ناپسند، حجابهايى است كه انسان را از درك معارف الهى و نـسـيـمـهـاى روح بـخـش قـدسـى ، مـحـروم مـى نـمـايـد؛ زيـرا رذايل اخلاقى به منزله پرده اى است كه نفوس انسانها را مى پوشاند و مانع صفا و روشنى آن مى شود. چگونه چنين نباشد، درحالى كه قلب انسان همانند ظرف است . تا وقتى كه ظرفى پر از آب بـاشـد، هـوا داخـل آن نـمـى شـود و قـلبـى هـم كـه بـه غـيـر خـدا مشغول باشد، معرفت ، محبت و انس الهى وارد آن نمى شود.(63)
بـنـابـرايـن ، سـزاواراسـت كـه انـسـان عـاقـل از رذايـل اخـلاقـى ، پـرهـيـز نـمـايـد وخـانـه دل را از آنها پاك گرداند، تا قابليت دريافت فيض الهى را پيدا كند.
پيامبر اكرم (ص ) مى فرمايد:
(لا تَدْخُلُ الْمَلائِكَةُ بَيْتاً فيهِ كَلْبٌ)(64)
فرشتگان داخل خانه اى كه در آن سگ باشد، نمى شوند.
هـرگـاه اوصـاف پـسـت ونـاپـاك كـه هـمـان سـگـان درنـده هـسـتـنـد، خـانـه دل را اشغال كنند، چگونه ملائكه كه حاملان علوم و معارفند، مى توانند در آن وارد شوند.
اينك به ذكر پاره اى از رذايل اخلاقى مى پردازيم :
1ـ اصرار بر گناه
2ـ ناسپاسى نعمت
3ـ تكبّر
4ـ بدانديشى و بدگمانى
5ـ حسد
6ـ بدزبانى
7ـ دروغگويى
8ـ سوگند دروغ
9ـ تهمت
10ـ عيبجويى
11ـ سخن چينى
12ـ همسايه آزارى
اهميت نماز
نماز از ديدگاه اسلام
نـمـاز، درميان عبادتها، از مهمّترين عبادات است ، بطورى كه حدود 104 مورد كلمه (صلاة ) با مـشـتـقـاتـش در قـرآن كـريـم ذكـر شـده و در پـانـزده مـورد بـه آن امـر شـده و در چـنـد جـا نـيـز رسـول اكـرم صلى الله عليه و آله درباره آن مورد خطاب قرار گرفته است . گذشته از اينها فوايد و نتايج ارزنده اى نيز براى نماز در قرآن بيان شده است ، چنانچه مى فرمايد:
(... اَقِمِ الصَّلوةَ لِذِكْرى )(65)
... براى ياد من نماز بگزار.
همچنين مى فرمايد:
(... اَقِمِ الصَّلوةَ اِنَّ الصَّلوةَ تَنْهى عَنِ الْفَحْشاءِ وَالْمُنْكَرِ)(66)
... نماز بگزار كه نماز آدمى را از فحشا و منكر باز مى دارد.
در روايـات اهـل بـيـت عـليـهـم السـلام نـيـز، مـطـالب ارزنـده اى دربـاره اهـمـيـت نـمـاز نـقـل شـده و از آن بـه عـنـوان راءس اسـلام ، چـهـره ديـن ، مـوجـب تـقـرّب اهـل تـقـوا بـه خـداوند، افضل اعمال بعد از معرفت خدا، ستون خيمه دين و مانند آن ياد شده است . اينك در اين رابطه به بعضى از سخنان گهربار آن بزرگواران ، اشاره مى كنيم :
امام باقر عليه السلام مى فرمايد:
(اَلصَّلاةُ عَمُودُالدّينِ)(67)
نماز ستون دين است .
پيامبر اكرم (ص ) فرمود:
(مـَثـَلُ الصَّلاةِ مـَثـَلُ عـَمـُودِ الْفـُسـْطـاطِ، اِذا ثَبَتَ الْعَمُودُ نَفَعَتِ الاَْطْنابُ وَالاَْوْتادُ وَالْغِشاءُ، وَاِذَانْكَسَرَ الْعَمُوُدُ لَمْ يَنْفَعْ طَنَبٌ وَلا وَتَدٌ وَلا غِشاءٌ)(68)
مَثَل نماز همانند عمود و ستون خيمه است . هرگاه عمود ثابت باشد، طنابها، ميخها و پرده نافع است ولى در صورتى كه عمود شكست ، طناب ، ميخ و پرده سودى نمى بخشد.
حضرت على عليه السلام در آخرين وصايايش درباره نماز فرمود:
(اَللّهَ، اَللّهَ! فِى الصَّلاةِ فَاِنَّهاعَمُودُ دينِكُمْ)(69)
خدارا، خدارا! درباره نماز كه نماز ستون خيمه دين شماست .
امام باقر عليه السلام فرمود:
(اِنَّ اَوَّلَ ما يُحاسَبُ بِهِ الْعَبْدُ اَلصَّلاةُ، فَاِنْ قُبِلَتْ قُبِلَ ماسِواها)(70)
هـمـانـا نـمـاز اوّل چـيـزى اسـت كـه بـنـده نـسـبـت بـه آن مـحـاسـبـه مـى شـود؛ اگـر نـمـاز قبول شود، ساير كارها هم قبول مى شود.
چرا بايد نماز بخوانيم ؟
بسيارى مى پرسند، عبادت خدا و از جمله نماز براى چيست ؟ مگر خداى سبحان به عبادت بندگان خـود، نيازمند است كه به آن امر كرده است ؟ در پاسخ بايد گفت كه عبادت به خاطر رفع نياز از سـاحـت بـى نـيـاز الهـى نـيـسـت . طـاعت و عصيان بندگان هيچ نوع سود و زيانى براى خداى سبحان ندارد. على عليه السلام در اين باره مى فرمايد:
(فـَاِنَّ اللّهَ سـُبْحانَهُ وَتَعالى خَلَقَ الْخَلْقَ، حينَ خَلَقَهُمْ، غَنِيّاً عَنْ طاعَتِهِمْ، امِنًا مِنْ مَعْصِيَتِهِمْ لاَِنَّهُ لاتَضُرُّهُ مَعْصِيَّةُ مَنْ عَص اهُ وَلا تَنْفَعُهُ طاعَةُ مَنْ اَطاعَهُ)(71)
خـداونـد سـبحان هنگام آفرينش خَلق از طاعت و بندگيشان بى نياز و از معصيت و نافرمانى آنها ايـمـن بـود، زيـرا مـعـصـيـت گـناهكاران او را زيان ندارد و طاعت فرمانبرداران سودى به او نمى رساند.
هـدف از عـبـادت ، رشـد وتـكـامـل انـسـان اسـت ، زيـرا خـدا كـمـال مـطـلق اسـت و انـسـان بـراى رسيدن به كمال بايد خود را به او نزديك كند و راه تقرب انسان به خداى متعال ، عبوديت و بندگى است . اثر بندگى رفع تيرگيهاى درونى از صفحه دل و نـورانـى شـدن آن بـه انـوار مـلكـوت و آمـادگـى جـان انسان براى پذيرش تجليّات حق و تابش نور عشق الهى است .
بـسـيـارى از نـمـاز خـوانـان ، نماز مى خوانند، ولى نمى دانند، براى چه نماز مى گذارند و در نـتـيـجـه از هدف اصلى آن غافلند، از اين رو، سودى نمى برند و اين عبادت در روح آنان اثرى نگذاشته و يا اثرى نامحسوس و غير قابل توجه گذاشته است ؛ زيرا (همچون كلاغى كه منقار بـر زمـيـن مـى كـوبـد)، بـه نـمـاز پرداخته و با غفلت به پايان مى رسانند. چنين نمازى باز دارنـده از گـنـاهان نيست . با آنكه قرآن نماز را بازدارنده از فحشاء ومنكر شمرده است معلوم مى شود نمازش در حقيقت نماز نبوده ، بلكه صورتى از نماز بوده است .
بـراى تـوجـه بـه هـدف اصـلى اقامه نماز، برخى ازعلماى بزرگ اسلام ، كتابهايى پيرامون اسـرار اين عبادت وآداب قلبى و معنوى آن نگاشته اند كه مطالعه دقيق و به كار بستن آنها بر همه سالكان طريق الهى ، بويژه جوانان عزيز، امرى ضرورى و لازم است .
اهتمام به نماز
اهـتـمام به نماز اقتضا مى كند، انتظار وقت نماز را داشته باشيم مانند كسى كه وعده ملاقات با يـك شـخـصـيـت مـهـم گـذارده ، بـه خـاطـر وفـا بـه ايـن وعـده ، لحـظـه شـمـارى مـى كـنـد. هـيـچ قـول و قـرار ديـگـرى را كـه بـا ايـن وعـده مـنافات دارد، نمى پذيرد، حتى اگر قرار قبلى با ديـگـران گذارده است با عذر خواهى آن را لغو مى كند. براى اين ملاقات ، خود را آماده مى سازد، لبـاس خـود را مـرتّب مى كند، آنچه مى خواهد بگويد در ذهن مرور مى كند. بنابراين بايد چنين حالتى در نمازگزار باشد كه با نزديك شدن وقت نماز در چهره و رفتار او اين انتظار مشاهده شود، برخيزد، وضو بگيرد، مقدمات ديگر نماز را فراهم سازد.
اهـتـمـام بـه نـمـاز اقـتـضـا مـى كـنـد، انـسـان نـمـاز را بـطـور صـحـيـح و كـامـل بـيـامـوزد و بـه فـراگـيـرى مـسـايـل نـمـاز اهـتـمـام داشـتـه بـاشـد وهـرگـز نـمـاز را از اوّل وقت تاءخير نيندازد، مگر در شرايط اضطرارى كه طبعاً عذر تاءخير پذيرفته است .
اهـتـمـام بـه نـمـاز بـه تـوجـه قـلبـى درحـال نـمـاز وخـشـوع در حال عبادت است .
پيامدهاى سبك شمردن نماز
سبك شمردن نماز، آثار نامطلوب دنيوى و اخروى در زندگى انسان دارد كه در اينجا به برخى از آن روايات اهل بيت عليهم السلام اشاره مى كنيم :
رسول خدا صلى الله عليه و آله فرمود:
هر مرد و زنى كه درنماز سستى كند (وسبك بشمارد)، خداوند او را به پانزده چيز مبتلا مى كند: شـش بـلا در دنـيا، سه بلاهنگام مرگ ، سه بلا در قبر و سه بلاى ديگر در قيامت وقتى كه از قبرش خارج مى شود.
بلاهايى كه در دنيا به او مى رسد عبارتند از:
1ـ خداوند بركت را از عمرش مى برد.
2ـ بركت را از روزيش مى برد.
3ـ سيماى صالحان را از چهره اش مى زدايد.
4ـ هر عملى انجام دهد، پاداش نمى برد.
5ـ دعايش به آسمان بالا نمى رود.
6ـ در دعاى نيكو كاران ، بهره اى برايش نيست .
بلاهايى كه هنگام مرگش به او مى رسد، عبارتند از:
1ـ با ذلت و خوارى مى ميرد.
2ـ درحال گرسنگى مى ميرد.
3ـ در حال تشنگى مى ميرد، بطورى كه اگر از رودخانه هاى دنيا سيراب گردد، باز تشنگى او برطرف نمى شود.
بلاهايى كه در قبرش به او مى رسد، عبارتند از :
1ـ خداوند فرشته اى درقبرش ، بر او مى گمارد، تا آزارش كند.
2ـ قبرش بر او تنگ مى شود.
3ـ قبرش غرق تاريكى مى گردد.
بلاهايى كه روز قيامت ، هنگام خارج شدن از قبر، به او مى رسد عبارتند از:
1ـ خـداونـد، فـرشته اى را ماءمور مى كند، تا او را بر روى صورتش بر زمين بكشاند درحالى كه ديگران او را مى بينند.
2ـ به سختى و شدت محاسبه مى شود.
3ـ خـداونـد بـر او نـظـر (رحـمـت ) نـمى كند و پاكيزه اش نمى گرداند و برايش عذابى دردناك خواهد بود.(73)
پـس از وفـات امـام صـادق عـليه السلام ، ابوبصير آمد، تا به ام حميده تسليتى عرض كند. ام حميده گريست . ابوبصير هم گريست . بعد ام حميده به ابوبصير گفت :
ابوبصير! نبودى و لحظه آخر امام را نديدى ، جريان عجيبى رخ داد. امام درحالتى فرو رفت و بـعـد چـشـمهايش را باز كرده ، فرمود: تمام خويشان نزديك مرا خبر كنيد بيايند و بالاى سر من حـاضـر شـونـد. مـا نيز همه را دعوت كرديم . وقتى همه جمع شدند. امام در لحظات آخر عمرش ، چشم باز كرده ، به جمعيت رو كرد و فرمود:
(اِنَّ شَفاعَتَنا لا تَنالُ مُسْتَخِفّاً بِالصَّلاةِ)(74)
شفاعت ما به كسى كه نماز را سبك بشمارد نخواهد رسيد.
امام (ع ) اين را گفت و جان به جان آفرين تسليم كرد.
دعا
(دعـا) در لغـت بـه مـعـنـاى خـوانـدن ، حـاجت خواستن و استمداد بوده (75) و در اصطلاح اهل شرع ، گفتگو كردن با خداوند سبحان به شكل طلب حاجت و درخواست حلّ مشكلات از درگاه او يا به شكل مناجات و ذكر اوصاف جلال و جمال ذات پاكيزه اوست .(76)
دعـا يـكـى از بـهـتـريـن عـبـادتـهـاسـت و بـه عـنـوان عـبـادتـى مـستقل ، داراى اجر و پاداش نيك مى باشد و گاهى نيز وسيله گشايش گِرِههاى بسته زندگى و حـل گـرفـتـاريـهـا و مشكلات به الهام خدا و يارى او و سبب بر آورده شدن حاجتهاى دنيا و آخرت است .(77)
دعا از ديدگاه قرآن
از نـظـر قـرآن مـجـيـد، دعـا نـداى فـطرت بيدار انسان خدا جوست كه از عمق جانش بر مى خيزد و همانند عاشقى شيدا معشوق ناپيدايش را مى خواند و به درگاهش دست نياز مى برد.
خداجويان عاشق در سختى و راحتى ، گرسنگى و سيرى ، اندوه وشادى ، نيازمندى و بى نيازى و ... او را مى خوانند. قرآن مجيد، حالت خوشِ خداجويان مخلص را چنين توصيف مى كند:
(تَتَجافى جُنوُبُهُمْ عَنِ الْمَضاجِعِ يَدْعُونَ رَبَّهُمْ خَوْفاً وَ طَمَعاً...)(78)
بسترخواب ، را رها مى كنند، پروردگارشان را با بيم و اميد مى خوانند...
دعـا، مـحـبوبترين چيز نزد خدا بوده و مايه رشد و سعادت انسان است خداى تعالى به رسولش مى فرمايد:
(وَاِذا سـَئَلَكَ عـِبـادى عـَنـّى فـَاِنّى قَريبٌ اُجيبُ دَعْوَةَ الدّاعِ اِذا دَعانِ فَلْيَسْتَجيبُوا لى وَلْيُؤْمِنُوا بى لَعَلَّهُمْ يَرْشُدُونَ)(79)
هـنگامى كه بندگانم درباره من از تو مى پرسند، (بگو) البته كه من به آنها نزديكم . كسى كـه مـرا بخواند، اجابت مى كنم ، پس بايد دعوت مرابپذيرند و به من ايمان آورند تا به حق و سعادت راه يابند. دعـا، مـايـه ارزش انـسـان در درگـاه الهى است واعتناى خدا به بشر، به واسطه دعا، راز و نياز وگريه وزارى به درگاه او مى باشد.
خداوند متعال به رسولش مى فرمايد:
(قُلْ ما يَعْبَؤُ بِكُمْ رَبّى لَوْلا دُعاءُكُمْ ...)(80)
بگو: اگر دعاى شما نباشد، پروردگار من به شما اعتنايى نمى كند... .
پـروردگـار مـتـعال ، بندگانش را دوست دارد و خير و سعادت آنان را مى خواهد و نمى پسندد كه بـنـدگانش بدبخت و بد عاقبت شوند. از اين رو، آنان را به مقتضاى فطرت ، دعوت كرده و راه رشد، سعادت وارزش را به آنها نشان داده كه مبادا از دعا غفلت كنند و سفارش مى كند:
(... اُدْعُونى اَسْتَجِبْ لَكُمْ ...)(81)
مرا بخوانيد، تا دعاى شما را مستجاب كنم ....
دعا از نظر روايات
در روايـات اهـل بـيـت عـليـهـم السـلام گـاهـى از دعـا بـه عـنـوان عـبـادتـى مستقل ، بهترين عبادت ،مغز و روح پرستش ياد شده واز محبوبترين كارها در روى زمين شمرده شده اسـت و گـاهـى نـيـز از آن بـه عـنوان وسيله رفع گرفتاريها، دفع بلا و مصيبت ، شفاى دردها، كـليـد نـجـات ، گنجينه رستگارى ، سلاح و سپر مؤ من و بهترين وسيله نزديكى به درگاه خدا ياد شده است .
اوليـاى گـرامـى اسـلام ، مـى كـوشـيـدنـد، فـرهـنـگ دعـا و اسـتـمـداد از درگـاه خـداونـد مـتـعـال در ميان مسلمانان براى هميشه زنده بماند. از اين رو، به پيروان خود سفارش مى كردند، درتـمام حالات زندگى با خدا ارتباط داشته و حاجتهاى خود را از او بخواهند، از او كمك بگيرند و حـتـى مـسـائل كـوچـك خـود را بـا خـدا در مـيـان بگذارند. چنانچه در حديث قدسى آمده كه خداوند تعالى به حضرت موسى (ع ) فرمود:
(يا مُوسى ! سَلْنى كُلَّ ما تَحْتاجُ اِلَيْهِ، حَتّى عَلَفِ شاتِكَ، وَمِلْحِ عَجينِكَ)(82)
اى موسى ! به هر چه نياز دارى ، حتى علف گوسفند و نمك خميرت را، از من بخواه.
همچنين پيامبر اكرم (ص ) فرمود:
(لِيَسْئَالْ اَحَدُكُمْ رَبَّهُ حاجَتَهُ حَتّى يَسْئَالَهُ الْمِلْحَ وَ حَتّى يَسْاءَلَهُ شَسْعَهُ)(83)
هر كدام از شما بايد حاجتش را، حتى نمك و بند كفش خود را، از پروردگارش بخواهد.
پيامبر اكرم (ص ) فرمود:
(اَلدُّعاءُ مُخُّ الْعِبادَةِ...)(84)
دعا، مغز و روح عبادت است ... .
همچنين فرمود:
(اَلدُّعاءُ سِلاحُ الْمُؤْمِنِ وَعَمُودُالدّينِ وَنُورُ السَّماواتِ وَالاَْرْضِ)(85)
دعا، سلاح مؤ من و ستون دين و نور آسمانها وزمين است .
على عليه السلام فرمود:
(اَحَبُّ الاَْعْمالِ اِلَى اللّهِ عَزَّوَجَلَّ فِى الاَْرْضِ اَلدُّعاءُ...)(86)
محبوبترين كارها در (روى ) زمين براى خداى بزرگ ، دعاست ... .
ونيز مى فرمايد:
(اَلدُّعاءُ تُرْسُ الْمُؤْمِنِ ...)(87)
دعا، سپر مؤ من است ... .
فـردى بـه نـام (سـُدَيـرِبـن حَنان ) مى گويد: به امام باقر عليه السلام عرض كردم : كدام عبادت بهتر است ؟ فرمود:
(چـيـزى نزد خداى ارجمند بهتر از اين نيست كه از او درخواست شود و از آنچه نزد اوست خواسته شود و بدترين فرد نزد خدا كسى است كه از عبادت او تكبّر ورزد و آنچه نزد اوست ، درخواست نكند.)(88)
از امام صادق عليه السلام نقل شده كه فرمود: (بر شما باد به دعا؛ زيرا با هيچ چيز مانند آن ، به خدا نزديك نمى شويد و دعا را براى هيچ حـاجـت كـوچـكـى بـه خاطر كوچكى اش رهانكنيد، زيرا آن كس كه حاجتهاى بزرگ را بر آورده مى كند، حاجتهاى كوچك هم به دست اوست .)(89)
لازم به توضيح است كه مقصود از دعا و خواستن نيازمنديهاى بزرگ و كوچك از خدا اين است كه انـسـان هـمـواره مـتـوجـه بـاشـد كـه رب و روزى دهنده واداره كننده انسان خداست و براى اسباب و وسايط، استقلالى قايل نباشد وهمه اشياء و انسانها را در راستاى رفع نيازهاى خود وسيله هاى الهـى بـشـمـارد و به آنها ارزش استقلالى ندهد، از اين رو، تاءكيد شده كه هر چه مى خواهيد از خدا بخواهيدو پيدايش چنين رفتار و روحيه اى انسان را بنده خدا وعزيز در نزد انسانها قرار مى دهـد.
بنابراين مقصود اين نيست كه براى رفع نيازهاى خود دعا كنيد واز انجام كارهايى كه شما را بـه رفـع نـيـازهـا كـمك مى كند خود دارى ورزيد. بلكه انسان معتقد به خدا مى بايست همچون انسان غير معتقد به خدا در رفع مشكلات زندگى خود كوشا باشد، تفاوت آنها به اين است كه انـسـان غـيـر مـعتقد به خدا به اسباب و وسايل رفع نيازمنديها به چشم استقلالى مى نگرد؛ اما انـسـان مـعـتقد به خدا به چشم وسايط و راه كارهاى ارائه شده و ترتيب داده شده به وسيله خدا كه در تاءثير گذارى خود از اراده خداى متعال مستقل نيستند.
چرا دعا كنيم ؟
هـمـان گـونـه كـه در بـحـث اهـمـيـّت دعـا از ديـدگـاه قـرآن و روايـات اهـل بيت عليهم السلام روشن شد قدر و منزلت انسان نزد خدا و روح عبوديّت و بندگى به دعا، وابسته است .
كـسـى كـه مـى خـواهـد، بـنـده بـاشـد، از بـى بـند و بارى و افسار گسيختگى ، نجات يابد و گـرداب حـوادث روزگـار وتـوطـئه هـاى شـيـاطين به او آسيب نرساند، و كليد رستگارى دنيا و آخـرت را داشـتـه بـاشـد، كسى كه مى خواهد درتمام زندگى ، معشوقى داشته باشد كه همواره همدم اوباشد، در بن بستها، اميدبخش ، درهنگام بلا و مصيبت ، اضطراب و نگرانيها، آرامبخش روح و پناهگاه مطمئن او باشد، بايد دعا كند.
مـمـكـن اسـت گفته شود، ما مى توانيم با كار و كوشش هر چه مى خواهيم بدست آوريم ، همچنانكه جـامعه هاى غير معتقد به خدا ازاين راه نيازمنديهاى خود را بر طرف ساخته اند، بنابراين نيازى به دعا نيست .
در پـاسـخ بـايـد گـفـت : باكار و كوشش مى توان بخشى از نيازهاى انسان يعنى نيازمنديهاى مـادى او را تـاءمـيـن كـرد، امـّا انـسان موجودى است مركب از بعد مادّى و روحى و معنوى ، حتّى كار و كوشش انسان براى رفع نيازهاى مادّى او نبايد خالى از توجه به بعد روحى ومعنوى او باشد و دعا تاءمين كننده نيازهاى روحى ومعنوى انسان و تقويت كننده روح ومحتواى ارزشى نيازهاى مادى انـسـان اسـت . هـرگـز دعـا بـه معناى كنارنهادن كار و كوشش نيست ، بلكه جهت دار كردن كار و كـوشـش و نـيـز جهت دار كردن رفع نيازهاى مادى انسان است ، كار و كوشش براى رفع نيازهاى مادّى بدون دعا و عبادت ، جهت مناسب را نمى يابد.
اينك به چند فايده ازفوايد دعا توجه كنيد.
الف ـ نزول رحمت : على عليه السلام فرمود:
(اَلدُّعاءُ مِفْتاحُ الرَّحْمَةِ...)(90)
دعاكليد (نزول ) رحمت است ... .
ب ـ رفع همه نيازها: امام صادق عليه السلام فرمود:
(اَكْثِرْ مِنَ الدُّعاءِ فَاِنَّهُ ... لا يُنالُ ما عِنْدَاللّهِ اِلاّ بالدُّعاءِ...)(91)
بسيار دعا كن ... زيرا به آنچه نزد خداست ، جز به وسيله دعا نمى توان رسيد... .
ج ـ شفاى دردها: امام صادق عليه السلام فرمود:
(عَلَيْكَ بِالدُّعاءِ فَاِنَّ فيهِ شِفاءً مِنْ كُلِّ داءٍ)(92)
برتو باد به دعا؛ زيرا درمان هر دردى در آن است .
د ـ دفع بلا: على عليه السلام فرمود:
(بِالدُّعاءِ يُسْتَدْفَعُ الْبَلاءُ)(93)
بلا به وسيله دعا دفع مى گردد.
هـ ايمنى ازشيطان : على (ع ) فرمود:
(اَكْثِرِالدُّعاءَ تَسْلَمْ مِنْ سَوْرَةِالشَّيْطانِ...)(94)
بسيار دعاكن ، تا از خشم و غضب شيطان ، سالم بمانى ... .
و ـ رسيدن به مقامى ارجمند نزد خدا: امام صادق (ع ) فرمود:
(... لا تـَقـُلْ اِنَّ الاَْمـْرَ قـَدْ فـُرِغَ مـِنـْهُ، اِنَّ عـِنـْدَاللّهِ عـَزَّ وَجـَلَّ مـَنـْزِلَةً لا تـُنـالُ اِلاّ بِمَسْاءَلَةٍ...)(95) نـگـو، كـار از كـار گـذشـتـه (ودعـا تـاءثيرى ندارد)؛ زيرا بندگان را نزد خداى بزرگ ، مقام ومنزلتى است كه جز با دعا نمى توان به آن رسيد... .
از ايـن روايـات در مى يابيم كه درتمام صحنه هاى زندگى و براى دستيابى به همه نيازهاى مـادى و مـعـنـوى ، دركـنـار سـعـى و كـوشـش ، بـايـدا ز دعـا، غافل نباشيم وا ز مبداء غيب خود را بى نياز ندانيم ، بلكه به او اميد داشته ، شرايط لازم براى موفقيت درامور را از او خواسته و در تحقق نتيجه و رسيدن به هدف ، خدا را نيز در نظر بگيريم ؛ زيرا اين دو، با هم ملازم و مرتبطند، يعنى دعا بدون تلاش و كوشش ، بى نتيجه است و تلاش بدون دعا و توسل به آفريدگار، مايه غفلت و خلاف شكر نعمت است .(96)
قصد (ورود) و (رجا)(97)
دعا بر دو قسم است :
1ـ دعاهاى مطلق يعنى دعا كننده مطالب و نيازهاى خود را به زبان خود و به هر گونه جملات و بيانى كه مى تواند، در پيشگاه خدا اظهار كند. اين گونه دعاها را دعاهاى غير وارد يا غير ماثور مى نامند.
2ـ دعـاهـاى ماءثور يعنى انشاها و الفاظ مخصوصى كه از معصومى رسيده باشد. اين گونه را دعـاهـاى وارد شده مى نامند كه بعضى از آنها بايد در وقت مخصوص و محلّ معلومى خوانده شود و بـراى بـعـضـى ديـگـر زمـان ومـكانى تعيين نشده است . ثواب و فضيلت اين گونه دعاها براى كـسـى كـه آشـنـا بـه مـعـنـاى آنها باشد، بيش ازنوع اوّل است ؛ زيرامعصومين عليهم السلام به امراض روحى فرد و جامعه آشناتر و براى درخواست حاجت ، چگونگى بيان آن و كيفيت راز و نياز بـا حـق تـعـالى ، آگـاهـتر و بيناتر بوده اند. آنان مى دانستند كه بشر چه نقصى را دارا و چه كمالى را فاقد است . چه بايد بكند و چه بايد بخواهد. از اين رو، سزاوار است دعاكننده ، طرز بيان حاجت و چگونگى درخواست مطالب خود را ازمعصوم فراگيرد، تا اميد بر آورده شدن حاجتش بيشتر و اجرو پاداشش ، فزونتر باشد.
اگـر كـسـى بـتـوانـد از مدارك موجود، با موازين علمى ، صحّتِ صدور دعا از معصوم را به دست آورد، آن را بـه قـصـد ورود بـخـوانـد. ولى اگـرنـتـوانـد دليل معتبر و مدرك قابل اعتمادى پيداكند، و در پژوهشها و بررسيهاى خود به اين نتيجه برسد كـه سـنـد فـلان دعا ضعيف و غير قابل اطمينان است ، نبايد آن را بطور قطعى به معصوم ، نسبت دهـد، بـلكـه بـه امـيـد ثـواب و رسيدن به پاداش مخصوص آن ، بخواند كه إ ن شاءَاللّهُ آن را خواهد يافت ، اگر چه در تشخيص خود به خطا رفته باشد.
يك نكته :
گـاهـى دعا ياعملى كه سند معتبر هم دارد، مربوط به زمان يا مكانى خاص است ، مانند دعاهاى ماه رمضان يا مناجات مسجدكوفه ، اگر كسى بخواهد، آنها را در غير آن زمان و يا غير آن مكان انجام دهـد، در ايـن صـورت بـايـد آن را فـقـط بـه عـنـوان رجـا و احـتـمـال سـودمند بودن به جاى آورد ونه به قصد استحباب قطعى يا ثواب ثابت ، يعنى چنين نيت كند. (به احتمال اينكه مطلوب بوده و ماءجور باشم به جاى مى آورم .)
خـوانـدن زيـارتـهـاى مـخـصـوص درمـكـانهاى مقدس مانند زيارت جامعه كبيره ، امين الله ، وارث و غـيـرايـنـهـا نـيـز كـه در هـر يك خصوصيتى از نظر شخص معصوم يا از نظر زمان ومكان در نظر گـرفـتـه شـده ، در غـيـر مـحـلّ مـخـصـوص ، بـايـد به قصد رجا باشد و همچنين خواندن دعاهاى مـخـصـوص مـانـنـد كـمـيـل ، افـتـتـاح و غـيـره در غـيـر اوقـات اخـتـصـاصـى آنـهـا و خـلاصـه عمل عبادى در اين موارد نيز بايد به عنوان (رجاء) انجام گيرد.
آداب دعا
دعا كردن ، آداب مخصوصى دارد كه رعايت آنها موجب مى شود، دعا به اجابت نزديكتر شود و بى توجهى به آنها، چه بسا موجب بى اثر شدن دعا گردد. اكنون آداب دعا را در زير مى آوريم :
1ـ گـفـتن بِسم اللّهِ الرَّحمنِ الَّرحيمِ در اول دعا. رسول خدا صلى الله عليه و آله فرمود: دعايى كه بسم الله الرحمن الرحيم در اوّلش باشد، ردّ نمى شود.(98)
2ـ تـمجيد و ستايش خدا، پيش از دعا. محمدبن مسلم مى گويد: امام صادق عليه السلام فرمود: در كـتـاب اميرالمؤ منين عليه السلام است كه ستايش پيش از دعا و درخواست است . پس هر گاه خدا را خواندى (ودعا كردى ) او را تمجيد كن . عرض كردم : چگونه تمجيدش كنم ؟ فرمود: مى گويى :
(يامَنْ هُوَ اَقْرَبُ اِلَىَّ مِنْ حَبْلِ الْوَريدِ، يا فَعّالاً لِمايُريدُ، يامَنْ يَحُولُ بَيْنَ الْمَرْءِ وَقَلْبِهِ، يامَنْ هُوَ بِالْمَنْظَرِ الاَْعْلى ، يا مَنْ هُوَ لَيْسَ كَمِثْلِهِ شَىْءٌ)(99)
اى كسى كه از رگ گردن به من نزديكترى ، اى كسى كه هر چه را بخواهى ، انجام مى دهى واى كـسـى كـه مـيان مرد و قلبش حايل مى شوى و اى كسى كه در نظر اندازهاى برتر هستى واى آن كه به مانندش چيزى نيست .
3ـ صلوات فرستادن ، امام صادق عليه السلام فرمود:
(لا يَزالُ الدُّعاءُ، مَحْجُوباً حَتّى يُصَلِّىَ عَلى مُحَمَّدٍ وَالِ مُحَمَّدٍ)(100)
دعـا پـيـوسـتـه مـحـجـوب اسـت (مـيـان آن واجـابـتـش حـجـاب و پـرده اى حايل است )
تابرمحمد وخاندانش صلوات فرستاده شود.
دعـاهـاى ائمـه عـليـهـم السـلام مـعـمـولاًهـمـراه بـا ذكـر صـلوات بـرمـحـمـد وآل محمد و تكرار صلوات است .
4ـ شفيع قرار دادن انبيا، اوليا وصالحان
5ـ اقـرار بـه گـنـاه و تقصير، زيرا هر قدر انسان عابد و متقى باشد باز هم از انجام تكاليف بندگى بطور كامل ناتوان است تا چه رسد به عامه انسانها كه پر از لغزش و خطايند.
6ـ فـروتـنـى در درگـاه خـدا بـا گـشودن و بالابردن دستها به سوى آسمان و گريه وزارى كردن . 7ـ خواندن دو ركعت نماز قبل از دعا.
8ـ كوچك نشمردن دعا و بزرگ نشمردن حاجت .
9ـ عالى بودن همّت درخواسته ها.(101)
10ـ عـمـومـيـت دادن بـه دعـا يـعـنـى بـراى هـمـه دعـا كـردن ، امـام صـادق (ع ) از رسول خدا صلى الله عليه و آله نقل مى كند كه فرمود:
هـر گـاه يكى از شمادعا كند بايد آن را عموميت دهد و همه را دعا كند؛ زيرا آن به اجابت نزديكتر است .(102)
11ـ پنهان كردن دعا، خداى متعال در قرآن مى فرمايد:
(اُدْعُوا رَبَّكُمْ تَضَرُّعاً وَخُفْيَةً ...)(103)
خداى خود را با حالت زارى و پنهانى بخوانيد.
12ـ اجـتـمـاع بـراى دعـا. جـاهـايـى كـه دعـا كردن از ريا و خودنمايى ايمن بوده ، بهتر است به صورت دسته جمعى باشد؛ زيرا در قبولى آن مؤ ثرتر است . امام صادق عليه السلام فرمود:
هرگاه پيش آمدى ، پدرم را غمگين مى كرد، زنان و كودكان را جمع كرده ، سپس دعا مى كرد و آنان آمين مى گفتند.(104)
13ـ حسن ظن داشتن به اجابت دعا، امام صادق (ع ) فرمود:
هـرگـاه دعـا كـردى از عـمـق دل تـوجـه كـن و گـمـان تـوايـن بـاشـد كـه حـاجـتت بر درخانه است .(105)
14ـ دعا كردن در زمانها و احوال مناسب زمانها و احوالى كه دعا كردن در آنها، به اجابت نزديكتر اسـت ، عـبـارتـنـد از: دعـا بـعـد ازنـمـازهـاى واجـب ، هـنـگـام اذان ، اوّل ظـهـر، هـنـگـام قـرائت قـرآن ، و زيدن بادها و آمدن باران ، رقّت قلب ، درميدان جنگ ، درنماز وتر، سحرها و بعد از سپيده صبح و... .
دعا كردن بويژه در سحرگاهان از اهميت خاصى برخوردار است . از مردى به نام (عُمَربن اُذَيْنَه ) نقل شده كه گفت : از امام صادق عليه السلام شنيدم كه فرمود:
هـمـانا در شب ساعتى است كه درك نكند آن را بنده مسلمانى كه در آن نماز گزارد و خداى بزرگ را در آن ساعت بخواند، مگر اينكه اجابت مى شود و اين ساعت در هر شب هست . عرض كردم : خدايت خير دهد، بفرماييد آن ، چه ساعتى از شب است ؟ فرمود: هنگامى كه نيمى از شب بگذرد و آن ساعت وقتى است كه يك ششم از ابتداى نيمه دوم شب بگذرد.(106)
15ـ اصـرار و پـافـشـارى در دعـا، امـام صـادق (ع ) از رسول خدا صلى الله عليه و آله نقل مى كند كه فرمود:
(خـدا رحـمت كند بنده اى را كه از خداى بزرگ حاجتى بخواهد و درخواستن از آن ، پافشارى كند خواه اجابت شود و يا اجابت نشود، سپس اين آيه را تلاوت كرد:
(وَاَدْعُوا رَبّى عَسى اَلاّ اَكُونَ بِدُعاءِ رَبّى شَقِيّاً )(107)
دعـا مـى كـنـم بـه درگاه پروردگار خود، شايد به وسيله دعاى پروردگارم تيره بخت نباشم .(108)
16ـ دعـا كـردن يـا گـريـه وزارى ، خـدا دوسـت دارد انـسان در درگاه او خشوع كند و اوج خشوع ، لرزش دل انسان در برابر خداست و حاصل آن اشك و آه .
در قرآن بندگان خوب خود را چنين توصيف مى كند.
( وَيَخِرُّونَ لِلاَْذْقانِ يَبْكُونَ وَ يَزيدُهُمْ خُشُوعاً)(109)
چهره بر خاك مى مالند و مى گريند و بر خشوع آنان مى افزايد.
در سـيـره پـيـامـبـر، امـيـر مـؤ مـنـان و سـايـر امـامـان مـعـصـوم و بـزرگـان ديـن نقل شده كه گريه وزارى فراوان در درگاه خدا داشته اند.
اگر دل بشكند و اشك جارى شود اميد استجابت دعا بسيار زياد است .
از خدا چه بخواهيم ؟
در تـعـاليـم اسـلام سـفارش شده كه انسان درخواسته هاى خود همتى والا و بلند داشته باشد و هـمـواره در جـهـت خشنودى خدا قدم برداشته و از درگاهش ، سلامتى دين و ايمان ، حفظ و پايدارى اسـلام و نـظام اسلامى ، حسن توفيق ، زندگى سعادتمندانه ، عاقبت به خيرى ، برخوردارى از درجـات شـهـدا، مـحـشور شدن با پيامبر اكرم صلّى الله عليه وآله و خاندان پاكش و مانند آن را طـلب كـنـد و براى چيزهاى بى ارزش و يا كم ارزش دنيا و نيز براى كارهاى حرام يا نشدنى و غير ممكن ، دعا نكند.
نـقـل شـده اسـت كـه مـردى نـزد رسـول خـدا(ص ) آمـد و بـعـد از عـرض سـلام گـفـت : يـا رسـول اللّه ! آيـا مـرا مى شناسى ؟ پيامبر فرمود: توكيستى ؟ مرد گفت : من صاحب آن منزلى از طائف هستم كه در جاهليت ، در فلان روز، به خانه من آمدى و من تو را گرامى داشتم .
رسول خدا(ص ): فرمود: مرحبا به تو! حاجتت را از من بخواه .
آن مرد گفت : دو هزار گوسفند، همراه چوپان مى خواهم !
رسول خدا(ص ) حاجتش را بر آورده ، سپس به اصحاب خود فرمود:
چـه مـى شـد اگـر ايـن مـرد مـانـنـد آن پـيـره زن بـنى اسرائيل از من چيز مهمّى درخواست مى كرد؟ (نـقـل شـده كه حضرت موسى (ع )، از پيره زنى پرسيد:قبر حضرت يوسف (ع ) كجاست ؟ پير زن گـفـت : نـمـى گـويـم ، مگر اينكه ضمانت كنى در روز قيامت ، در بهشت و در درجه تو باشم !!!)(110)
هـمـچـنـيـن از مـردى بـه نـام (رَبـيـعـة بـن كـَعـب ) نـقـل شـده كـه گـفـت : روزى رسول خدا صلى الله عليه و آله به من فرمود:
اى ربيعه ! تو هفت سال به من خدمت كردى ، آيا حاجتى ازمن نمى خواهى ؟
گـفـتم : يا رسول الله ! به من مهلت بده ، تا فكركنم ، چون شب را، صبح كردم ، نزد حضرت رفتم ، فرمود: اى ربيعه حاجتت را بگو؟ گفتم :
از خدا مى خواهم كه مرا همراه تو، وارد بهشت كند.
رسـول خـدا(ص ) فـرمـود: چـه كـسـى ايـن را بـه تـو تـعـليـم داده ؟ گـفـتـم : يـا رسـول الله كسى به من تعليم نداده و لكن پيش خودم فكر كردم و گفتم : اگر مالى بخواهم ، خواه ناخواه نابود مى شود واگر طول عمر يا اولاد بخواهم ، (باز) عاقبتش مرگ است .
سپس رسول خدا(ص ) ساعتى سرمباركش را پايين انداخته ، بعد فرمود:
من اين كار را ميكنم ، پس تو هم بازياد سجده كردن يارى ام كن .(111)
در دنـبـاله بـحـث چـنـد حـديـث از امـيـرمـؤ مـنـان عـلى عـليـه السـلام نقل مى كنيم :
(سَلُوا اللّهَ الْعَفْوَ وَالْعافِيَةَ وَحُسْنَ التَّوْفيقَ)(112)
از خدا آمرزش گناهان ، سلامت و حسن توفيق را بخواهيد.
(نـَسـْاءَلُ اللّهَ سـُبـْحـانـَهُ مـَنـازِلَ الشُّهـَداءِ وَمـَعـايـَشـَةَ السُّعـَداءِ وَمـُرافـَقـَةَ الاَْنـْبـِيـاءِ وَالاَْبْرارِ)(113)
از خـداى سبحان مرتبه شهيدان ، زندگانى نيكبختان و رفاقت پيمبران و نيكوكاران را درخواست مى كنيم .
(هَبِ اللّهُمَّ لَنارِضاكَ وَاَغْنِنا عَنْ مَدِّالاَْيْدى اِلى سِواكَ)(114)
خـداونـدا! خـشـنـودى خـود را به ما ببخش و ما را از دراز كردن دستها به سوى غير خود بى نياز گردان .
شرايط اجابت دعا
دعـا كـردن شرايطى دارد كه وجود آنها موجب قبولى دعا مى شود. مهمترين آن شرايط، بر اساس روايات اهل بيت عليهم السلام ، به شرح زير است :
الف ـ معرفت و شناخت خدا:
پيامبر اكرم صلى الله عليه وآله فرمود:
( يَقُولُ اللّهُ عَزَّوَجَلَّ مَنْ سَاءَلَنى وَهُوَ يَعْلَمُ اَنّى اَضُرُّ وَاَنْفَعُ اَسْتَجيبُ لَهُ)(115)
خداوند بزرگ مى فرمايد هر كس از من (چيزى ) بخواهد درحالى كه بداند، تنها من ضرر و نفع مى رسانم ، خواسته اش را مستجاب مى كنم .
امـام كاظم عليه السلام فرمود: جمعى به امام صادق عليه السلام عرض كردند: چرا دعامى كنيم و اجـابـت نـمـى شـود؟ امـام فـرمـود: بـراى ايـنـكـه كـسـى را مـى خـوانـيـد كـه او را نـمـى شناسيد.(116)
ب ـ عمل به مقتضاى معرفت :
خداوند تعالى مى فرمايد:
(اَوْ فُوا بِعَهْدى اُوفِ بِعَهْدِكُمْ ...)(117)
به عهد من وفا كنيد، تا به عهدتان و فا كنم ... .
پيامبر اكرم (ص ) فرمود:
(اَلدّاعى بِلا عَمَلٍ كَالرّامى بِلاوَتَرٍ)(118)
دعا كننده بدون عمل همچون تيراندازى است كه زه (دركمان ) ندارد. (يعنى دعاى او بى اثر است ). از امير مؤ منان عليه السلام درباره آيه (اُدْعُونى اَسْتَجِبْ لَكُمْ) پرسيدند (كه اگر چنين است ) پس چرا ما دعا مى كنيم ، جواب ما داده نمى شود؟ حضرت پاسخ داد:
هـمـانـا دلهـاتـان به هشت خصلت خو كرده است : اوّل ، خدا را شناختيد ولى حقش را ادا نكرديد، با ايـنـكـه بـرشـمـا واجـب شـده بـود. بـنـابـرايـن ، شـنـاخـتـى كـه از خدا داشتيد، شما را بى نياز نـكـرد(119)# ... پـس بـا ايـن كـارها چه دعاهايى بايد مستجاب شود، در حالى كه شما درها و راههاى آن را بسته ايد.(120)
ج ـ كسب حلال و خوردن روزى حلال :
پيامبر اكرم صلى الله عليه وآله فرمود:
(مَنْ اَحَبَّ اَنْ يُسْتَجابَ دُعاؤُهُ فَلْيُطَيِّبْ مَطْعَمَهُ وَمَكْسَبَهُ)(121)
هر كس مى خواهد دعايش ، مستجاب شود، بايد خوراك و درآمدش را پاك كند.
امام صادق عليه السلام فرمود:
(اِذا اَرادَ اَحَدُكُمْ اَنْ يُسْتَجابَ لَهُ فَلْيَطِبْ كَسْبَهُ، وَلْيَخْرُجْ مِنْ مَظالِمِ النّاسِ، وَاِنَّ اللّهَ لا يَرْفَعُ دُعاءَ عَبْدٍ وَ فى بَطْنِهِ حَرامٌ، اَوْعِنْدَهُ مَظْلَمَةٌ لاَِحَدٍ مِنْ خَلْقِهِ)(122)
هرگاه يكى از شما بخواهد، دعايش مستجاب شود بايد كسب خود را پاك كرده ، از عهده حقوق مردم خـارج شـود وهـمـانـا خـدا، دعـاى بـنده اى كه در شكمش لقمه حرام باشد يا حقى از بندگان خدا نزدش ، باشد، قبول نمى كند.
د ـ حضور قلب و رقّت آن هنگام دعا:
از امام صادق عليه السلام نقل شده كه فرمود:
خـداى بـزرگ ، دعـايـى را كـه از دل غافل برخيزد، اجابت نمى كند، پس هرگاه دعا كردى ، به دل توجه كن (حضور قلب داشته باش ) و يقين داشته باش كه اجابت مى شود.(123)
همچنين فرمود:
هـرگـاه دل يـكـى از شـمـا رقـت كـرد (ونـرم شـد) در آن حال ، دعا كند؛ زيرا دل تا پاك نشود نرم نمى شود.(124)
موانع اجابت دعا
در اينجا پاره اى از موانع اجابت دعا مطرح مى گردد.
الف ـ مصلحت نبودن : گاهى حكمت الهى اقتضاى استجابت دعايى را ندارد و مصلحت ايجاب مى كند كـه دعـاى مـا مستجاب نشود؛ زيرا ما از حقيقت امور، مطلع نيستيم . چه بسا كه چيزى براى ماضرر داشته باشد و ما به حسب ظاهر تصوّر مى كنيم مفيد است ، ولى خدا صلاح و فساد و خير و شر ما را بـهـتر مى داند وحكمتش اقتضا مى كند، بعضى از دعاها كه به صلاح نيست مستجاب نشود. على عليه السلام فرمود:
(اِنَّ كَرَمَ اللّهِ سُبْحانَهُ لا يَنْقُضُ حِكْمَتَهُ فَلِذلِكَ لا يَقَعُ الاِْجابَةُ فى كُلِّ دَعْوَةٍ)(125)
هـمـاناكَرم خداى سبحان ، حكمت او را، نقض نمى كند، به همين جهت ، در هر دعايى اجابت واقع نمى شود(يعنى خدا، در دعاها، حكمت و مصلحت را رعايت مى كند و اينكه بعضى دعاها مستجاب نمى شود، به اعتبار اين است كه مصلحت در اجابتِ آن نيست ، نه اينكه در كَرم الهى كوتاهى باشد). ب ـ گناه : گاهى مقتضى استجابت دعا وجود دارد، ولى بنده در اثر گناه و معصيت مانع اجابت آن مى گردد و از لطف پروردگار محروم مى شود. حضرت على عليه السلام فرمود:
(اَلْمَعْصِيَةُ تَمْنَعُ الاِْجابَةَ)(126)
عصيان و نافرمانى ، مانع اجابت (دعا) مى گردد.
ج ـ سـتم كردن : خداوند به حضرت عيسى بن مريم (ع ) وحى كرد كه به ملا (ومستكبران ) بنى اسـرائيـل بـگـو: ... هـمـانـا مـن دعاى احدى از شما را اجابت نمى كنم ، در حالى كه براى يكى از بندگانم حقى نزد او باشد (يعنى ظلمى نسبت به او كرده باشد).(127)
د ـ مـهـيـّا نـبـودن شـرايـط و زمـان : گاهى مستجاب شدن دعا منوط به فراهم شدن شرايط وزمان مـنـاسـب اسـت ؛ يـعـنـى دعا مستجاب مى شود؛ اما اگر شرايط تحقق آن فراهم نباشد، آشكار شدن استجابت دعا تا آماده شدن شرايط تاءخير مى افتد. يا اينكه خدا اجابت را تاءخير مى اندازد تا انسان بيشتر در درگاه او زارى كند.
امام صادق عليه السلام فرمود:
(مـردى خـدمـت ابـراهـيـم خـليـل (ع ) آمـده ، گـفـت : حـاجـتـى دارم كـه سـه سـال اسـت ، هر چه از خدا طلب مى كنم ، اجابت نمى شود. آن حضرت درجوابش فرمود: خدا وقتى بـنـده اى را دوسـت دارد، دعـايش را به تاءخير مى اندازد، تا او با خدا بيشتر مناجات كند و از او درخواست و طلب نمايد.)(128)
و نيز فرمود:
(إِنَّ الْمُؤْمِنَ لَيَدْعُوا فَيُؤَخِّر اِجابَتُهُ اِلى يَوْمِ الْجُمُعَةِ)(129)
مؤ من دعا مى كند و خداوند اجابت آن را تا روز جمعه عقب مى اندازد.
ذكر
(ذكـر)، يـعـنى ياد كردن ، خواه با زبان باشد، يا با قلب يا با هردو، بعد از نسيان باشد، يا بعد از ادامه ذكر.(130) به عبارت ديگر، ذكر حالت روحى خاصى است كه انسان در آن حال ، دانسته خويش را مورد توجه قرار مى دهد و گاهى به يادآورى چيزى با زبان و گاهى به حضور چيزى در قلب گفته مى شود.
فضيلت ذكر خدا
ذكـر خداى سبحان از بهترين و پاكيزه ترين اعمال نزد خدا، برترين لذّت نزد دوستداران خدا، خـوى و خصلت خوب مؤ منان و صالحان و نشان همنشينى با محبوب واقعى بوده و مايه شرافت و رسـتـگـارى انـسـان مى باشد و در آيات قرآنى و روايات اسلامى مورد سفارش واقع شده است . قرآن كريم مى فرمايد:
(يااَيُّهَاالَّذينَ امَنُوا اذْكُرُواللّهَ ذِكْراً كَثيراً...)(131)
اى كسانى كه ايمان آورده ايد، خدا را بسيار ياد كنيد... .
پيامبر اكرم (ص ) فرمود:
(اِعـْلَمـُوا اَنَّ خـَيـْرَاَعـْمـالِكـُمْ عـِنـْدَ مَليكِكُمْ وَاَزْكاها وَاَرْفَعَها فى دَرَجاتِكُمْ وَ خَيْرَما طَلَعَتْ عَلَيْهِ الشَّمـْسُ، ذِكـْرُاللّهِ سـُبـْحـانـَهُ وَتـَعـالى فـَاِنَّهُ اَخـْبـَرَعـَنْ نـَفـْسِهِ فَقالَ اَنَا جَليسُ مَنْ ذَكَرَنى )(132)
بدانيد كه بهترين اعمال شما نزد خداوند و پاكيزه ترين آنها و آنچه از همه بيشتر درجات شما را بـالا مـى برد و بهترين چيزى كه آفتاب بر آن تابيده ، ذكر خداى سبحان است ؛ زيرا خداى تعالى از خودش خبر داده ، فرمود: من همنشين كسى هستم كه مرا ياد كند.
على عليه السلام مى فرمايد:
(ذِكْرُاللّهِ سَجِيَّةُ كُلِّ مُحْسِنٍ وَشيمَةُ كُلِّ مُؤْمِنٍ)(133)
يادخدا خصلت هر نيكوكار و خوى هر مؤ منى است .
امام صادق عليه السلام فرمود:
(ما مِنْ شَىْءٍ اِلاّ وَلَهُ حَدُّ يَنْتَهى اِلَيْهِ اِلا الذِّكْرَ فَلَيْسَ لَهُ حَدُّ يَنْتَهى اِلَيْهِ...)(134)
هر چيزى را حدى است كه به آن منتهى مى شود، مگر ذكر كه حدّى ندارد كه به آن پايان يابد.
حقيقت ذكر چيست
از آيـات قرآنى و سخنان اولياى گرامى اسلام ، استفاده مى شود كه ذكر عبارت است از ياد خدا در هـمـه احـوال و پـيـشـامـدهـا وتـوجـه بـه حـضـور درمـحـضـر الهـى و او را حـاضـر و ناظر بر اعمال و رفتار خويش دانستن و اين كه هيچ امرى بر او پوشيده نمى ماند. از اين رو، هنگام روبه رو شدن با تكاليف واجب به ياد خدا بوده ، آنها را انجام دهد و هنگام روبه روشدن با محرمات و معاصى از خدا غافل نباشد، واز انجام آن پرهيز نمايد، چنان كه قرآن كريم مى فرمايد:
(اِتَّقُواللّهَ اِنَّ اللّهَ خَبيرٌ بِما تَعْمَلُونَ)(135)
از خدا بترسيد كه خدا به كارهايى كه مى كنيد، آگاه است .
(يَعْلَمُ خائِنَةَ الاَْعْيُنِ وَما تُخْفِى الصُّدُورُ)(136)
خيانت هاى چشمان و آنچه سينه ها پنهان ساخته مى داند.
(وَهُوَ مَعَكُمْ اَيْنَما كُنْتُمْ)(137)
خدا با شماست ، هر جا كه باشيد.
(وَنَحْنُ اَقْرَبُ اِلَيْهِ مِنْ حَبْلِ الْوَريدِ)(138)
ما از رگ و ريد به او نزديك تر هستيم .
در روايـتـى امـام صـادق ازجـمله سخت ترين تكاليف خداوند بر بندگانش را(ذِكرُاللّهِ عَلى كُلِّ مَوْطِنٍ) به ياد خدا بودن در هر جا شمرده ، مى فرمايد:
(منظور از ذكر خدا، گفتنِ (سُبْحانَ اللّهِ وَالْحَمْدُلِلّهِ وَلااِلهَ اِلا اللّهُ وَاللّهُ اَكْبَرُ) نيست ، گرچه اينها هم ذكر است ـ بلكه مقصود آن است كه اگر انسان با حرام خدا روبه روشد، ياد خدا او را از آن باز دارد.)(139)
امـام صـادق عـليـه السـلام از رسـول خـدا صـلى الله عـليـه وآله نقل كرده كه فرمود:
(هر كسى كه اوامر خدا را اطاعت نمود واز گناهان پرهيز كرد، همانا او ذاكر خداست ، گرچه نماز و روزه (مستحبى ) و قرائت قرآن او، اندك باشد و هر كس كه معصيت ونافرمانى خدا نمايد، خدا را فـرامـوش كـرده ، گـرچـه نـمـاز و روزه و تـلاوت قـرآن او بـيـش از حـد معمول بوده باشد.)(140)
از ايـن احـاديث . بخوبى روشن مى شود كه منظور از ذكر، تنها ذكر زبانى نيست ، گرچه ذكر زبـانـى هـم ذكر بوده در مكتب اسلام داراى اهميّت است ، لكن مقصود حقيقى از ذكر خدا، رسيدن به درجـه اى از ايمان واعتقاد است ، كه انسان بر اثر آن ، پيوسته خود را زير نظر خدا دانسته ، و در نـهـان و آشـكـار، او را شـاهد و نظار اعمالش بداند و از زشتيها دورى گزيده و وظايف خود را بـرابـر او انـجـام دهـد بـه عـبـارت ديـگـر، حـقـيـقـت ذكـر، تـوجـه قـلبـى بـه خـداونـد متعال است كه دراعمال انسان پرتو افكند.
انواع ذكر
ذكر خدا انواعى دارد كه برخى از آنها را در زير مى آوريم :
الف ـ ذكر زبانى :
ذكـرزبـانـى بـه جـا آوردن حـمـد و ثـنـاى الهـى ، نـجـوا كـردن (آهـسـتـه حـرف زدن )، درد دل كـردن ، درخـواسـت كـمـك از درگـاه خـداى سبحان و پناه بردن از شر شياطين انس و جن به آن بارگاه مقدس است .
ذكـر زبـانـى گـرچـه ازتـمـام مـراتـب ذكـر، نـازلتـر اسـت ولى در عـيـن حال مفيد فايده است . زيرا كه زبان در اين ذكر به وظيفه خود قيام كرده و به علاوه ممكن است ، ايـن تـذكـّر پـس ازمـداومـت و قـيـام بـه شـرايـط آن ، اسـبـاب بـاز شـدن زبـان قـلب نـيـز بشود.(141)
در روايـات اهـل بـيـت عـليـهـم السلام اين گونه ذكر زياد به چشم مى خورد و حتى مورد سفارش قرار گرفته است . چنانچه خود آن بزرگواران نيز در اين زمينه الگوى پيروان خود هستند. امام صادق عليه السلام فرمود:
(... پـدرم (كـَثـيـرُالذِّكـر) بـود. مـن او را هـنـگـام غـذا خـوردن و راه رفـتـن درحال ذكر گفتن خدا مى يافتم ، حتى صحبت كردن با ديگران ، او را از ياد خدا باز نمى داشت . زبانش با گفتن (لااِلهَ اِلا اللّهُ) به كامش چسبيده بود. او ما را جمع مى كرد. كسانى را كه قرآن خـوانـدن مـى دانـسـتـنـد به قرائت قرآن و كسانى را كه قرآن خواندن نمى دانستند، به ذكر خدا فرمان مى داد تا خورشيد طلوع كند.(142)
تـسـبـيـحـات حـضـرت زهـرا سـلام الله عـليـهـا، گفتن تسبيحات اربعه ، (يااَللّهُ) و (يارَبُّ)، (لاحـَوْلَ وَلا قـُوَّةَ اِلاّبـِاللّهِ الْعـَلِىِّ الْعـَظـيـمِ) و اسـتـغـفار و مانند آن ، ازجمله ذكرهاى زبانى مى باشند كه هر كدام ثواب مخصوصى داشته و اثر ارزنده اى در انسان ايجاد مى كند.
بـايـد تـوجـه داشـت كـه ذكـر زبـانـى لقـلقـه زبـان نـشـود وهـمـراه بـا غـفـلت دل نـبـاشـد، بـلكـه ذكـر زبـانـى نـشـان ذكـر قـلبـى و ابـراز مـكـنـون دل باشد يا دست كم مقدمه ذكر قلبى گردد.
ب ـ ذكر قلبى :
ذكـرقـلبـى هـمـان تـوجـه قـلبـى بـه خـداى سـبـحـان اسـت كـه دل را صفا و صيقل داده ، جلوه گاه محبوب مى كند و روح را تصفيه كرده ، انسان را از قيد اسارت نفس مى رهاند. اگر قلب به تذكّر محبوب و ياد حق تبارك وتعالى عادت كرد و با آن عجين شد، انـسـان را دگـرگـون مـى كـنـد، بـطورى كه حركات و سكنات چشم ، زبان ، دست ، پا و ساير اعـضـا، بـا ذكر حق انجام مى گيرد و برخلاف وظايف ، امرى انجام نمى دهند. كاملترين وبهترين مـراتـب ذكـر نـيـز هـمـيـن است كه درهمه مراتب انسانى ، جارى شده و حكمش ظاهر و باطن و نهان و آشـكـار را در بـر گيرد و اگر ذكر زبانى نيز از نظر مكتب اسلام مطلوب است و به آن سفارش شـده ، سـرّش در آن است كه زبان قلب گشوده شود و بحدى برسد كه زبان ، چشم ، گوش و سـايـر اعـضـاى بـدن از قـلب پـيـروى كـنـنـد تـا بـديـن وسـيـله دل براى ورود صاحب منزل ، پاك و پاكيزه گردد.
على عليه السلام فرمود:
(اِنَّ اللّهَ سُبْحانَهُ جَعَلَ الذِّكْرَجَلاءً لِلْقُلُوبِ...)(143)
همانا خداوند سبحان ، ذكر را جلا و صفاى دلها قرار داده است ... .
امام خمينى قدس سرّه مى نويسد:
(پـس اى عـزيـز! در راه ذكـر و يـاد مـحـبـوب ، تـحـمـّل مـشـاقّ هـر چـه بـكـنـى ، كـم كـرده اى . دل را عـادت بـده بـه يـاد محبوب ، بلكه به خواست خدا، صورت قلب ، صورت ذكر حقّ شود و كـلمـه طـيـّبـه لااله الاالله صورت اخيره وكمال اءقصاى نفس گردد كه از اين زادى بهتر براى سلوك الى الله و مُصلحى نيكوتر براى معايب نفس و راهبرى خوبتر درمعارف الهيه يافت نشود.
پـس اگـر طـالب كـمـالات .... و مـهـاجـر الى الله هـسـتـى ، قـلب را عادت بده به تذكّر محبوب ....)(144)
ج ـ ذكر عملى :
ذكـر عـمـلى آن اسـت كـه انـسـان در عـمـل ، خـدا را نـاظـر و شـاهـد اعـمال و رفتار خود دانسته ، هرجا كه صحبت واجب باشد، آنجا حاضر بوده و هر جا كه صحبت از مـحـارم الهـى ، گـنـاه و نـافـرمـانـى خـدا بـاشـد، غـايـب بـاشـد و درحـال گـنـاه و نـافـرمـانى ديده نشود. اين نوع ذكر در آيات قرآن ، به تعابير گوناگون ، درمـورد اعـمـال انسانى به كار رفته است كه شرح آن در درس آينده با عنوان (جايگاههاى ذكر خدا) خواهد آمد.
آثار ذكر
ذكر خدا و يادآورى صفات و نعمتهاى الهى ، نياز حياتى براى انسان بودن و انسان زيستن است . يـاد خـدا نـگهبان هويت انسان و پاسدار ارزشهاى معنوى است . ذكر خدا ريشه صلاح قلب و موجب آبادى وحيات آن و روشن بينى ، اطمينان و آرامش دل است . اينك به برخى از آثار ارزنده ذكر خدا مى پردازيم :
الف ـ آرامـش و اطـمـيـنـان دل : روح انـسان ربّانى است ،(154) تا با خدا پيوند نداشته بـاشد،قرار و آرام نمى گيرد، پيوند روح و دل انسان با خدا به وسيله ياد خدا پديد مى آيد و برقرار مى ماند. علّت اصلى اضطرابها و آشفتگى هاى روانى ، خستگيها و افسردگيهاى روحى انـسـان دوره صـنـعـتـى ، غـفـلت از يـاد خـدا اسـت . بـراى آرامـش دل بايد به ياد خدا روى آورد:
(اَلا بِذِكْرِ اللّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ)(155)
آگاه باشيد كه با ياد خدا دلها آرام مى گيرند.
ب ـ تـوجـه خـدا بـه انسان : در صورتى كه انسان به ياد خدا باشد، خدا نيز به ياد اوست و تـوجه خداكه مدير و مدبّرهمه امور است به انسان همه مشكلات جسمى و روحى او را برطرف مى سازد، خداوند مى فرمايد:
(فَاذْكُرُونى اَذْكُرْكُمْ)(156)
به ياد من باشيد تا به ياد شما باشم .
ج ـ رستگارى : قرآن كريم مى فرمايد:
(... وَاذْكُرُوا اللّهَ كَثيراً لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ)(157)
زياد به ياد خدا باشيد، اميد است رستگار شويد.
موانع ذكر
در آيـات قـرآن و روايـات اسـلامى موانعى چند، كه انسان را از ياد خدا باز مى دارد به چشم مى خورد. دراينجا به ذكر برخى از آنها بسنده مى كنيم :
الف ـ دل مـشـغـولى و اِلهـاء: الهـاء بـه مـعـنـاى مـشـغـول سـاخـتـن دل و ذهن وغفلت از خداست . قرآن كريم مى فرمايد:
(اَلْهيكُمُ التَّكاثُرُ)(158)
تكاثر شما را به غفلت از ياد خدا دچار ساخته است .
ب ـ اموال واولاد: گاهى اموال و اولاد انسان را از ياد خدا باز مى دارند. قرآن كريم به مؤ منان چنين هشدار مى دهد:
(يا اَيُّهَاالَّذينَ آمَنُوا لا تُلْهِكُمْ اَمْوالُكُمْ وَ لا اَوْلادُكُمْ عَنْ ذِكْرِاللّهِ)(159)
اى كـسـانـى كـه ايـمـان آورده ايـد، امـوال و اولادتـان شـمـا را از ذكـر خـدا غافل نكند.
ج ـ آرزوهـاى طـولانـى : گـاهـى آرزوهـاى دراز انـسـان را بـه خـود مـشـغـول مـى سـازد و در نـتـيـجـه از يـاد خـدا بـازش مـى دارد. خـداى تعالى درباره كافران به رسولش خطاب كرده مى فرمايد:
(ذَرْهُمْ يَاءْكُلُوا وَ يَتَمَتَّعُوا وَيُلْهِهِمُ الاَْمَلُ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ)(160)
آنـهـا را رهـا كـن تـا بـخـورنـد و بـهـره بـبـرنـد و آرزوهـايـشـان آنـان را مشغول سازد. سپس در آينده خواهند فهميد.
د ـ دوستان گمراه : اسلام توصيه كرده كه پيروانش با هر كس طرح دوستى نريزند؛ زيرا اين امر انسان را از راه حق و ياد خدا باز مى دارد. از اين رو، قرآن كريم مى فرمايد:
(فَاَعْرِضْ عَمَّنْ تَوَلّى عَنْ ذِكْرِنا وَلَمْ يُرِدْ اِلا الْحَيوةَ الدُّنْيا)(161)
از كسى كه از ياد ما روى گردانيده و جز زندگى دنيا خواسته اى ندارد، روى گردان .
از حضرت عيسى عليه السلام نقل شده كه فرمود:
(با كسى همنشينى كنيد كه ديدنش شما رابه ياد خدا مى اندازد.)(162)
هـ پيروى ازهواى نفس : حضرت على عليه السلام فرمود:
(لَيـْسَ فـِى الْمـَعـاصـى اَشـَدُّ مـِنْ اِتِّبـاعِ الشَّهـْوَةِ، فـَلا تـُطـيـعـُوهـا فـَتـَشـْغـَلَكـُمْ عـَنْ ذِكـْرِ اللّهِ)(163)
درگـنـاهـان ، چـيزى سخت تر از پيروى شهوت نيست ، پس از آن پيروى نكنيد كه شما را از ياد خدا باز مى دارد. و ـ چشم چرانى كردن : على (ع ) فرمود:
(لَيـْسَ فـِى الْجـَوارِحِ اَقـَلُّ شـُكـْراً مـِنَ الْعـَيـْنِ، فـَلا تـُعـْطـُوهـا سـُؤْلَهـا فـَتـَشـْغـَلَكـُمْ عـَنـْ ذِكْرِاللّهِ)(164)
در بـيـن اعضا كم سپاستر از چشم (عضوى ) نيست ، پس خواسته هايش را به آن ندهيد كه شما را از ياد خدا باز مى دارد.
مـقـصـود ايـن اسـت كـه اگـر چـشـم انـسـان بـه هـر چـه بـيـفـتـد دل را بـه سـوى آن مـتـوجـه مـى سـازد و هـر چـه در پـى ديـده هـاى چـشـم و خـواسـتـه هـاى دل بـروى سـپـاس و تـقـديـرى نـمـى بـينى ، بازهم بر خواسته ها افزوده مى گردد و اين كار انسان را از ياد خدا باز مى دارد. بابا طاهر مى گويد:
زدست ديده و دل هر دو فرياد
هر آنچه ديده بيند دل كند ياد
نكوهش ترك ذكر خدا
هـمه مصيبتها و گرفتاريها بر اثر نفس امّاره شيطانى و غفلت از ياد خدا و عذاب اوست . غفلت از خدا و ترك ذكر، كدورت دل را زياد كرده ، نفس و شيطان را بر انسان ، مسلّط مى كند و مفاسد را روز افزون كرده ، انسان را به ورطه هلاكت مى اندازد. از اين رو، قرآن مجيد، رويگردانى از ذكر خدا و غفلت از آن بارگاه شريف را سخت مورد نكوهش قرار داده ، مى فرمايد:
(فَوَيْلٌ لِلْقاسِيَةِ قُلُوبُهُمْ مِنْ ذِكْرِاللّهِ)(165)
واى بر سخت دلانى كه ياد خدا در دلهايشان راه ندارد.
همچنين مى فرمايد:
(وَمَنْ يُعْرِضْ عَنْ ذِكْرِ رَبِّهِ يَسْلُكْهُ عَذاباً صَعَداً)(166)
هر كس از ياد پروردگارش رويگرداند، (خدا) او را به عذابى دشوار دچار سازد.
كـسـى كـه از يـاد خـدا خـوددارى كـنـد، بـاطنش كور گشته ، آيات و جلوه هاى الهى را نمى بيند، زنـدگـى او بـى فـروغ بـوده و در بـن بـسـتـهاى زندگى پناهگاهى ندارد. آن كورى باطنى و فراموشى آيات و مظاهر جمال و جلال الهى ، در روز قيامت نيز تجسّم پيدا مى كند. چنانچه قرآن كريم مى فرمايد:
(مَنْ اَعْرَضَ عَنْ ذِكْرى فَاِنَّ لَهُ مَعيشَةً ضَنْكاً وَنَحْشُرُهُ يَوْمَ الْقِيامَةِ اَعْمى )(167)
هر كس از يادِ من ، روى بگرداند، زندگى اش تنگ شود و در روز قيامت نابينا محشورش سازيم . قـرآن نـعمتهاى الهى را به بندگانش گوشزد كرده ، آنها را از ترك ذكر وغفلت از آن نهى مى كند و مى فرمايد:
(قُلْ مَنْ يَكْلَؤُكُمْ بِاللَّيْلِ وَالنَّهارِ مِنَ الرَّحْمنِ، بَلْ هُمْ عَنْ ذِكْرِ رَبِّهِمْ مُعْرِضُونَ)(168)
بـگـو: كـيـسـت آن كه شما را شب و روز از قهر خداى رحمان حفظ مى كند؟ با اين همه از ياد كردن پروردگارشان روى مى گردانند.
همچنين درجاى ديگر مى فرمايد:
(وَلا تَكُونُوا كَالَّذينَ نَسُواللّهَ فَاَنْسيهُمْ اَنْفُسَهُمْ)(169)
از آن كسانى نباشيد كه خدا را فراموش كردند و خدا نيز چنان كرد تا خود را فراموش كنند.
حال كه خداوند الطاف خود را از مادريغ نكرده و هر چيز كه لازم بوده به ما ارزانى داشته ، آيا وقـت آن نـرسـيده كه دل به او داده و در برابرش فروتن باشيم ، به او پناه بريم تا از بن بـسـتـهـا و گـرفتاريها، اضطرابها، دلهره ها، پوچيها، بى هدفيها، بى بندوباريها و افسار گسيختگيهانجات يابيم . (اَلَمْ يَاءْنِ لِلَّذينَ امَنُوا اَنْ تَخْشَعَ قُلُوبُهُم لِذِكْرِاللّهِ...)(170)
آيامؤ منان را وقت آن نرسيده است كه دلهايشان در برابرياد خدا فروهيده شود.
پرهيز از ريا
قـبولى اعمال انسان در پيشگاه خداى سبحان ، به نيّت وقصد خالص وابسته است . پيامبر اكرم (ص ) فرمود:
(اِنَّمَاالاَْعْمالُ بِالنِّيّاتِ)(171)
همانا ارزش كارها به نيّتهاست .
على عليه السلام فرمود:
(تَقَرُّبُ الْعَبْدِ اِلَى اللّهِ سُبْحانَهُ بِاِخْلاصِ النِّيَّةِ)(172)
نزديك شدن بنده به خداى سبحان به سبب خالص كردن نيت اوست .
آنـچـه كـه اخـلاص و پـاكـى نـيـت را از بـيـن مـى بـرد و در نـتـيـجـه ، عمل را باطل مى سازد، ريا و خودنمايى است كه در اين درس به شرح آن خواهيم پرداخت .
تعريف ريا
ريـا در لغـت تـظـاهـر بـه كـار خوب است و در اصطلاحِ علم اخلاق ، به معناى نشان دادن كارهاى خـوب و پـسـنـديـده بـه مـردم بـراى يـافـتـن اعـتـبـار و مـنـزلت در دل آنهاست .(173)
نكوهش ريا در اسلام
اسـلام ريـاكـارى و خـودنـمـايـى را بـويـژه در اعـمـال عـبـادى نكوهش كرده است . قرآن كريم مى فرمايد:
(فَوَيْلٌ لِلْمُصَلّينَ، الَّذينَ هُمْ عَنْ صَلاتِهِمْ ساهُونَ، اَلَّذينَ هُمْ يُراؤُنَ...)(174)
واى بر آن نمازگزارانى كه از نماز خود غافلند آنان كه رياكارند... .
درجاى ديگر نيز وقتى اوصاف منافقان را بيان مى كند، مى فرمايد:
(وَاِذا قـامـُوا اِلَى الصَّلاةِ قـامـُوا كـُسـالى يـُراؤُنَ النـّاسَ وَلا يـَذْكـُرُونَ اللّهَ اِلاّ قَليلاً)(175)
چـون بـه نـماز برخيزند، با تنبلى برخيزند وبراى نشان دادن به مردم نماز مى خوانند و جز اندكى خدا را ياد نمى كنند.
قـرآن كريم ، عمل ريا كارانه را به خاكى تشبيه كرده كه بر روى سنگ صافى نشسته است و باران تندى بر آن ببارد و خاك را از روى آن سنگ بشويد، بطورى كه ديگر قدرت جمع كردن ذرات آن خاك نباشد و چيزى از آن باقى نماند. حال رياكار نيز چنين است . او كارى انجام داده كه عـمـقـى نـدارد بـلكـه ظـاهـرى فـريـبـنـده دارد، ولى بـزودى واقـعـيـت عـمـل خـود را خواهد ديد كه آن چنان از بين رفته كه چيزى از آن باقى نمانده است و به تعبيرى بى اثر شده است مى فرمايد:
(... كـَالَّذى يـُنـْفـِقُ مـالَهُ رِئاءَ النـّاسِ وَلا يـُؤْمـِنُ بِاللّهِ وَالْيَوْمِ الاَّْخِرِ فَمَثَلُهُ كَمَثَلِ صَفْوانٍ عـَلَيـْهِ تـُرابٌ فـَاَصـابـَهُ وابـِلٌ فـَتـَرَكـَهُ صـَلْداً لا يـَقـْدِرُونَ عـَلى شـَىْءٍ مـِمـّا كَسَبُوا....)(176)
مانند آن كس كه مالش را براى نشان دادن به مردم ، انفاق مى كند و به خداوند و روز جزا، ايمان نـدارد، مـَثـَل او هـمـانـنـد سنگ صافى است كه خاك روى آن بوده ، رگبارى به آن رسد و آن را (بـشـويـد و) صاف به جاگذارد (رياكاران ) بر حفظ آنچه كرده اند توانايى ندارند ( واز آن بهره اى نمى برند).
رياكار كيست
رياكار كسى است كه ظاهرى فريبنده داشته و حالتى چون پارسايان به خود مى گيرد، ولى بـاطنش آلوده و زشت است . او اعمالى همچون نماز، روزه ، ذكر خدا، تلاوت قرآن ، انفاق و ساير وظـايـف عـبادى را براى نشان دادن به مردم انجام مى دهد واز ستايش و تعريف ديگران خرسند مى شود. حضرت على عليه السلام فرمود:
(اَلْمُرائى ظاهِرُهُ جَميلٌ وَباطِنُهُ عَليلٌ)(177)
رياكار، ظاهرش زيبا و اندرونش معيوب است .
همراهان ريا
ريـا بـا بـرخـى از خـصـلتـهـاى نـاپسند وانحرافات اخلاقى ديگر همراه است كه در زير بدان اشاره مى كنيم .
الف ـ شرك خفى : ريا از شاخه هاى شرك خفى است ؛ زيرا رياكار، در واقع ، اعمالش را براى غـيـر خـدا انـجـام مـى دهـد و درونـش آلوده بـه شـرك اسـت . رسول خدا صلى الله عليه و آله فرمود:
(آنـچـه بـيـش از هـر چـيـز بـراى شـمـا از آن بـيـم دارم ، شـرك اصـغـر اسـت . پـرسـيـدنـد: اى رسـول خـدا! شـرك اصـغـر چـيـسـت ؟ فـرمـود: ريـا. روز قـيـامـت وقـتـى خـداونـد پـاداش اعـمال بندگان را مى دهد به رياكاران ، مى فرمايد: برويد نزد كسانى كه در دنيا براى آنها خودنمايى مى كرديد، آيا نزد آنان ثواب و پاداش اعمالتان را مى يابيد؟)(178)
ونيز آن حضرت فرمود:
(روز قـيـامـت شـخص رياكار را خطاب مى كنند: اى بدكار! اى نيرنگ باز، اى رياكار!عملت گم شـد و اجـرت بـاطـل گـشـت ، بـرو مـزدت را از هـمـان كـس كـه عـمـلت را بـراى او انـجام مى دادى بگير.)(179)
ب ـ نفاق : رياكار در درجه اى از نفاق قرار دارد. شخص رياكار و منافق هر دو در ظاهر، دم ازخدا مى زنند، ولى در باطن ، دل به غير خدا بسته اند خداوند درباره منافقان مى فرمايد:
(يُراؤُنَ النّاسَ...)(180)
منافقان براى مردم خودنمايى مى كنند (واهل ريا وتزويرند).
ج ـ كـوردلى و كـم خـردى : ريـاكـار بـه عـلّت كـار بـراى غـيـر خـدا، از حـق بـرگـشـتـه و بـه بـاطـل گرويده است و اين بيانگر كوردلى اوست . از امام على عليه السلام پرسيدند: چه كسى كور و نابيناست ؟ پاسخ داد: آن كه براى غير خداكار كند.(181)
امام باقر عليه السلام فرمود:
(مـيـان حـق و بـاطـل ، چـيـزى جـز كـم خـردى وجـود نـدارد. پـرسـيـدنـد: چـگـونـه اى فـرزنـد رسـول خـدا(ص )؟ فـرمـود: بـنده عملى انجام مى دهد كه مورد نظر خداست ، ولى او غير خدا را در نظر دارد در صورتى كه اگر نيّتش خالص بود، (علاوه بر رضايت خدا) آنچه را كه در نظر داشت ، زودتر به او مى رسيد.)(182)
نشانه هاى ريا كار
بر اساس روايات اهل بيت عليهم السلام شخص رياكار، نشانه هايى دارد كه به برخى از آنها اشاره مى كنيم :
ريـاكـار وقـتـى كـه تـنـهـاسـت ، در انـجـام عـبـادات و تـكـاليـف الهـى تـنـبـل و كـسـل اسـت ، ولى درمـيـان مـردم بـا نـشـاط و پـركـار اسـت ؛ زيـرا انـگـيـزه او در عمل ، خودنمايى و جلب نظر مردم است .
على عليه السلام فرمود:
(لِلْمـُرائى اَرْبـَعُ عَلاماتٍ: يَكْسَلُ اِذاكانَ وَحْدَهُ، وَيَنْشَطُ اِذا كانَ فِى النّاسِ، وَيَزيدُ فِى الْعَمَلِ اِذا اُثْنى عَلَيْهِ، وَيَنْقُصُ مِنْهُ اِذالَمْ يُثْنَ عَلَيْهِ)(183)
ريـاكـار چـهـار عـلامـت دارد:
1ـ وقـتـى تـنـهـاسـت تـنـبـل و كـسـل اسـت
2ـ درميان مردم با نشاط و پركار است .
3ـ هرگاه مورد ستايش قرار گيرد دركار خود افزايش مى دهد.
4ـ چنانچه مورد ستايش قرار نگيرد از آن مى كاهد.
گويند شخصى رياكار، شبى براى عبادت به مسجد رفت ، نيمه شب صدايى شنيد. به تصوّر اينكه انسانى وارد مسجد شده و عبادت و اطاعت او را نظاره مى كند، عبادت خود را با سوز و گداز بـيـشـترى ادامه داد. بامداد كه هوا روشن شد، ديد براى سگى خودنمايى كرده است كه از ترس سـرمـا وارد مـسـجـد شـده و در گـوشـه اى خزيده است . در اين هنگام ، عرق شرم بر پيشانى اش نـشـسـتـه ، خـود را مـلامت كرد كه چگونه شبى را تاصبح ، براى جلب نظر يك سگ ، به عبادت پرداخته است ؟!(184)
پيامدهاى ريا
ريا و خودنمايى پيامدهاى نامطلوبى براى انسان دارد كه به بعضى از آنها اشاره مى كنيم :
الف ـ پذيرفته نشدن عمل : پيامبر اكرم (ص ) فرمود:
(اِنَّ اللّهَ لا يَقْبَلُ عَمَلاً فيهِ مِثْقالُ ذَرَّةٍ مِنْ رِئاءٍ)(185)
خداوند عملى را كه هم وزن ذره اى ريا، درآن باشد، نمى پذيرد.
ب ـ واگذارى به ديگران : امام صادق عليه السلام فرمود:
(اِيّاكَ وَالرِّياءَ فَاِنَّهُ مَنْ عَمِلَ لِغَيْرِاللّهِ وَكَّلَهُ اللّهُ اِلى مَنْ عَمِلَ لَهُ)(186)
از ريا بپرهيز؛ زيرا هر كه براى غير خدا كارى كند، خداوند او را به همان كس واگذارد.
ج ـ دورى از رحمت الهى : رسول خدا صلى الله عليه وآله فرمود:
فـرشـتـگـان ، عـمـل بـنـده اى را بـا خوشحالى نسبت به آن ، بالا مى برند و از تمام موانع مى گـذرنـد، تـا بـه پـيـشـگـاه خـدا مـى رسـنـد وگـواهـى مـى دهـنـد كـه او عـمـل صـالح انـجـام داده اسـت . خـداونـد مـى فـرمـايـد: شـمـا حـافـظ عـمـل (ظـاهـرى ) بـنـده مـن هـسـتـيـد، ولى مـن بـه ضـمـيـر و بـاطـن او آگـاهـم كـه بـا ايـن عمل مرا قصد نكرده است . لعنت من بر او باد! (يعنى از رحمت من دور باد!)(187)
د ـ ورود به جهنم : رسول خدا (ص ) فرمود:
(در روز قيامت ) دستور مى دهند، مردانى را در آتش افكنند... (وقتى وارد جهنم شدند) نگهبان جهنم ، خـطـاب بـه آنان مى گويد: اى بدبختها! مگر شما چه كرده ايد؟ پاسخ مى دهند: ما براى غير خـدا، كـار مـى كـرديم و به ما گفته شد: پاداشتان را از كسى كه برايش كار كرديد، دريافت كنيد.(188)
پيشگيرى و درمان
هـرگـاه بـنـده اى به زيانِ ريا پى برد و جايگاه اخروى خود را بداند و به عذاب ، سرزنش و خوارى خود اطلاع پيداكند و مقامى را كه از راه رياكارى با مردم كسب كرده ، با مقام از دست رفته خود نزد خدا و دورى از رحمت الهى و محروميت از ثواب اخروى مقايسه كند، بدون شك از رياكارى دست بر مى دارد.
درمورد پيشگيرى و درمان ريا لازم است راههاى زير مورد توجه انسان قرار گيرد:
1ـ پناه بردن به خدا و تقاضاى هميشگى مدد الهى براى نجات از ريا.
2ـ انجام كارهاى استحبابى در خفاء و به صورت پنهانى .
3ـ ابراز نكردن كارهاى خيرى كه انسان براى ديگران انجام مى دهد.
4ـ منّت نگذاردن براى انجام كار خير بر كسى كه كار به نفع اوست .
ترديدى نيست كه رستگارى ونجات از عذاب الهى ، تنها در سايه اخلاص ، ميسّر است . چنان كه مردى از رسول خدا صلى الله عليه وآله پرسيد:
( اى رسول خدا! نجات در چيست ؟ حضرت پاسخ داد:
نجات در اين است كه درانجام اطاعت خدا، مردم را در نظر نداشته باشى .)(189)
خوف و رجا
شخص با ايمان گرچه بايد همواره از جهت گناه و خطاى خود از عذاب الهى بترسدو از كيفر ومؤ اخـذه او ايـمـن نـباشد، ولى در عين حال ، بايد به رحمت و آمرزش پروردگار مهربان نيز اميدوار باشد.
مفهوم رجا
(رجا) به معناى اميدوار بودن و درمقابل نااميدى است . انسان بايد به رحمت الهى اميدوار باشد. امـيـد به رحمت خدا اين است كه انسان در عين حالى كه در كسب رضاى الهى مى كوشد، براى دور ى از عـذاب خـدا بـه خـدا پـنـاه بـرد و بـه او امـيـدوار بـاشـد، نـيـز بـراى نيل به درجات بالاتر كمال و رهايى از كوتاهيها و غفلتها و آثار ناشى از آنها به رحمت الهى امـيد داشته باشد وگناهان او هر چند بسيار سنگين باشد او را از رحمت خداماءيوس نسازد؛ زيرا يـاءس از رحـمت گسترده خدا انسان را به ورطه گناه بيشتر مى كشاند و فساد و تباهى فرد در اثر ياءس افزون مى گردد ومنطق ماءيوس اين است (آب كه از سرگذشت چه يك نى ، چه صد نى ) يعنى من كه غرق شده ام چه فرقى مى كند كه تا چه عمقى از منجلاب فرو روم ، امّا اگر امـيـدوار باشد با تنبّه و توجه به گناه و فساد خويش ومشاهده روزنه نجات تو به كرده ، از گـنـاه بـيـشتر خوددارى مى كند و رو به اصلاح خويش مى گذارد و ممكن است ، تا آنجا پيش رود كه گذشته ناهنجار خويش را جبران كند. خداى مهربان مى فرمايد:
(وَلا تَيْاءَسُوا مِنْ رَوْحِ اللّهِ اِنَّهُ لا يَيْاءَسُ مِنْ رَوْحِ اللّهِ اِلا الْقَوْمُ الْكافِرُونَ)(190)
از رحمت الهى ماءيوس نباشيد؛ زيرا جز گروه كافران كسى از رحمت خدا نااميد نيست .
نيز مى فرمايد:
(قـُلْ يـا عِبادِىَ الَّذينَ اَسْرَفُوا عَلى اَنْفُسِهِمْ لا تَقْنَطُوا مِنْ رَحْمَةِ اللّهِ اِنَّ اللّهَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ جَميعاً اِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُالرَّحيمُ)(191)
بـگـو اى بـنـدگـان من كه بر نفس خويش تعدى كرده ايد (يعنى به خود ستم روا داشته مرتكب گـنـاه شـده ايـد) از رحـمـت خـدا مـاءيـوس نشويد؛ زيرا خدا همه گناهان را مى آمرزد. او آمرزنده و مهربان است .
امـيـرمـؤ مـنـان عـليـه السـلام بـه مردى كه گناهان بسيار، او را از رحمت خدا ماءيوس كرده بود، فرمود:
(اى مرد! نااميدى تو از رحمت خدا، از بقيه گناهان تو بزرگتر است .)(192)
حقيقت رجا آن است كه آدمى ، دل خود را براى انتظار محبوب و به دست آوردن آن ، آماده سازد؛ يعنى اسـبـاب پـذيـرايـى مـحـبـوب را بـه شـكـل شـايـسـتـه اى درخـانـه دل خود، مهيّا ساخته ، براى رسيدن به آن تلاش كند و نسبت به آنچه از قدرت و اختيار او خارج اسـت ، امـيـد فضل و كرم خدا را داشته باشد. اين حالت ، رجا نام دارد ولى هرگاه اسباب رسيدن به آن امر مورد انتظار را آماده نكرده باشد، آن را غرور و نادانى مى نامند.
اگـر بنده اى تخم ايمان را در سرزمين دل افشانده ، با آب طاعت و عبادت خدا آبيارى اش كند و صـفـحـه دل را از خـار و خـاشـاك انـحـرافـات اخـلاقـى پـاك سـازد و در ايـن حـال بـه انـتـظـار فـضـل خـدا بـنـشـيـنـد كـه خـدا او را تـا فـرا رسيدن لحظه مرگ بر ايمان و عـمـل صـالح ثـابـت بـدارد و رحـمـت و آمـرزش خـود را شامل حال او گرداند، اين گونه انتظار، رجاى حقيقى است .
رجاى حقيقى و دروغين
بـا تـوجـه بـه مـعـنـاى حـقيقى رجا به اين نتيجه مى رسيم كه انسان هر چند پاره اى گناهان را انـجـام داده بـاشـد، بـايـد وظـايـف ديـنـى خـود را بـه بـهـتـريـن شـكل ، انجام داده ، از گناهان خود توبه كند و بكوشد كه دوباره گِرد گناه نگردد و خود را از انحرافات اخلاقى پاك نمايد و در عين حال ، به لطف و كرم الهى براى آمرزش گناهانش اميدوار بـاشـد و نـگـويـد كـه بـا آن هـمـه گـنـاه ، ديـگـر اعـمـال صـالح ، تـوبـه و پـاكـسـازى دل بـراى مـن فـايـده نـدارد. بـه عـبـارت ديـگـر، رجـاى حـقـيـقـى بـدون انـجـام عمل صالح ، ترك گناهان و پاكسازى دل ، معنا ندارد و هر گاه كسى بگويد من به خدا اميد دارم ، درحـالى كه عمل صالح انجام نداده و مرتكب گناه شود و قلب او لبريز ازانحرافات اخلاقى بـاشد و با اين حال ، بازهم منتظر بخشش الهى باشد، انتظار وى نادانى و غرور بوده و داراى رجاى دروغين است . پيامبر اكرم صلى الله عليه وآله فرمود:
(انـسـان احـمـق كـسـى اسـت كـه نـفـس وى از هـوسـهـاى شـيـطـانـى اش پـيـروى كـنـد و در عـيـن حال ، آرزومند بهشت ، از خداوند باشد.)(193)
بـه امـام صـادق عـليـه السـلام گـفـتـنـد: گـروهـى از پـيـروان شـمـا درحـالى كـه نـامـه اعمال خود را به وسيله گناه سياه كرده اند، مى گويند: ما اميدواريم ! حضرت فرمود:
دروغ مى گويند، آنها پيروان ما نيستند. آنها گروهى هستند كه آرزوها ايشان را به اين سو و آن سـو مـى برد. هر كسى كه اميد چيزى را داشته باشد، به خاطر آن كوشش مى نمايد و هر كس از چيزى بترسد، از آن مى گريزد.(194)
امام زين العابدين عليه السلام نيز در مناجاتش به درگاه الهى عرض مى كند:
(... وَ اَعُوذُ بِكَ مِنْ ... رَجاءٍ مَكْذُوبٍ)(195)
... (خداوندا!) از رجاى دروغين به تو پناه مى برم .
مفهوم خوف
(خـوف ) در لغـت بـه معناى ترس ، بيم و هراس بوده (196) و دراصطلاح عبارت است از آن كه قلب ، به جهت نگرانى از حوادث ناخوشايندى كه در آينده نزديك تحقق مى يابد، به درد آيد و بسوزد. انـسـان بـايـد ازخـدا بترسد و دل مؤ من بايد لبريز از اين گونه ترس باشد؛ البته ترس ازخدا از آن جهت نيست كه خدا ـ نعوذ بالله ـ موجود ترسناكى است ،ترس از خدا معانى و مراتبى دارد. يـك مـعـنـاى تـرس از خـدا، تـرس از خشم خدا و عذاب خدا در دنيا و آخرت است و منشاء خشم و عذاب الهى ، نافرمانى بشر است . انسان اگر از قدرت برترى بترسد نافرمانى نمى كند و چـه قـدرتـى بـه قـدرت الهـى مـى رسـد و بـلكـه چـه قـدرتـى قـابـل مـقـايـسـه بـا قدرت قاهر الهى است ، بنابراين بايد ترس از خدا مانع نافرمانى بشر گردد. نيز ترس از خدا به همين معنا در جايى صادق است كه انسان در صدد فرمانبرى بر آمده ؛ امـا از انـجـام فـرمـان آنچنان كه بايسته است كوتاهى كرده و تمام همت ، توان و توجه خود را بـراى فرمانبرى به كار نبرده است ، بازبايد ترسيدكه مبادا چنين اطاعتِ دست و پا شكسته اى مـقـبـول حـضـرت حـق نـيفتد و در نتيجه فرمانبرى به شمار نيايد و پاداشى بر آن مترتب نشود وعـذابـى را از انسان دفع نكند يا درجه مورد انتظارى را براى او نسازد، چنين خوفى به معناى دلهـره داشـتـن ازرد و قـبـول اعـمال در درگاه خداست ، نتيجه چنين ترسى دقّت بيشتر در درستى اعمال و افزودن بر طاعت و درجه اخلاص نيّت است .
اگـر انـسـان چـنـيـن تـرسـى در دل نـداشـتـه بـاشـد، خـاطـرش از نـاحـيـه خـدا و قـبـولى اعـمـال جـمـع بـاشـد، سـسـتـى و سـهـل انـگـارى مـى كـنـد، عـمـل نـيـك خـود را ارزشـمـنـد ومـمـتـاز مـى شـمـارد، يـا گـنـاه خـود را نـاچـيـز و قـابل چشم پوشى مى انگارد، در نتيجه از گناه هراسى نخواهد داشت و برگناهان مى افزايد و در اصـلاح خـود و بـهـبـود كـيـفـيـت اعـمـال خـود نـخـواهـد كـوشـيـد و بـر كمال خويش نمى افزايد.
مـعـناى ديگر ترس از خدا، لرزش دل در برابر هيبت و عظمت الهى است ، از چنين ترسى در آيات قـرآن بـه (خشيت ) تعبير شده است ؛ خشيت ، حالت خضوع و خشوع وتسليم است ، هر چه مرتبه آگـاهـى و مـعـرفـت انـسـان نـسبت به عظمت و جلال خدا افزون شود و خود را در برابر اين عظمت نامتناهى كوچك و حيران احساس كند، درجه خشوع او افزون مى گردد. خدا مى فرمايد:
(اِنَّما يَخْشَى اللّهَ مِنْ عِبادِهِ الْعُلَماءُ)(197)
ازميان بندگان خدا، تنها عالمان هستند كه از خدا مى ترسند.
نيز مى فرمايد:
(رَضِىَ اللّهُ عَنْهُمْ وَ رَضُوا عَنْهُ ذلِكَ لِمَنْ خَشِىَ رَبَّهُ)(198)
خـدا از آنـان خـشـنود است و آنان نيز از خدا خشنود و راضى هستند. اين مقام ، از آن كسى است كه از پروردگارش مى ترسد.
در جاى ديگر مى فرمايد:
(وَاَمّا مَنْ خافَ مَقامَ رَبِّهِ وَ نَهَى النَّفْسَ عَنِ الْهَوى فَاِنَّ الْجَنَّةَ هِىَ الْمَاءْوى )(199)
آن كس كه از مقام پروردگارش ترسيده و نفس را از هوا باز داشته ، بهشت جايگاه اوست .
كـسـى كـه بـه ايـن مـرتـبـه از خـوف ، بـرسـد خـداونـد ابـهـت او را در دل همه جهانيان قرار مى دهد. امام صادق عليه السلام در اين باره مى فرمايد:
( مـَنْ خـافَ اللّهَ اَخـافَ اللّهُ مـِنـْهُ كـُلَّ شـَىْءٍ وَمـَنْ لَمْ يـَخـَفِ اللّهَ اَخـافـَهُ اللّهُ مـِنْ كـُلِّ شَىْءٍ)(200)
كسى كه از خدا بترسد خداوند همه چيز را از او مى ترساند و كسى كه از خدا نترسد، خداوند او را از هر چيزى مى ترساند.
نـمـونـه آشـكـار ايـن گـفـتـار، امـام خـمـيـنـى قـدس سـره اسـت كـه خـداونـد مـتـعـال بـر اثـر رسـيـدن آن حـضـرت بـه ايـن مـقـام ، هـيـبـتـش را در دل همگان قرار داد. روحش شاد و راهش پر رهرو باد.
حد خوف و رجا
راه درسـت در زمـيـنه خوف و رجا راه اعتدال است ؛ زيرا با توجه به بيان مفهوم رجا، رجاى الهى دقـيـقـاً در راستاى نجات انسان از گناهان گذشته و توبه و پشيمانى از آنها و رهايى از ادامه گـنـاه عـمـل مـى كـنـد، اگر نتيجه رجا ادامه گناه يا افزايش روحيه عصيان باشد طبعاً رجاى غلط وانحرافى است كه نمى تواند همراه با خوف باشد.
انـسـان بـه واسـطـه رجـاى بيش از حد به وادى آمال و آرزوهاى بى جا كشيده مى شود و از انجام تـكـاليـف بـاز مـى مـانـد و بـه واسطه خوفِ زياد به نا اميدى كشيده مى شود و در او انگيزه اى بـراى انـجام وظايف باقى نمى ماند. به عبارت ديگر، رجا تا حد معيّنى خوب و پسنديده است و آن حـد غـلبـه نـكـردن بـرخـوف اسـت و چنانچه اميدوارى از حدّ خود تجاوز كند به غفلت از مكر و عذاب الهى مى گرايد. قرآن كريم مى فرمايد:
(وَلا يَاءْمَنُ مَكْرَاللّهِ اِلا الْقَوْمُ الْخاسِرُونَ)(201)
تنها زيانكاران هستند كه از مكر خدا ايمن هستند.
هـمـچـنـيـن خـوف نـيـز در حد معيّنى پسنديده است و آن حد تحت الشعاع قرار ندادن اميد است . اگر خوف از حد خود تجاوز كرد، به نااميدى منجر مى شود وعين گمراهى خواهد بود.
قرآن كريم مى فرمايد:
(وَلايَيْاءَسُ مِنْ رَوْحِ اللّهِ اِلا الْقَوْمُ الْكافِرُونَ)(202)
از رَوْح و رحمت خداماءيوس نمى شوند، مگر گروه كافران .
اگر انسان بين خوف و رجا باشد، به همان راه مستقيمى كه راه اوليا و برگزيدگان خداست ، دست يافته است .
قرآن كريم آنان را چنين توصيف مى كند:
(اِنَّهـُم كـانـُوا يـُسـارِعـُونَ فـِى الْخـَيـْراتِ وَيـَدْعـُونـَنـا رَغـَبـاً وَرَهـَبـاً وَكـانـُوا لَنـا خاشِعينَ)(203)
بـراسـتى آنان پيشى گيرندگان در خوبيها بودند و ما را از روى اميد و بيم مى خواندند و در برابر ما خاشع و فروتن بودند.
امـام صـادق عـليـه السـلام از پـدر بـزرگـوارش چـنـيـن نقل مى كند:
(هيچ بنده مؤ منى نيست ، مگر اينكه در قلب او دو نور است : نور خوف (از گناهش كه مبادا خداوند متعال او را كيفر دهد) و نور اميد (به رحمت ، فضل و آمرزش الهى كه اورا مى بخشد) كه اگر اين دو نور با هم سنجيده شود، هيچ يك بر ديگرى زيادتى نكند)(204)
خوف برتر است يا رجا (205)
اگـر بـر قـلب انـسـان ، درد غـفـلت از مكر و عذاب خدا و غرور تكيه بر لطف خدا غالب بود، در ايـنـجـاخـوف ، بـرتـر و لازمتر است و اگر نااميدى از رحمت خدا بر قلب او غالب بود، اميدوارى بـهـتـر اسـت . در رابـطـه بـا مـؤ مـن مـتـّقـى كـه ظـاهـر و بـاطـن و آشـكـار و نـهـان او ازاعـمـال نـاپـسـنـد مـنـزه اسـت ، بـهـتـر آن اسـت كـه خـوف و رجـا در قـلب او مـتـسـاوى و متعادل باشند.
ايـنـكه مى بينيد، در بسيارى از مردم ، اميدوارى به بخشش وعفو خداوندى بيش از ترس از عذاب الهـى اسـت ، بـه جـهـت كـمـى معرفت و مغرور شدن به لطف و عنايت خداست . در حالى كه در مورد زندگى قبل از مرگ چنين كسانى ، بهتر آن است كه خوف ، بيش از رجا باشد و در لحظات مرگ آنـان ، بـهتر است رجا و خوش گمانى آنان بيش از خوف باشد، چرا كه خوف ، نقش شلاق را در وادار كـردن بـه كـار دارد، در حـالى كـه بـه هـنـگـام مـرگ كـار از كـار گـذشـتـه و مـوقـع عـمـل بـه اتـمـام رسـيـده اسـت . پـس در آنـجا، ترس ديگر كار بردى ندارد؛ زيرا رگهاى حيات بـريـده شده و زمان مرگِ وى فرا رسيده است . ولى در چنين موقعيتى ، رجا و اميد به خدا قلب را تـقـويـت كـرده ، خدا را در نظرش دوست داشتنى جلوه مى دهد، خدايى كه تمام اميد و آرزوى انسان به اوست .
پايدارى در ميدان نبرد
يـكـى از فـضـايـلى كـه بـراى نيروهاى نظامى و رزمندگان اسلام بسيار آموزنده و رهگشاست ، پـايـدارى آنـان در برابر هجوم بى امان دشمن و ايستادگى در زير آتش مدام آنهاست . در زبان عربى از پايدارى به (صبر) ياد مى شود.
(صـبـر) خـويـشـتـن دارى و حـبـس نـفـس اسـت بـر چـيـزى كـه شـرع وعقل تقاضا مى كند يا از چيزى كه شرع و عقل ، انسان را از آن نهى مى كند.(206)
علامه طباطبايى (ره ) درتعريف آن مى فرمايد:
(صبر عبارت است از خوددارى از جزع و ناشكيبى و از دست ندادن امر تدبير)(207)
صـبـر وپـايـدارى ، يـكـى ازتـعاليم حياتبخش دين مقدس اسلام است كه جهادگران راه خدا را در پـيـروزى بـر كـفـر جـهـانى استوار ومحكم مى سازد و ريشه بسيارى از ارزشها وكمالات معنوى انـسـان اسـت . اهـمـيـّت ايـن مـوضـوع را در سـفـارشـهـاى مـكـرّر خـداونـد بـه رسـول گـرامـى اش در مـى يـابـيـم كه در موارد مختلفى آن حضرت را به صبر و پايدارى امر كرده است :
(فَاصْبِرْ كَما صَبَرَ اُولُواالْعَزْمِ مِنَ الرُّسُلِ)(208)
(اى رسول ما) توهم مانند پيامبران اولواالعزم صبور باش .
(فَاصْبِرْ صَبْراً جَميلاً)(209)
(اى رسول ما) صبرى نيكو پيش گير.
در آيـات فـراوانى ، صبر و پايدارى مورد تشويق قرار گرفته ، صابران به عنوان محبوب خداوند معرفى شده اند و نتايج شگفت آور صبرشان بيان شده است . چنان كه مى فرمايد:
(وَلَنَجْزِيَنَّ الَّذينَ صَبَرُوا اَجْرَهُمْ بِاَحْسَنَ ما كانُوا يَعْمَلُونَ)(210)
كسانى را كه صبر كردند پاداش نيكوتراز آنچه انجام داده اند، مى دهيم .
(وَاللّهُ يُحِبُّ الصّابِرينَ)(211)
خداوند صابران را دوست دارد.
صبر درميدان نبرد
يكى از موارد مهمّ صبر وپايدارى ، صبر در برابر دشمن و در ميدان نبرد است .
مـيـدان نـبـرد، مـيـدان سختيها، مشكلات ، كمبودها، نارساييها، فشار دشمن ، زخمى شدن ، زخميها و شـهـيـدان را ديـدن ، بـى خـوابيها، خستگيها، دست نيافتن به اهداف ، ناجوانمرديهاى پاره اى از هـمـرزمـان و هـمراهان ، نداشتن امكانات كافى براى نبرد، مشاهده قدرت دشمن ، برترى سلاح و نـيـروهـاى نـظـامـى و آمـوزشـى و... اسـت . هـيـچ جـا مـثل ميدان نبرد، جاى پايدارى نيست . به همين دليـل هـم آيـات قـرآن درباره صبر اكثراً در مورد صبر درميدان نبرد آمده ،دلدارى و وعده نصرت داده ، مى فرمايد:
(يا اَيُّهَاالَّذينَ امَنُوا اِنْ تَنْصُرُواللّهَ يَنْصُرْكُمْ وَ يُثَبِّتْ اَقْدامَكُمْ)(212)
اى كسانى كه ايمان آورده ايد، اگر خدا را يارى كنيد، شما را يارى خواهد كرد و پايدارى خواهد بخشيد.
در جاى ديگر مساءله دعا را براى تقاضاى پايدارى و ثبات قدم ، مطرح كرده ، مى فرمايد:
(رَبَّنـا اَفـْرِغْ عـَلَيـْنـا صـَبـْراً وَ ثـَبِّتْ اَقـْدامـَنـا وَ انـْصـُرْنـا عـَلَى الْقـَوْمـِ الْكافِرينَ)(213)
پروردگارا! بر ماشكيبايى ببار و ما را ثابت قدم گردان و بركافران پيروز ساز.
بـديـهى است كه ميدان نبرد، بهترين جايگاه تشخيص مجاهدان صبور از غير صابران است . ممكن اسـت افرادى براى رفتن به جبهه سرو دست بشكنند و اعلام آمادگى كنند، ولى در برابر آتش پرحجم و سنگين دشمن وتهاجمات گسترده او پايدار و مقاوم نباشند. بدين جهت خداوند رزمندگان اسلام را اين چنين در بوته آزمايش قرار مى دهد. و مى فرمايد:
(وَلَنَبْلُوَنَّكُمْ حَتّى نَعْلَمَ الْمُجاهِدينَ مِنْكُمْ وَالصّابِرينَ وَنَبْلُوَ اَخْبارَكُمْ)(214)
شما را مى آزماييم تا مجاهدان و صابرانتان را بشناسيم و حديثتان را آشكار كنيم .
(اَمْ حـَسـِبـْتـُمْ اَنْ تـَدْخـُلُوا الْجـَنَّةَ وَلَمـّا يـَعـْلَمِ اللّهُ الَّذيـنَ جـاهـَدُوا مـِنـْكـُمْ وَ يـَعـْلَمـَ الصّابِرينَ)(215)
آيـا مى پنداريد كه به بهشت خواهيد رفت و حال آنكه هنوز براى خدا معلوم نشده است كه از ميان شما چه كسانى جهاد مى كنند و چه كسانى پايدارى مى ورزند.
درنـبـرد مـعـروف (صـفـين ) پيش از آغاز جنگ ، اميرمؤ منان عليه السلام به رزمندگان همراه خود خطاب كرده ، فرمود:
(شـما انشاء الله فردا با دشمن درگير خواهيد شد، پس امشب را بيشتر در نماز باشيد، تلاوت قرآن را كثرت بخشيد و از خداوند پايدارى و نصرت (پيروزى ) بخواهيد.)(216)
حـضرت سيدالشهدا عليه السلام نيز به صبر و پايدارى در ميدان نبرد جلوه اى ديگر بخشيد. آن حضرت در روز عاشورا، هنگامى كه برخى ازنوجوانان بنى هاشم و فرزندان ابوطالب به دشمن حمله كردند، آنان را به صبرى بصير دعوت كرده ، فرمود:
(صـَبـْراً يـا بـَنـى عـَمـُومـَتـى ، صـَبـْراً يـا اَهـْلَ بـَيـْتـى ، وَاللّهِ لا رَاءَيـْتـُمْ هُواناً بَعْدَ هذَا الْيَوْمِ)(217) اى عـموزادگان من واى خاندان من پايدارى كنيد! به خدا سوگند پس ازامروز روى ذلّت و خوارى را نخواهيد ديد.
وخـود نـيـز پـس ازآنـكـه شـاهـد شـهـادت عزيزترين يارانش در راه خدا بود و تا آخرين لحظات حياتش ، حماسه بزرگ وتاريخى خويش را بر ضد دشمنان اسلام آفريد. در واپسين دم حيات ، وقـتـى در پـى ضـربات نيزه ها و شمشيرهاى دشمنان بر روى خاك قرار گرفت و در خون خود طپيد، رو به درگاه خدا كرد و با محبوب خويش چنين مناجات كرد:
(صـَبْراً عَلى قَضائِكَ يا رَبِّ لا اِلهَ سِواكَ، يا غِياثَ الْمُسْتَغيثينَ، مالى رَبُّ سِواكَ وَ لا مَعْبُودَ غَيْرُكَ، صَبْراً عَلى حُكْمِكَ، يا غِياثَ مَنْ لا غِياثَ لَهُ)(218)
اى پـروردگـار كـه جز تو خدايى نيست ، در مقابل قضا و قدر تو صبور هستم ، اى فريادرس دادخـواهـان ! پـروردگـار و معبودى جز تو براى من نيست . بر حكم و تقدير تو شكيبا هستم . اى فرياد رس آن كه فرياد رس ندارد.
نكوهش فرار از نبرد
يـكـى از عـوامـل مـهـم شـكـسـت در جـنـگـهـا، فـرار از نـبـرد اسـت كـه آثـار غـيـر قـابل جبرانى دارد. قرآن كريم فرار از نبرد را سخت نكوهش كرده و با تعبيرهاى گوناگونى از آن منع مى كند: (يا اَيُّهَا الَّذين آمنُوا اِذا لَقيتُمُ الَّذينَ كَفَرُوا زَحْفاً فَلا تُوَلُّوهُمُ الاَْدْبارَ وَ مَنْ يُوَلِّهَمْ يَوْمَئِذٍ دُبُرَهُ اِلاّمـُتـَحـَرِّفـاً لِقِت الٍ اَوْ مُتَحَيِّزاً اِلى فِئَةٍ فَقَدْ باءَ بِغَضَبٍ مِنَ اللّهِ وَ مَاءْويهُ جَهَنَّمَ وَ بِئْسَ الْمَصيرُ)(219)
اى اهـل ايمان ، هرگاه در ميدان كارزار، با انبوه كافران رو به رو شديد، به آنان پشت نكنيد و نـگـريـزيـد. هـر كـس هنگام جنگ به آنهاپشت كند (و فرار نمايد) ـ مگر آنكه براى نيروى ديگر كـنـاره گـيرى كند يا (براى بالا بردن توان رزمى خويش ) به گروهى از مسلمانان بپيوندد ـ به خشم خدا روى آورده وجايگاهش دوزخ است و بد سرانجامى است .
در نـبـرد بـدر هـنـگـامـى كـه فـرشـتـگـان بـه يـارى مسلمانان آمده و مژده پيروزى دادند. خداوند رزمـنـدگـان اسـلام را خـطـاب قـرار داد و از فـرار در مـقـابـل نـيـروهاى كفر باز داشت . بديهى است كه مخاطب آيه خصوص بدريان نيستند بلكه همه مسلمانان حاضر در جبهه اند كه مبادا در مقابل دشمن فرار را بر قرار ترجيح دهيد كه نتيجه اش روى آوردن بـه غـضـب خـداونـد و عـذاب دوزخ اسـت . از ايـن آيه بر مى آيد كه فرار از نبرد، از گـنـاهـان كـبـيـره اسـت ؛ زيـرا گـنـاه كـبـيـره آن اسـت كه در قرآن وعده عذاب به آن داده شده است .(220)
در روايات اهل بيت عليهم السلام نيز فرار از جنگ سخت مورد نكوهش قرار گرفته كه به بيان دو روايت بسنده مى كنيم . امير مؤ منان عليه السلام مى فرمايد:
(اَلْفِرارء مِنَ الزَّحْفِ مِنَ الْكَبائِرِ)(221)
فرار از جنگ ، از گناهان كبيره است .
حضرت موسى بن جعفر عليه السلام مى فرمايد:
(مَنِ انْهَزَمَ حتّى يَجُوزَ صَفَّ اَصْحابِهِ فَقَدْ باءَ بِغَضَبٍ مِنَ اللّهِ)(222)
هر كس به اندازه اى عقى نشينى كند كه از صف و موضع نيروهاى خودى بگذرد، به تحقيق مورد خشم خدا قرار گرفته است .
شيوه هاى برخورد با فراريان
در اينجا به بيان برخى از شواهد تاريى درباره برخورد با فراريان مى پردازيم :
الف ـ نـكـوهـش : بـرخـورد مـعـصـومين عليهم السلام با متخلفان و فراريان ، متناسب با شرايط سـيـاسـى ـ اجـتـمـاعـى و روحـيـات مـجـرم و ميزان سازندگى و عبرت آموزى آن در شخص مجرم و ديـگـران بـود بـه عنوان مثال اگر نيروها پيش از دستيابى به اهداف از پيش تعيين شده ، پشت به دشمن كرده بودند و در اسلام سابقه خوبى داشتند و پيش از آن ، در جهاد با مشركان شركت كـرده و از خـود فـداكـارى و جـانبازى نشان داده بودند، فقط مورد نكوهش و ملامت شديد قرار مى گرفتند و درباره آنان از موضع گيرى شديدتر خوددارى مى شد:
(در نـبـرد خـيـبـر هـنـگـامى كه پيامبر اكرم صلى الله عليه و آله ديد برخى از فرماندهان ، در بـرابـر حـمـلات يـهـود خـيـبر تاب مقاومت ندارند واز برابر آنان مى گريزند و اهداف از پيش تعيين شده به دست نمى آيد، بر آنان خشم گرفت و فرمود:
(چرا برخى ، از دشمن مى گريزيد و ديگران را نيز به هراس مى افكنند؟)(223)
ب ـ اظـهـار خـشـم و نـارضـايـتـى : كـسـانـى كـه بـر اثـر حـمـله سـنـگـيـن دشـمـن و يـا عـلل ديـگـر از بـرابـر دشـمـن مـى گـريـزنـد، ابـراز خـشـم و نـاخـوشـنـودى فـرمـانـده كـل قـوا نـسـبـت بـه آنان ، تاءثير شگرفى در روحشان مى گذارد. امام صادق عليه السلام مى فرمايد:
(در نـبـرد اُحـد وقـتـى نـيـروهـاى اسـلام از اطـراف پـيامبر (ص ) پراكنده شدند و پا به فرار گـذاشتند. رسول خدا (ص ) بشدّت بر آنان خشم گرفت و زمانى كه بر مى آشفت و خشمگين مى گـشـت ، پـيـشـانـى و صـورتش عرق مى كرد و قطره هاى عرق از پيشانى و صورت مباركش مى غلتيد.
در آن هـنـگـام امـيـر مـؤ منان را در كنار خود در حال دفاع و مقاومت مى ديد، به او فرمود: (چرا تو هـمـانـنـد ديـگـران فـرار نـمـى كـنـى ؟) حـضـرت فـرمـود: اى رسـول خـدا! آيـا پس از آنكه ايمان آورده ام كافر شوم ؟ من تو را اُسوه خويش قرار داده و همانند تو ايستادگى و مقاومت مى كنم .)(224)
ج ـ بى اعتنايى : نيروهايى كه براى دستيابى به هدف مشخصى ماءموريت مى يابند، ولى بر اثـر خـود بـاخـتـگى در مقابل قواى دشمن ، در انجام ماءموريت خود سستى مى كنند و بدون نتيجه گـيـرى بـه دشـمـن پـشـت كـرده و از بـرابـر او مـى گـريـزنـد، مـى بـايـسـت بـه شكل مناسبى با آنان برخورد شود تا ديگر به چنان عملى دست نزنند به عنوان نمونه :
پـس از آنـكـه مـشـركـان حـنـيـن پـراكـنـده شـدنـد، طـايفه اى از آنان به (طايف ) پناهنده شدند. رسـول خـدا (ص ) ابـوسـفـيـان را بـه (طايف ) اعزام كرد، ولى شكست خورده نزد پيامبر (ص ) بـرگـشـت و گـفـت : (نـيـروهايى را در اختيارم گذاشتى ... كه هيچ سودى برايم نداشتند.) آن حـضـرت بـه وى پاسخى نداد و خود به طايف رفت ، رهبرى عمليات را به عهده گرفت و دشمن را محاصره كرد.(225)
عوامل فرار از نبرد
فـرار از نـبـرد عـوامـلى دارد، كـه در ايـنـجـا بـه بـيـان دو عامل بسنده مى كنيم :
الف ـ ضعف ايمان : قوت ايمان به خدا، قيامت و پاداش الهى ، انسان را به پايدارى در دفاع از ديـن خـدا و قـلمـرو اسـلام و اسـتقلال مسلمانان وادار مى سازد. طبعاً هر چه ايمان قويتر باشد اين پـايـدارى بـيشتر است و هر چه درجه ايمان سست تر و ضعيف تر باشد اين پايدارى كمتر است تا جايى كه در بعضى از شرايط سخت نبرد افراد ضعيف الايمان مقاومت خود را از دست مى دهند و فـرار مـى كـنـند و سستى ايمان بعضى مانع ورود آنان به صحنه نبرد مى شود. از اين گونه ضـعـف ايـمـان در بـعـضـى آيـات تـعـبـيـر بـه نـفـاق شـده ، مـنـافـق در هـمـه مـوارد اسـتـعمال قرآنى كسى نيست كه به آنچه مى گويد هرگز ايمان ندارد، بلكه در بعضى موارد بـه كـسـى كـه ايـمـان قلبى به خدا و رسول دارد؛ اما قوت ايمان او در حدّى نيست كه او را به ايثار جان و مال وا دارد نيز منافق گفته شده است . به عنوان نمونه قرآن كريم مى فرمايد:
(... وَ يـَسـْتـَاءْذِنُ فَريقٌ مِنْهُمُ النَّبِىَّ يَقُولُونَ اِنَّ بُيُوتَنا عَوْرَةٌ وَ ماهِىَ بِعَوْرَةٍ اِنْ يُريدُونَ اِلاّ فِراراً)(226)
گروهى از منافقان (براى برگشت از ميدان جنگ ) از پيامبر اجازه خواسته ، مى گفتند: خانه هاى مـا ديـوار و حـفـاظى ندارد. در صورتى كه دروغ مى گفتند و مقصودشان تنها فرار از جبهه جنگ بود. ب ـ ناخالصى ها و گناهان : قرآن كريم با اشاره به فرار عده اى از جنگ احد كه كار ناشايست كرده بودند و شيطان با توجه به آن كارها، آنان را به لغزش فرار كشاند، مى فرمايد:
(اِنَّ الَّذيـنَ تـَوَلَّوْا مـِنـْكـُمْ يـَوْمَ الْتـَقـى الْجَمْعانِ اِنَّمَا اسْتَزَلَّهُمُ الشَّيْطانَ بِبَعْضِ ما كَسَبُوا ...)(227)
آنـان كـه از مـيان شما در روز مقابله آن دو گروه (در جنگ احد) گريختند، شيطان آنها را به سبب پاره اى از اعمالشان دچار لغزش كرده بود.
با توجه به اين بيان مى توان گفت ناخالصى ها و گناهان زمينه فرار از جنگ را هم فراهم مى سازند.
آثار سستى و فرار از جنگ
سـسـتـى يـا فـرار از جـنـگ بـطـور طـبـيـعـى آثـار ونـتـايـجـى بـه دنبال دارد كه به برخى از آنها اشاره مى كنيم :
الف ـ ويرانى پايه هاى دين و شعاير دينى : قرآن كريم مى فرمايد:
(... وَلَوْلا دَفـْعُ اللّهِ النـّاسَ بـَعـْضـَهـُمْ بـِبـَعـْضٍ لَهـُدِّمـَتْ صـَوامِعُ وَ بِيَعٌ وَصَلَواتٌ وَمَساجِدُ يُذْكَرُفيهَااسْمُ اللّهِ كَثيراً ...)(228)
اگـر خـدا( رخـصت جنگ ندهد و) دفع شرّ بعضى ازمردم را به بعضى ديگر نكند، همانا صومعه ها، ديرها و معبدهاى يهود و نصارا و مساجدى كه درآن نماز و ذكر خدا بسيار مى شود، همه خراب و ويران مى شد.
امـيـرمـؤ مـنـان عـليـه السـلام درخـطـاب به مردم زمان خود كه نسبت به جهاد در راه خدا سستى مى ورزيدند، مى فرمايد:
(وَلَعَمْرى لَوْكُنّا نَاءْتى ما اَتَيْتُمْ، ماقامَ لِلدّينِ عَمُودٌ وَلاَ اخْضَرَّ لِلاْ يمانِ عُودٌ)(229)
بـه جـان خـودم سـوگند! اگر رفتار ما (در يارى اسلام ) مانند رفتار شما بود ( ودر پيكار با دشـمـن مـانند شما سستى و سهل انگارى مى كرديم ) پايه اى براى دين بر قرار واستوار نمى شد و شاخه اى براى ايمان سبز و بارور نمى گرديد.
ب ـ تـضـعـيـف و تـعـطـيـل رهـبـرى حـق : نـمـونـه هـاى تـضـعـيـف وتـعـطـيـل رهـبـرى در تـاريخ اسلام زياد به چشم مى خورد، از جمله حضرت على (ع ) خطاب به مردمى كه فرمان جهادش را اطاعت نكردند، مى فرمايد:
(خـدا شـما را بكشد كه دل مرا چركين كرده ، سينه ام را از خشم آكنديد و در هر نفس پى درپى ، غـم وانـدوه بـه مـن خـورانـديـد و بـه سـبب نافرمانى و بى اعتنايى به من ، راءى و تدبيرم را فـاسـد كـرديـد، تـا اينكه قريش گفتند: پسر ابى طالب ، مردِ دليرى است و ليكن دانش رزمى ندارد. حواله پدرشان به خدا! آيا هيچ يك از آنان ممارست و جديّت مرا در جنگ داشته و پيش قدمى و ايـسـتـادگى او بيشتر ازمن بوده است ؟ هنوز به سنّ بيست سالگى نرسيده بودم كه وارد جنگ شـدم و اكـنـون زيـاده از شـصـت سـال از عـمـرم مـى گـذرد و هـنـوز در حـال نـبـردم ، ليـكـن چـه كـنـم ؟ كـسـى كـه اطـاعـت نـشـود، راءى و تـدبـيـرش سـودى ندارد.)(230)
امـام حـسـن مـجتبى عليه السلام نيز پس از آنكه بى وفايى ، سستى و نفاق فرماندهان و ساير يارانش را ديد، صلح معاويه بر آن حضرت تحميل شد، به آنان فرمود:
(بـه خـدا سـوگـنـد! اگـر يـاورى داشـتـم ، كـار را بـه مـعـاويـه نـمـى گـذاشـتـم . بـه خدا و رسول خدا سوگند! خلافت بر بنى اميّه حرام است .)(231)
ج ـ تـسـلّط و غـلبـه دشـمـن : وقـتـى كـه افراد يك جامعه از مقابله و ايستادگى در برابر دشمن خـوددارى ورزند و در دفاع از حق خود، سستى كنند، روحيه دشمن قوى شده و جراءت پيدا مى كند كه باهجومى همه جانبه ، تسلّط خود را بر سرزمين وامور حياتى آن ملّت تثبيت كند و اين يكى از آثار شوم ترك و سستى در جهاد است .
على عليه السّلام مى فرمايد:
(غُلِبَ وَاللّهِ الْمُتَخاذِلُونَ)(232)
به خدا سوگند! آنان كه يكديگر را رها كرده و يارى نكردند، مغلوب شدند.
د ـ ذلت وخوارى : اميرمؤ منان عليه السلام مى فرمايد:
(... فَمَنْ تَرَكَهُ رَغْبَةٌ عَنْهُ اَلْبَسَهُ اللّهُ ثَوْبَ الذُّلِّ)(233)
هـر كس جهاد را از روى بى رغبتى ـ نه از روى عذر شرعى ـ ترك كند، خدا او را لباس ذلت مى پوشاند.
هـ ننگ وعار در پيشگاه آيندگان : على (ع ) در دعوت مردم به ادامه جنگ با معاويه مى فرمايد:
(بـدانـيـد كـه خـدا شـمـا را در نـظـر دارد (اعـمـال شـمـا را مـى بـيـنـد) و بـا پـسـر عـمـوى رسول خدا(ص ) مى باشيد، پس پى در پى (به دشمن ) حمله كنيد و از گريختن شرم نماييد؛ ز يـرا فـرار، نـنـگ بـراى اعـقـاب اسـت (فـرزنـدانـتـان را بـعـد ازشـمـا سـرزنـش خـواهـنـد كرد)...)(234) ونيز مى فرمايد:
(اِنَّ فِى الْفِرارِ مَوْجِدَةَ اللّهِ وَالذُّلَّ اللاّزِمَ، وَالْعارَالْباقِىَ)(235)
فرار از جنگ ، سبب خشم خدا و ذلّت هميشگى و ننگ پايدار است .
پايدارى در برابر توطئه هاى استكبار جهانى
جـنـگ و دفـاع انـواعـى دارد؛ گـاهـى جـنگ نظامى است ، دفاع نيز بايد نظامى باشد، گاهى جنگ سـيـاسـى يـا اقـتـصـادى است ، دفاع هم بايد مناسب آن باشد، گاهى نبرد، فرهنگى است . طبعاً دفاع نيز بايد فرهنگى باشد.
در نـبـرد نـظامى دشمن رو به رو و شناخته شده است ، ابزار جنگى ، توان نظامى ، تعداد نيرو ومـوضـع اسـتـقـرار هـمـه مـشـخـص اسـت . انـگـيـزه دفـع دشـمـن نـيـز بـه دليـل مـاهـيـت نظامى آن قوى است ؛ اما در نبرد فرهنگى ، دشمن رو در رو قرار نمى گيرد، بلكه بـا اسـتـفـاده ازوسـايـل پـيـچـيـده و پـيـشـرفـتـه ارتـبـاطـات ، پـيـامـهـاى خـود را ارسال مى كند، دغدغه ضد حمله هم ندارد، اصولاً دشمن تا حدود زيادى شناخته شده نيست .اهداف و انگيزه ها، ابزارها و شيوه ها نيز شناخته شده نيست ؛ يعنى گاهى حتى بين نيروى خودى و دشمن در ايـن نـبـرد اختلاط عجيبى صورت مى گيرد، موضع استقرار دشمن نيز مكان فيزيكى مشخصى نـيـسـت ، بـلكـه در فـضـا، در زمين ، در كوچه و بازار، درمدارس و دانشگاهها، حتى درخانه هاو... حضور پيدا مى كند.
چـنـيـن نبردى از ناحيه دشمن بسيار آسان و دفاع در برابر آن بسيار دشوار است . اينجاست كه موارد زير ضرورت دارد:
1ـ دشمن شناسى شود.
2ـ حساسيت لازم نسبت به دشمن پديد آيد.
3ـ بـا توجه به نوع نبرد ـ كه فرهنگى است ـ مرز بين خودى و دشمن مشخص شود؛ گاهى پدر و مـادر، دوست و همكار، فرزندان و ساير بستگان و گاهى نيز كارگزاران فرهنگى دقيقاً دشمن اند يا در اختيار دشمن قرار گرفته اند.
4ـ راه كـارهاى دشمن شناخته شود و نسبت به سدّ ثغور و بستن راههاى نفوذ دشمن اقدام جدّى به عمل آيد.
5ـ تـنـهـا بـه دفـاع ، بـسـنـده نـشـود، بـلكـه در صـورت امـكـان هـجـوم بـنـيـادى متقابل صورت گيرد. 6ـ آثـار ايـن گـونـه تـهاجم كه از بين رفتن استقلال سياسى ، اقتصادى و نابود شدن عزّت و قدرت جامعه اسلامى است ، عميقاً در ك و گوشزد گردد.#(236)
7ـ اقدام به كار اساسى فرهنگى براى ريشه دار كردن تفكرات دينى صورت گيرد.
8ـ نـمـودهـاى تـهـاجـم فـرهـنـگـى افـشـاء و بـرجـسـتـه شـود،مانند لباس ، غذا، آداب معاشرت ، وسايل زندگى ، تفريح ، الفاظ و عبارات داراى بار فرهنگى ، علوم ومعارف بشرى ، فلسفه ها ومكاتب فلسفى ، ادبيات و هنر منحرف و... .
آثار پايدارى درميدان نبرد
الف ـ پـيـروزى : پايدارى درميدان نبرد يكى از موجبات پيروزى است . اميرمؤ منان عليه السلام به لشكريانش فرمود:
(بـدرسـتـى كـه دروازه جـنـگ بين شما و اهل قبله (كه خود را مسلمان مى دانند، ولى درواقع مسلمان نـيـسـتـنـد) گـشـوده خـواهد شد و قادر به گرفتن اين پرچم (براى جنگ و پيروزى ) نيست ، مگر كسى كه داراى صبر و شكيبايى بوده و آگاه نسبت به مواضع حق باشد.)(237)
ب ـ بـقـاء اسـلام وجـامـعـه اسـلامى : اسلام و جامعه اسلامى به واسطه ثبات قدمها و استقامتهاى رسـول خـدا صـلى الله عـليـه وآله و يـاران و فادارش ، پايدار مانده است . در زمان ما نيز اگر فـداكـارى و پـايدارى رزمندگان عزيز اسلام و ملّت فداكار ايران نبود، اسلام و جامعه اسلامى به خطر مى افتاد.
ج ـ عـزّت و اسـتـقـلال مـسـلمـانان : عزّت و سربلندى جامعه اسلامى در سايه جهاد و پايدارى در برابردشمن است . على عليه السلام مى فرمايد:
(خداوند جهاد را براى ارجمندى اسلام واجب گردانيد.)(238)
رسول خدا(ص ) نيز مى فرمايد:
(اُغْزُوا تُورِثُوا اَبْنائَكُمْ مَجْداً)(239)
(در راه خدا) پيكار كنيد، تا شوكت ، عظمت وافتخار فرزندانتان را فراهم سازيد.
د ـ گسترش ايمان : هدف اصلى از پيكار در راه خدا و پايدارى در اين راه ، اين است كه نشانه ها و دلايـل هـدايـت مـلّت بـه آنـهـا نـشـان داده شـود، گـمـراهـان هـدايت يابند و ايمان درجامعه بشرى گسترش يابد.
نـمونه زنده تاءثير مقاومت در نبرد در گسترش اسلام وايمان به خدا در جامعه بشرى پايدارى رزمندگان اسلام در دفاع مقدس هشت ساله است .
هـ ايـجـاد امـنـيـت : پـايـدارى درميادين نبرد، امنيت را براى جامعه اسلامى درجهت خودسازى معنوى ، سازندگى اقتصادى و... به ارمغان مى آورد.
نظم و انضباط
(نـظـم ) در لغـت بـه مـعـنـاى آراسـتـن ، بـرپاداشتن ، ترتيب دادن كار و...(240) و در اصـطـلاح نـظـامـى به معناى پيروى كامل از دستورهاى نظامى است .(241) انضباط نيز بـه مـعـنـاى نـظـم وانـتظام ، ترتيب و درستى ، عدم هرج و مرج ، سامان پذيرى و آراستگى است .(242)
نظم در آفرينش
آفـريـنـش بـر اسـاس نـظـم اسـتـوار اسـت و در دسـتـگـاه خلقت ، هر پديده اى جاى خاصى دارد و مـاءمـوريـت وكـار ويـژه اى بـه عـهـده دارد. كـرات آسـمـانـى درمـدار مـعـيـّنـى حـركـت مـى كـنـنـد، فـصـول سـال و گـذشـت شـب وروز نـظـم خاصى دارد و خلقت اشيا از اندازه ، حدّ و ميزان خاصى برخوردار است . خداى تعالى مى فرمايد:
( اِنّا كُلَّ شَىْءٍ خَلَقْناهُ بِقَدَرٍ)(243)
ما هرچيزى را به اندازه (وروى حساب ) آفريديم .
حـكـمـت خـداونـدى در هـر چـيز تجلّى يافته و موجودات عالم نيز روى حساب ونظم دقيق و نيز بر اساس هدف معيّنى قدم به عرصه هستى نهاده اند.
جهان چون خدوخال وچشم وابروست كه هرچيزى بجاى خويش نيكوست
نـظـم شگفت ومحيرالعقولى كه درهمه مخلوقات ، حركت سيّاره ها و ستارگان ، گياهان ، موجودات دريـايـى وصـحـرايـى ، بـدن انـسـان ، گـردش خـون و... وجـود دارد، هـمـه و هـمـه معلول تدبير خداوند حكيم ، مدبّر وتواناست .
اهميت نظم در زندگى
خـداى تـوانـاو حـكـيـمى كه نظم را در دستگاه پهناور وعظيم خلقت قرار داده است ، همين نظم را در زندگى انسانها و روابط اجتماعى آنان مى پسندد. از اين رو، شايسته است كه انسان درزندگى فـردى و اجـتـمـاعـى خـويـش ، نـظـم و تـرتـيـب و تـدبير درامور را مراعات كند؛ زيرا به گفته روانشناسان :
( احـتـيـاج بـه نـظـم و تـرتـيـب ، جـزء احـتـيـاجـات اسـاسـى روانـى مـحـسوب مى گردد، رنگ و شـكـل خـاصـى بـه زنـدگـى مـى دهد، افراد ميل دارند زندگى فردى وجمعى خود را تحت نظم و قاعده مشخصى در آورند.)(244)
نـگـاهـى گـذرا بـه حـجـم زيـاد كـتـابـهـاى قـوانـيـن و مـقـررات و بودجه هاى هنگفتى كه صرف قـانـونـگـذارى وتـنـظـيـم آنـهـا مـى شـود واهـمـيـتـى كـه هـمـه مـلل جـهان به آنها مى دهند، ضرورت ولزوم نظم فردى واجتماعى را در زندگى بشر آشكار مى سازد.
اسـلام نـيـز به عنوان دين جهانى وكامل به نظم و برنامه ريزى درزندگى اهميت فراوان داده و بـه پـيـروان خـويـش سفارش كرده كه تمام كارهاى خود را طبق قانون و به صورت منظم انجام دهـنـد و از بـى بـرنـامگى بپرهيزند. چرا كه تمام احكام اسلامى ؛ واجبات ، مستحبات ، محرّمات ، مـكروهات و... در اين راستا و درجهت برنامه دقيق و منظم دادن به مسلمانان قرار داده شده كه آنان را تحت نظم خاصّى در آورد.
در دنـيـاى كـنـونى نيز حركت قطارها، هواپيماها، ساعات كار ادارات و كارخانجات و... روى نظم خـاصـى و بـا دقـيـقـه و ثـانـيه سنجيده مى شود و با ورود كامپيوتر درعرصه زندگى نظم و تـرتـيـب دقـيـقـتـر و بـهـتـر صـورت مـى گيرد و مى توان گفت امروزه منظّم زندگى كردن جزء ضـروريات زندگى بشر شده و مورد پسند عقل و دين است و اگر بخواهيم خود را از دايره نظم كـه امـروزه هـمـه جـامـعه ها را تا حدّ زيادى فرا گرفته و احاطه كرده ، خارج كنيم ، با مشكلات زيادى رو به رو مى شويم .
نظم در قرآن
بـخـش عـظـيـمـى از دسـتـورات وسـفـارشـات قـرآن كـريـم در راسـتـاى تـنـظـيـم انـديـشـه و اعمال انسان است . امير مؤ منان عليه السلام مى فرمايد:
(اَلا اِنَّ فيهِ عِلْمَ ما يَاءْتى وَالْحَديثَ عَنِ الْماضى وَدَواءَ دائِكُمْ وَنَظْمَ مابَيْنَكُمْ)(245)
آگاه باشيد كه آگاهى از آينده ، خبراز گذشته ، داروى درد(نادانى وگمراهى ) ونظم وترتيب زندگى روزمرّه شما در قرآن (آمده ) است .
بيان قرآن كريم را درباره نظم مى توان به دو بخش تقسيم كرد:
الف ـ نـظـم درتـكوين : قرآن در اين بخش ، نظم حاكم بر جهان آفرينش را تشريح كرده و به انـسانها سفارش مى كند كه درباره آن بينديشند. تا به طرّاح زبردست آن (خداى تعالى ) پى بـبـرنـد و درايـن راسـتـا، گاه از فرود آمدن باران و رويش گياهان ياد مى كند و گاهى از عظمت آسـمـان ، كـوهـهـا و دريـاهـا سـخـن مـى گويد. زمانى شگفتيهاى آفرينش موجودات واز جمله انسان راتذكر مى دهد و در بسيارى از مواقع نيز آمد و شد شب و روز، فراوانى پديده هاى هستى و بى شـمارى نعمتهاى الهى را در لابه لاى آيات بيان مى كند و انسان را به تفكر در نظم شگفت آور آن وامى دارد. به عنوان نمونه مى فرمايد:
( اِنَّ فـى خـَلْقِ السَّمـاواتِ وَالاَْرْضِ وَ اخـْتـِلافِ اللَّيـْلِ وَالنَّهـارِ لاَ يـاتٍ لاُِولىِ الاَْلْبابِ)(246)
همانا در آفرينش آسمانها و زمين و آمد و شد شب و روز، نشانه هايى براى خردمندان است .
ب ـ نـظـم در تـشـريـع : هـمـه آيـاتـى كـه در بـاره قـوانـيـن و مـقـررات الهـى نـازل شـده ، بـر قـرار كـننده نظم و برنامه در زندگى فردى واجتماعى مسلمانان است . با اين بـيـان ، قـرآن هـمـواره پـيـروان خـويـش را بـه داشـتن يك برنامه صحيح و منظّم دعوت مى كند و خواستار آن است كه مسلمانان در زندگى به اصول و مقررات الهى پاى بند بوده ، طبق برنامه اى كـه خـدا بـراى آنـان تنظيم كرده ، زندگى كنند و هيچ گاه از حدود الهى گام فراتر ننهند. چرا كه :
(مَنْ يَتَعَدَّ حُدُودَ اللّهِ فَاُولئِكَ هُمُ الظّالِمُونَ)(247)
آنان كه از حدود الهى تجاوز كنند، همانان ستمكارانند.
از ايـن رو، مـى تـوان گـفـت يـكـى از اهداف مهمّ پيامبران الهى ، تنظيم برنامه زندگى انسانها درتـمـام ابعاد آن بوده و در صدد بودند تا جامعه طبق برنامه تنظيمى از جانب پروردگار به زندگى خويش ادامه دهد و از آن تخطّى نكند.
بـه عـنـوان مـثـال قـرآن بـراى انـجـام عبادتهاى اسلامى وقت و برنامه اى تنظيم كرده ، تا همه مـسـلمانان در آن وقت معين به عبادت بپردازند. چنان كه براى روزه گرفتن ، ماه مبارك رمضان را معلوم كرده و ابتداء و انتهاى روزه هر روز را معلوم كرده است و مى فرمايد:
(... كـُلُوا وَاشـْرَبـُوا حـَتـّى يـَتـَبـَيَّنَ لَكُمُ الْخَيْطُ الاَْبْيَضُ مِنَ الْخَيْطِ الاَْسْوَدِ مِنَ الْفَجْرِ ثُمَّ اَتِمُّوا الصِّيامَ اِلَى اللَّيْلِ)(248)
بـخـوريـد و بـيـاشـامـيـد تا رشته روشن صبحدم در تاريكى شب آشكار شود و روزه را به شب برسانيد.
و در جـاى ديـگـر افـرادى را كـه در امـور اجـتـمـاعـى خـود، مـنـظـم و هـمـاهـنـگ و بـا اجـازه رهـبـرى عمل مى كنند، در زمره مؤ منان قرار داده و آنان را چنين مى ستايد:
(اِنَّمـَاالْمـُؤْمـِنـُونَ الَّذيـنَ امـَنـُوا بـِاللّهِ وَ رَسـُولِهِ وَ اِذا كانُوا مَعَهُ عَلى اَمْرٍ جامِعٍ لَمْ يَذْهَبُوا حَتّى يَسْتَاءْذِنُوهُ)(249)
مـؤ مـنـان كـسـانى هستند كه به خدا و پيامبرش ايمان آورده اند و چون با پيامبر دركارى همگانى باشند، تا از او رخصت نطلبيده اند نبايد بروند.
در آيـه اى ديـگـر نـيـز، رزمندگان راهش را كه منظم ، محكم و استوار وارد پيكار مى شوند، مورد محبت خود قرار داده ، مى فرمايد:
(اِنَّ اللّهَ يُحِبُّ الَّذينَ يُقاتِلُونَ فى سَبيلِهِ صَفّاً كَاَنَّهُمْ بُنْيانٌ مَرْصُوصٌ)(250)
خـداوند دوست دارد كسانى را كه در راه او در صفى ، همانند ديوارى كه اجزايش را با سرب به هم پيوند داده باشند، مى جنگند.
نظم در روايات
نـظـم و انـضـبـاط در روايـات اسـلامى نيز مورد تاءكيد قرار گرفته است . به عنوان نمونه ، امـيـرمـؤ مـنـان عـليـه السـلام كـه بـارهـا نـتـايـج زيـانـبـار بـى نـظـمـى و تـشـتـّت را در فـكر وعـمـل مـسـلمانان ديده بود، در بستر شهادت و در آخرين پيامش ، فرزندان خود و مسلمانان را به تقواى الهى ونظم دركارها فراخوانده ، مى فرمايد:
(اُوصيكُما وَجَميعَ اَهْلى وَ وَلَدى وَمَنْ بَلَغَهُ كِتابى بِتَقْوَى اللّهِ وَنَظْمِ اَمْرِكُمْ)(251)
شـمـا را (اى حـسـن و حـسين ) وهمه خانواده و فرزندانم و هر كس را كه نوشته من به او مى رسد، به تقواى الهى و نظم دركارهايتان سفارش مى كنم .
و در عهدنامه مالك اشتر رعايت نظم را با عباراتى ديگر اينچنين سفارش مى كند:
(... اِيـّاكَ وَالْعـَجـَلَةَ بـِالاُْمـُورِ قـَبـْلَ اَوانـِهـا، اَوِ التَّساقُطَ فيها عِنْدَ اِمْكانِها اَوِاللَّجاجَةَ فيها اِذا تـَنـَكَّرَتْ، اَوِ الْوَهـْنَ عـَنـْهـا اِذَا اسـْتـَوْضـَحـَتْ، فـَضـَعْ كـُلَّ اَمـْرٍ مـَوْضـِعـَهُ وَاَوْقـِعْ كـُلَّ عـَمـَلٍ مَوْقِعَهُ)(252)
ازعـجـله درمـورد كـارهـايـى كـه وقـتـشـان نـرسـيـده ، يـا سـسـتـى دركـارهـايـى كـه امـكـان عـمـل آن فـراهـم شـده ، يـا لجـاجت در امورى كه مبهم است ، يا سستى دركارها هنگامى كه واضح و روشن است ، بر حذر باش ! و هرامرى را در جاى خويش و هركارى را به موقع خود انجام بده .
موارد نظم
الف ـ نـظـم دراوقـات شـبـانه روز: نظم در زندگى يك مسلمان بر محور عبادت خدا ـ كه هدف از زنـدگـى اسـت ـ پديد مى آيد. يك مسلمان هنگام اذان صبح براى نماز بر مى خيزد و پس از نماز بـه تلاوت آياتى از قرآن مى پردازد، سپس اقدام به ورزش مناسب يا مختصرى استراحت ، پس از صـرف صـبـحـانـه به كار روزانه مى پردازد، نزديك اذان ظهر دست از كار برداشته براى نـمـاز ظـهـر و سـپس عصر آماده مى شود، پس از نماز به صرف غذا و مقدارى استراحت پرداخته ، دوبـاره كـار را آغـاز مى كند، نماز مغرب و عشا را به موقع ادا كرده و پس از ديدار با دوستان ، بـسـتگان ، گفتگو با خانواده ، يا هر تفريح و جلسه مشروع ديگر وقتى به خواب مى رود كه بـتـوانـد نـمـاز صـبـح خود را سروقت بخواند. اين است معناى سخن حضرت موسى بن جعفرعليه السلام كه به پيروانش سفارش مى كند:
(بـكـوشـيد كه اوقات خود را چهار قسمت كنيد: بخشى براى مناجات با خدا، ديگرى براى امرار مـعاش ، سوّم براى معاشرت با برادران و معتمدانى كه عيوبتان را به شما مى گويند و قلباً بـه شـما اخلاص دارند. چهارم براى لذّتها و كاميابيهاى مشروع . با اين بخش (چهارم ) است كه بر سه بخش ديگر نيرو مى گيريد.)(253)
ب ـ نـظـم فـكـرى : اگـر انـسـان زندگى خود را طبق بينش اسلامى نظم بدهد و بكوشد گفتار، رفـتـار و حركاتش منظم و مطابق برنامه دقيق اسلام باشد، نظم فكرى پيدا مى كند و هيچ گاه دچار تزلزل فكرى و عقيدتى نمى شود. حضرت امام خمينى (ره ) در اين باره مى فرمايد:
(اگـر در زندگى مان ، دررفتار و حركاتمان نظم بدهيم ، فكرمان هم بالطبع نظم مى گيرد، وقتى فكر نظم گرفت ، يقيناً از آن نظم فكرى الهى هم برخوردار خواهد شد.)(254)
ج ـ نـظـم درمـصـرف : نـظـم درمـصـرف بـه مـعـنـاى داشـتـن حـسـاب و بـرنـامـه دقـيـق در دخـل و خـرجـهـا و مـصـرفـهـاسـت كـه درايـن امـور، اعـتدال را رعايت كرده و از زياده روى و اسراف بپرهيزند. چنان كه قرآن كريم بندگان خوب خود را اين گونه مى ستايد:
(وَالَّذينَ اِذا اَنْفَقُوا لَمْ يُسْرِفُوا وَلَمْ يَقْتُرُوا وَكانَ بَيْنَ ذالِكَ قَواماً)(255)
(بندگان خداى رحمان ) كسانى هستند كه هرگاه انفاق (هزينه ) كنند نه اسراف كنند و نه تقتير (دسـت خـشـكـى ) و (هـزيـنـه زنـدگـى آنـان ) بـيـن ايـن دو در شـرايـط متعادل است .
د ـ نـظـم درامـورنـظـامـى : پـايـبـنـدى به نظم و انضباط بويژه درامورنظامى از اهميت بالاترى برخوردار است . يك نيروى نظامى بايد در كيفيت پوشيدن لباس نظامى ، سروقت حضور يافتن درمـحـل كار، به غير كار موظّف نپرداختن مقيّد باشد، براى دفاع از اسلام و ميهن اسلامى آمادگى كـامـل داشـته باشد، سلسله مراتب نظامى را رعايت كند. احترام مقامات مافوق خود را نگه دارد، در بـر خـورد بـا هـمـكـاران هـمـرديـف و... مـنـظـم و مـنـضـبـط بـاشـد. تفصيل بيشتر اين بخش در درس آينده مى آيد.
ضرورت نظم در نيروهاى نظامى
چـنـانـكـه از واژه (نـظامى ) بر مى آيد، نظم وانضباط ازشرايط حياتى نيروهاى نظامى است . اگـر نـيـروى نظامى منظم و منضبط نباشد نمى تواند هويت شغلى خود را حفظ كند، تا چه رسد بـه ايـنـكـه حـافـظ كـشور و مرزهاى آن درمقابل بى نظميهاى داخلى و خارجى باشد. چگونه مى تـوان از نـيـروى فـاقـد نـظم و برنامه انتظار داشت كه آشوب طلبى و دست درازى بيگانه يا هرج و مرج داخلى را نابود كند و نظام مملكت را حفظ نمايد؟!
خشك ابرى كه بود زآب تهى نايد از وى صفت آبدهى
اهـمـيـت نـظـم درامـورنـظامى به حدى است كه علاوه بر رعايت دقيق آن در ارتشهاى بزرگ جهان ، گـروههاى چريكى و پارتيزانى نيز اصولى مربوط به خود دارند كه نظم و انضباط در آنها منظور شده است .
تـاريـخ اسـلام نـشـان مـى دهـد كـه درجـنـگـهـاى صـدر اسـلام نـيـز، مـسـلمانان با نظم وانضباط كامل حضور يافته و با ايمان واعتقادى كه به هدف و راه خويش داشتند، پيروزى را از آن خود مى ساختند. رسول خدا صلى الله عليه و آله و امير مؤ منان عليه السلام در جنگها، افراد لايق را به فـرمـانـدهـى بـر مـى گـزيند و مسايل امنيتى ، استتار، سازماندهى تاكتيك نظامى ، آرايش نيرو، دسـتـور حـمـله ، تـضـعـيـف روحـيه دشمن و تقويت نيروهاى خودى و ... را از نظر دور نمى داشتند، دسـتورات خود را پى گيرى كرده و در صورت تخلّف ، متخلّفان را باز خواست مى كردند و در صورت ضرورت مراسم رژه بر پا مى كردند و همه اينها با نظم خاصى صورت مى گرفت . چنان كه نقل شده :
(پـيـش از درگـيـرى درمـيـدان اُحـُد، رسـول خـدا(ص ) شـخـصـاً مشغول تنظيم صفوف رزمندگان اسلام شد.)(256)
وعلى عليه السلام نيز در جنگ صفين سفارش كرد:
(فـَسـَوَّوا صـُفـُوفـَكـُمْ كـَالْبـُنْيانِ الْمَرْصُوصِ وَقَدِّمُوا الدّارِعَ وَاَخِّرُوا الْحاسِرَ وَ عَضُّوا عَلَى الاَْضْراسِ... وَ اَميتُوا الاَْصْواتَ...وَالتَوُوا فى اَطْرافِ الرِّماحِ)(257)
صفهايتان را چون ديوارى سربين منظم كنيد، زره پوشها را جلو و سرداران پـشـت سر آنها قرار دهيد ودندانها را بر هم بفشاريد... و صداها را خاموش كنيد... و اطراف نيزه داران و نيزه ها گرد آييد.
مقام معظم رهبرى ـ حضرت آية ا... خامنه اى ـ نيز درباره ضرورت نظم مى فرمايد:
(نـظـم دقـيق ، حدّ فاصل بين يك سازمان نظامى با تشكيلات ديگر است و بدون آن ، نظام و يك سازمان نظامى ، موجوديت نخواهد يافت .)(258)
درجاى ديگر تذكر مى دهد:
(... انـقـلابـى بـودن ، بـه معناى اهميت ندادن به نظم و انضباط نيست . اينطور اشتباه نشود كه سـپـاه اگـر مـى خـواهـد انـقـلابـى بـاشـد، بـايـد بـه نـظـم نـظـامـى و ايـن انـضـبـاطـى كـه مـحـصـول قرنها تجربه است بى اعتنا بماند، بر عكس ما معتقديم كه نظم و انضباط امروز جزو بـيـتـهـاى بلند قصيده انقلاب ماست . در همه شؤ ون جامعه ، در همه تشكيلات ادارى ، درزندگى عادى مردم بايد نظم و انضباط بر قرار باشد و نظم از اسلام است و اميرالمؤ منين فرزندان خود را به نظم دعوت و وصيت كرده است . وقتى يك واحدى ، نظامى باشد و سروكار او با جنگ ، با كشتن و كشته شدن ، با جانهاى انسانها شد، به نظم نيازمندتر است . بنابراين انقلابى بودن سپاه به معناى اهميت ندادن به نظم نيست .)(259)
رعايت سلسله مراتب نظامى
رعـايـت سـلسـله مـراتـب نـظـامـى از لوازم نـظـم و انـضـبـاط اسـت . امـام راحل (ره ) درمورد ضرورت رعايت سلسله مراتب مى فرمايد:
(بـايـد سـلسـله مـراتـبـى باشد تا كار روى نظم باشد و اين سلسله مراتب واطاعت بايد روى ضوابط اسلامى باشد.)(260)
درجاى ديگر مى فرمايد:
(مـن از درجـه داران و افـسـران و سـربـازان ارتـش تـقاضا دارم كه نظام وسلسله مراتب را حفظ بكنند. اگر سلسله مراتب حفظ نشود، ارتش رو به ضعف مى رود و اگر خداى نكرده ارتش روبه ضعف برود، كشور ضعيف خواهد شد.)(261)
حـضـرت امـام (ره ) درفـرصـتـهـاى مناسب نيروهاى مسلح را به اهميت نظم وترتيب آگاه ساخته و سـفـارش مـى كـرد و عـلاوه بـر مـشـروعـيت و قانونى بودن آن ، رابطه بين نظم ومعنويت را نيز اثـبات مى كرد و با اين تفكر مخالف بود كه چون ما انقلاب كرده ايم ، همه قيد و بندها از جمله نـظم وسلسله مراتب را بايد كنار بگذاريم ، بر عكس گوشزد مى كرد كه اگر نظم و انضباط را رعايت نكنيد معنويات را نيز از دست خواهيد داد:
(گـرچـه كـشـور ايران بالا و پايين ندارد و آن دَوْله ها و سلطنه ها رفته اند وما خودمان هستيم . لكن بايد نظم و نظام باشد. شما بايد براى خدا مراتب و سلسله مراتب راحفظ كنيد و اگر بنا بـاشد هر كس خودش راءى بدهد و عليحده عمل كند، آن وقت است كه معنويات و موفقيتهاى عادى هم از بـيـن مـى رود و شـما مى دانيد با آنكه پيغمبر اكرم (ص ) در مسجد مى نشست و كسى اگر وارد مـى شـد، نـمـى دانـسـت كـه كـدام يـك از آنـهـا پـيـغـمـبـر اسـت ، بـا ايـن حـال هـمـه مـاءمور اطاعت ازاو بودند، همه با هم برادر هستيم ، لكن اگر نظام نباشد، برادرى هم بـه هـم مـى خـورد. مـثـلاً اگـر در جـنـگ بـنـا بـاشـد از فـرماندهى اطاعت نشود مسلّماً شكست خواهيم خورد.)(262)
اطاعت از مافوق
يـكـى از امور حياتى در نيروهاى مسلح اطاعت ازفرماندهى است . محترم شمردن دستورات مافوق ، تـرك نـكردن محل پست ، اجتناب از خود راءيى و احساسات نابجا، ضامن موفقيت و پيروزى است . نـمـونـه هـاى فـراوانـى درتـاريـخ وجـود دارد كه نظاميان شكستهاى بزرگى را به خاطر بى نظمى ، هرج و مرج و ترك مقررات تحمل كرده و دشمن را بر خود مسلّط ساخته اند.
در جنگ اُحُد، پيامبر اسلام (ص ) عده اى را براى حفاظت از يك تنگه استراتژيك گماشت و عبدالله جـبـيـر را بـه فـرمـانـدهى آن گروه منصوب كرد. پس از شروع جنگ ، مقاومت وحماسه آفرينيهاى سـپـاه اسـلام ، آنـهـا را در آسـتـانـه پـيـروزى كـامـل قـرار داد و لشـكـريـان دشـمـن در حـال شـكـسـت بـودنـد. نگهبانان آن تنگه با ديدن نشانه هاى پيروزى بر خلاف دستور پيامبر (ص ) تـنـگـه را رهـا كـرده ، مـشـغـول جمع آورى غنايم شدند. اين بى نظمى و تخلف از فرمان نـظـامـى مـوجـب شـكـسـت سـخـت مـسـلمـانـان شـد و تـلفـات سـنـگـيـنـى متحمّل شدند.(263)
اطـاعـت از فـرمـانـدهـى بـقـدرى مـهـمّ اسـت كه حضرت امام خمينى (ره ) آن را واجب شرعى شمرده و نـافـرمـانـى و تـخـلف از آن را حـرام مى داند، چنان كه در ديدار با دانشجويان دانشكده افسرى فرمود:
(...اطـاعـت از يـك فرماندهى كه فرمانده اسلام است ، واجب است به حسب حكم اسلام ، تخلف حرام اسـت ... هـمه قواى انتظاميه نظم را در باطن خودشان حفظ كنند، تا يك ارتش صحيح باشد... يك سپاه پاسداران صحيح باشد.)(264)
پيامدهاى شوم تمرّد و بى نظمى
رخ نـمـودن پديده شوم بى نظمى و تمرّد از سلسله مراتب ، بدون ترديد، پيامدهاى زيانبارى دارد كـه اسـاس تـشكيلات نظامى و موجوديت ملت و كشور را آسيب پذير خواهد كرد. برخى از آن پيامدها عبارتند از:
الف ـ تزلزل تشكيلات نظامى : چنان كه امير مؤ منان صلوات الله عليه فرمود:
(آفَةُالْجُنْدِ مُخالَفَةُ الْقادَةِ)(265)
مخالفت فرماندهان ، آفت سپاه است .
حـضـرت امـام خـمـيـنـى (ره )در ديـدار با فرماندهى كل سپاه به اين موضوع تصريح كرده ، مى فرمايد:
(از مـهمّات اين است كه نظم دركار باشد، يعنى اگر چنانچه نظام نباشد دركار و امور تحت يك نظامى انجام نگيرد، اين ، تزلزل ايجاد مى كند؛ اگر فرض كنيد كه سپاه پاسداران اطاعت نكند از رئيسشان ، همه اطاعت نكنند از آن فرماندهى كل ... و خودشان بخواهند هر كدام يك راهى بروند، ايـن اسـبـاب ايـن مـى شـود كـه يـك قـواى مـسـلّح مـتـزلزل بـشـونـد و بـا تزلزل قواى مسلح ، مملكت متزلزل است . بنابراين اگر بخواهيد مملكت ايران يك مملكتى باشد كـه بـتواند روى پاى خودش راه برود و بتواند ان شاءالله ، آتيه خودش را به طور شايسته انجام بدهد و اصلاح بكند، اوّل بايد اين قواى مسلّح تحت نظم بيايند.)(266)
ب ـ عـزيـمـت سـپـاه : مـاهـنـوز طعم تلخ ناكامى جنگ احدو صفين و پيمان صلح با معاويه را دركام داريـم و هـمـه مـى دانـيم كه يكى از علل اساسى شكست در (احد)، (حكميت صفين ) و (صلح با معاويه ) بى نظمى و تمرّد نيروها بود؛ اميرمؤ منان عليه السلام از روحيه تمرّد و عصيانگرى نيروهاى تحت امر خودش با تلخى ياد مى كند و مى فرمايد:
(قـاتـَلَكـُمُ اللّهُ لَقَدْمَلاَْتُمْ قَلْبى قَيْحاً وَ شَحَنْتُمْ صَدْرى غَيْظاً وَ جَرَّ عْتُمُونى نُغَبَ التَّهْمامِ اَنْفاساً وَ اَفْسَدْتُمْ عَلَىَّ رَاءْيى بِالْعِصْيانَ و الْخِذْلانِ...)(267)
خـدا شـمـا را بكشد كه دلم را سخت چركين كرديد و سينه ام را از خشم آكنده و همواره با هر نفسى اندوهم خورانديد و با نافرمانى وتمرّد، راءى و تدبيرم را تباه ساختيد.
پـيـرامـون تـمـرّدونافرمانى نيروها و فرماندهان سپاه امام حسن مجتبى عليه السلام نيز نوشته اند:
(ايـن حـركـت دشمنى بار(تمرّد و فرار برخى از فرماندهان ) فضاى مساعدى براى پديد آمدن روح تـمـرّد و نـافـرمـانـى ايـجـاد كرد به طورى كه اثر آن برگروههاى ديگرى از سپاه نيز سـرايـت كـرد و جـمـعـى از آنـان بـه فـكـر فـرار افـتـادنـد... مـعـاويـه چندان كه مى توانست در بـرانـگيختن و سپس پختن و آنگاه توسعه دادن اين روح تمرّد ونافرمانى فعاليت مى كرد... تا عاقبت توانست غرور و مناعت آنان را با مطامع مادّى بشكند...)(268)
ج ـ پيروزى دشمن : اين فرجام ناميمون بطور طبيعى پس از پيامد دوّم به وقوع مى پيوندد و در پـى هـزيـمت نيروهاى خودى بطور قطع دشمن ، شاهد پيروزى را در آغوش مى كشد وعواقب شوم چـنـيـن نـنـگـى ، مـتـوجه متمردان خواهد بود. حضرت اميرعليه السلام در سخنى نغز به اين حقيقت تصريح مى كند:
(مَنْ خَذَلَ جُنْدَهُ نَصَرَ اَفْدادَهُ)(269)
آنكه سپاه خويش را وانهد(واز آن تخلف كند) دشمنانش را يارى داده اس.
از اين رو بنيانگذار جمهورى اسلامى هشيارانه فرمود:
(خـارجـيـهـا مـى خـواهـنـد كـه مـا ايـن طـور بـاشـيـم كـه هـيـچ نـظـمـى نـداشـتـه بـاشـيـم و مـثـل (اهـل ) جنگل با هم رفتار بكنيم ، تا اينكه بهانه به دست بياورند كه اينها احتياج دارند كه اينجا قيّم برايشان معيّن كنند.)(270)
به اميد اينكه با نظم و رعايت سلسله مراتب ، تشكيلاتى قوى و منسجم داشته باشيم و دشمنان اسلام و انقلاب همواره نااميد و سرافكنده باشند.
گذشت عمر و اغتنام فرصت
قـطـارى وارد ايـستگاه مى شود. مسافرين چند دقيقه مهلت دارند كه به كارهايشان برسند. آنان كـه فـرصت را غنيمت مى شمارند. براى تهيه خوراك و غذا و نظافت و نماز و غيره مى شتابند و پـس از انـجام كارها با آرامش دل برجايگاه خود باز مى گردند. ولى آنهايى كه از اين فرصت اسـتـفـاده نـكـرده وغـافـل بوده اند يا به كارها نمى رسند يا از قطار عقب مى مانند. پس از حركت قطار پشيمان مى شوند و پشيمانى سودى نخواهد داشت .
انسانها در اين دنيا مسافرانى هستند كه مقصد شان آخرت است . عمر انسان مانند آن قطار سريع السـيـرى اسـت كـه بـه سـرعت مى گذرد و اين دنيا به منزله ايستگاه كه به انسانهاى مسافر، فـرصـت انـجـام كـارهـاى خـويـش را مى دهد تا براى خود، براى راهى طولانى كه در پيش دارند تـوشه اى برگيرند تا فردا پشيمان نشوند. پس بايد مراقب بود و از فرصتها استفاده كرد و از تـبـاه شـدن عـمـر و اسـتـعـداد جـلوگـيـرى كـرد. بـه قول سعدى :
كاشكى قيمت انفاس بدانندى خلق تادمى چند كه مانده است ، غنيمت شمرند
ارزش عمر
در اسلام ، ارزش عمر بستگى به ايمان ، عمل صالح ، بندگى خدا واخلاق نيكو دارد. اگر كسى عـمـرش را درراه تـحصيل ايمان ومعرفت ، بندگى خدا و كسب اخلاق انسانى ، صرف كند، از وقت خود خوب استفاده كرده و در اين صورت ، ازضرر و خسران در امان مانده و سعادتمند خواهد شد. اميرمؤ منان عليه السلام فرمود:
(اِنَّ عُمْرَكَ مَهْرُسَعادَتِكَ، اِنْ اَنْفَدْتَهُ فى طاعَةِ رَبِّكَ)(271)
هـمـانـا عـمـرتـو، مـهـريـه سـعـادت و خـوشـبـخـتـى تـوسـت بـه شـرط آنـكه ، درطاعت وبندگى پروردگارت ، تمام كنى .
كـسـانـى كـه عمر خود را، ضايع كرده و اوقاتى را كه خدا براى رشد وكمالشان ، قرار داده ، صرف هوا و هوس كرده اند، روز قيامت ، دچار حسرت و اندوه و عذاب الهى مى شوند و در آن روز، بـيـدار شـده و مى فهمند كه نبايد عمر خود را، ضايع مى كردند و زندگى را به بيهودگى ، مـى گـذرانـدنـد. از ايـن رو، فـريـاد بـر مـى آورنـد كـه خـداونـدا! يـك بار ديگر ما را به دنيا بـرگـردان ، تـا تـمـام لحـظـات زنـدگـى را در كـسـب ايـمـان ، عمل صالح و اخلاق نيكو، صرف كنيم و از الطاف تو، بهره مند گرديم . ولى در پاسخ آنان ، گـفـته مى شود: بايد وقتى كه در دنيا بوديد، از وقت خود استفاده مى كرديد ازعمرتان ، بهره مى گرفتيد.(272)
درمـقـابـل ايـنـهـا، كـسـانـى هـسـتند كه عمر خود را غنيمت دانسته و در راه كسب ايمان و بندگى خدا كـوشـيـده انـد و رضـاى او را جـلب كـرده انـد و در آخرت نيز، از رضاى حق و بهشت او، بهره مند خواهند شد.
اولياى گرامى اسلام ، از پيروانشان خواسته اند كه ارزش عمر را دريافته و در راه حق و حقيقت ، اطـاعـت خـدا و خـدمـت به خلق ، بكوشند واز صرف اوقات پرارزش زندگى ، در راه هوا و هوس شيطانى ، بپرهيزند. اميرمؤ منان على عليه السلام مى فرمايد:
(اِنَّ اَوْقاتِكَ اَجْزاءُ عُمْرِكَ، فَلا تُنْفِدْلَكَ وَقْتاً اِلاّ فيما يُنْجيكَ)(273)
هـمـانا وقتهاى تو، اجزاى عمرتوست . پس وقتى را براى خود، سپرى مكن ، مگر درآنچه ، تو را نجات دهد.
همچنين مى فرمايد:
(اِحْفَظْ عُمْرَكَ مِنَ التَّضْييعِ لَهُ فى غَيْرِالْعِبادَةِوَالطّاعاتِ)(274)
عمرت را از ضايع كردن در غير عبادت و طاعتها، حفظ كن .
درجاى ديگر مى فرمايد:
(ضِياعُ الْعُمْرِ بَيْنَ الاْ مالِ وَالْمُنى )(275)
ضايع شدن عمر، بين اميدها وآرزوهاست .
اغتنام فرصت در زندگى
فـرصـتـهـايى كه بر سر راه زندگى بشر پيش مى آيد، ناپايدار و زودگذر است و ممكن است بـزرگـتـريـن فـرصـت ثـمـربـخـش بـر اثـر كـمـتـريـن مـسـامـحـه و سـهـل انـگـارى از كف برود و براى صاحبش تنها شكست و ندامت باقى بماند. از اين رو، اولياى گـرامـى اسـلام در بـرنـامـه هـاى تـربـيتى خود اين نكته را مورد توجه مخصوصى قرار داده و هـمـواره خـطـر از دسـت رفـتـن فـرصـتـهـا را بـه پـيـروان خـود خـاطـر نـشـان كرده اند. چنان كه رسول خدا صلى اللّه عليه و آله مى فرمايد:
(اِنَّ لِرَبِّكُمْ فى اَيّامِ دَهْرِكُمْ نَفَحاتٍ اَلا فَتَعَرَّ ضُوالَها)(276)
هـمـانـا در ايام زندگى شما لحظاتى است كه در معرض نسيم حيات بخش پروردگارتان قرار مـى گـيـريـد (و فـرصـتـهـاى مناسبى به دست مى آوريد) بكوشيد كه خويشتن را در مسير فيض الهى قرار دهيد.
حضرت على عليه السلام نيز مى فرمايد:
(اَلْفُرْصَةُ تَمُرُّ مَرَّالسَّحابِ، فَانْتَهِزُوا فُرَصَ الْخَيْرِ)(277)
فـرصـت مـانـنـد ابر(از افق زندگى ) مى گذرد. پس فرصتهاى خير را غنيمت بشمريد(واز آنها استفاده كنيد).
در غنيمت داشتن فرصت عمر به نكات زير بايد توجه كافى صورت گيرد:
1ـ دنـيـا، دار كـار، كـوشـش و عـمـل اسـت و آخـرت دار بـهـره بـردارى از عمل دنيا. بايد كارى كرد كه در آخرت دچار حسرت نشد. قرآن كريم مى فرمايد:
(وَاَنْذِرْهُمْ يَوْمَ الْحَسْرَةِ اِذْ قُضِىَ الاَْمْرُوَهُمْ فى غَفْلَةٍ وَ هُمْ لا يُؤْمِنُونَ)(278)
آنـان (سـتـمـگـران ) را از روز حـسـرت كـه كـار بـه پـايـان آمـده و آنـان هـمـچـنـان در حال غفلت هستند بترسان .
سعدى مى گويد:
صاحبا عمر، عزيز است غنيمت دانش
گوى خيرى كه توانى ببر از ميدانش
جاى گريه است بر اين عمر كه چون خنده گل
پنج روزى است بقاى دهن خندانش (279)
2ـ در قـيـامـت پـيـش از آنـكـه انـسـان قـدمـى بـر دارد از عـمـر، جـوانـى و مال خود مورد پرسش قرار مى گيرد. چنان كه امام صادق عليه السلام مى فرمايد:
(از جمله مواعظ لقمان به فرزندش اين بودكه در قيامت وقتى درموقف حساب قرار گرفتى ، از چهار چيز تو را مى پرسند:
(عَنْ شَبابِكَ فيما اَبْلَيْتَهُ وَ عُمْرِكَ فيما اَفْنَيْتَهُ وَمالِكَ مِمَّا اكْتَسَبْتَهُ وَفيما اَنْفَقْتَهُ)
(مـى پـرسـنـد) جوانيت را چگونه پوساندى ونابود كردى ؟ عمرت را درچه راه فانى ساختى ؟ مالت را از كجا به دست آوردى و در چه راه صرف كردى ؟(280)
در مـيـان چـهـار مـورد مـزبـور، دو مـورد اول (نـعـمـت جوانى و نعمت عمر) كه موضوع بحث ماست از گـرانـبـهـاتـريـن نـعـمـتـهـاى خـداونـد اسـت ؛ دوران جـوانـى بـهـتـريـن فـرصـت بـراى نـيـل بـه پـيـروزيـهـاى درخشان زندگى است ، خداى مهربان درجسم و جان جوانان بطور طبيعى سـرمـايـه هـايـى را بـه امـانـت سـپـرده كه اگر بخوبى مورد استفاده قرار گيرند، مى توانند موجبات خوشبختى و سعادت جوانان را در دنياو آخرت فراهم آورند.
3ـ انـسـان بـايـد از عـمـر خـود در راه كـمـال انـسـانـى بـهـره گـيـرد. ايـن كمال در افزايش علم و معرفت در راه خدا و در اطاعت خدا خلاصه مى شود. هر چه غير ازاين باشد، اتـلاف عـمـر مـحـسـوب مـى شـود. اگـر كـار و كـسـبـى دارد، اگـر زنـدگـى تشكيل مى دهد، اگر با ديگران نشست و برخاست دارد و حتى اگر به گشت وگذارى در شهرها و صـحـراهـا و كـشـورهـا مـى پـردازد، هـمـه بـايـد در راسـتـاى ايـن كمال باشد. اغتنام فرصت به استفاده از لحظه لحظه زندگى است . چنين نشاطى تعطيلى ندارد و چنين انسانى خستگى نمى پذيرد.
عوامل از دست دادن فرصت
بـرخـى از عـوامـلى كـه بـاعـث مـى شود، انسان نتواند بخوبى از فرصتها بهره بردارى كند، عبارت است از:
الف ـ كسالت و تنبلى : كسالت و تنبلى ، نوعى بيمارى است كه چون خوره ، دين و دنياى انسان را نـابـود مـى سـازد.از ايـن رو اسـلام آن رانـكـوهـش كرده و پيروان خود را، از دچار شدن به آن برحذر مى دارد.
امام باقر عليه السلام فرمود:
(اَلْكَسَلُ يَضُرُّ بِالدّينِ وَالدُّنْيا)(281)
تنبلى ، به دين و دنياى انسان ، ضرر مى زند.
درجاى ديگر مى فرمايد:
(اِنـّى لاَُبـْغـِضُ الرَّجُلَ يَكُونُ كَسْلاناً عَنْ اَمْرِ دُنْياهُ وَمَنْ كَسَلَ عَنْ اَمْرِ دُنْياهُ فَهُوَ عَنْ اَمْرِ آخِرَتِهِ اَكْسَلُ)(282)
مـن از مـردى كـه در كـار دنـيـايـش تنبلى كند، خوشم نمى آيد، كسى كه در امر دنيايش كند در امر آخرتش كاهلتر خواهد بود.
ب ـ كـار امروز به فردا وانهادن : تاءخير انداختن كارها و كار امروز را به فردا وانهادن ازجمله آفـتـهـاى از دست دادن فرصتها محسوب مى شود. در روايات اسلامى ، ازاين موضوع با عنوان ( تسويف ) ياد شده است .
امير مؤ منان عليه السلام درنامه اى به يكى از يارانش مى نويسد:
(فـَتـَدارَكْ مـا بـَقِىَ مِنْ عُمْرِكَ وَلا تَقُلْ غَداً وَبَعْدَ غَدٍ فَاِنَّما هَلَكَ مَنْ كانَ قَبْلَكَ بِاِقامَتِهِمْ عَلَى الاَْمانِىِّ وَالتَّسْويفِ حَتّى اَتاهُمْ اَمْرُاللّهِ بَغْتَةً وَهُمْ غافِلُونَ)(283)
بـاقيمانده عمرت را تدارك كن و نگو فردا و پس فردا. هماناپيش از تو،كسانى هلاك شدند كه روى آرزوهـا و تـاءخـير انداختن كارها ايستادند، تا ناگهان امر خدا فرا رسيد درحالى كه آنان ، غافل بودند.
امام باقر عليه السلام فرمود:
(إِيّاكَ وَالتَّسْويفَ فَاِنَّهُ بَحْرٌ يَغْرَقُ فيهِ الْهَلْكى )(284)
از تـاءخـيـر كـار بـپـرهـيز؛ زيرا دريايى است كه هلاك شدگان ، در آن غرق مى شوند. ج ـ بى هـدفـى : اگـر هـدف انسان در زندگى مشخص باشد در هر لحظه و با سرعت آن هدف را پى مى گيرد؛ اما آدم بى هدف اينجا و آنجا پرسه مى زند و وقت خود را مى گذراند.
د ـ بى برنامه بودن : بسيارى از فرصتها دراثر نداشتن برنامه درست ، ازبين مى رود.
هـ لهـو وبـيـهـودگـى : روى آوردن انـسـان بـه خـوشـگـذرانـيـهـاى مـوقـت و بـى حـاصـل ، فـرصـتهاى گرانبها را نابود مى كند؛ البته معناى آن ، نداشتن تفريح نيست ، بلكه بايد تفريح انسان در راستاى هدف والاى كمال طلبى باشد.
ارزش جوانى (285)
جـوانى يكى از نعمتهاى پرارج الهى و ازسرمايه هاى بزرگ سعادت در زندگى بشر شناخته شـده و در اسـلام بـه انـدازه اى ، مـهـمّ اسـت كـه روز قـيـامـت از صـاحـبـش ، سـؤ ال مـى شـود كـه چگونه آن را صرف كرده است گر چه دوران جوانى ، خود قسمتى ازمجموع عمر آدمى است ، ولى اين قسمت از عمر، آن قدر ارزنده وممتاز است كه درباره آن بطور خاص ، پرسش مى شود.
پيامبر اكرم (ص ) فرمود:
(اِنَّ الْعـَبـْدَ لا تـَزُلُ قـَدَمـاهُ يـَوْمَ الْقـِيـامَةِ حَتّى يُسْاءَلَ عَنْ عُمْرِهِ فيما اَفْناهُ وَعَنْ شَبابِهِ فيما اَبْلاهُ)(286)
در قـيـامـت هـيـچ بـنـده اى قـدم از قـدم بـرنـمـى دارد، مـگـر ايـنـكـه از او سـؤ ال مى شود: عمرش را در چه كارى صرف نموده و جوانى اش را در چه راهى تمام كرده است .
على عليه السلام فرمود:
(شَيْئانِ لا يَعْرِفُ فَضْلَهُما اِلاّمَنْ فَقَدَهُما: الشَّبابُ وَالْعافِيَةُ)(287)
دو چـيـزاسـت كـه قـدر و قـيمتشان را نمى شناسد، مگر كسى كه آن دو را از دست داده باشد، يكى جوانى و ديگرى تندرستى .
غنيمت شمردن فرصت جوانى
دوران جـوانـى يـكـى از فرصتهاى گرانبها در طول زندگى بشر است كه اگر بدرستى مورد اسـتـفـاده قـرار گـيـرد، پـايـه اسـاسـى سـعـادت جـوانـان خـواهـد بـود. از ايـن رو، بـر نـسـل جـوان ، لازم اسـت بـراى رسيدن به سعادت ، اين فرصت گرانبها را مغتنم شمرده و در راه بهره بردارى صحيح از آن بكوشند. پيامبر اكرم (ص ) فرمود:
(يـا اَبـاذَرٍّ! اِغـْتـَنـِمْ خَمْساً قَبْلَ الْخَمْسِ، شَبابَكَ قَبْلَ هَرَمِكَ وَ صِحَّتَكَ قَبْلَ سُقْمِكَ وَ غِناكَ قَبْلَ فَقْرِكَ وَفَراغَكَ قَبْلَ شُغْلِكَ وَ حَيواتَكَ قَبْلَ مَوْتِكَ)(288)
اى ابـوذر! پـنـج چـيـز را پـيـش از پـنـج چـيـز غـنـيـمـت بـشـمـار، جـوانـى ات را قـبـل ازپـيـرى ، سـلامـتـت را قـبـل از بـيـمـارى ، بـى نـيـازى ات را قـبـل از تـهـيـدسـتـى ، فـراغـتـت را قـبـل ازگـرفـتـارى وزنـدگـانـى ات را قبل ازمرگ .
حضرت على عليه السلام فرمود:
(بادِرْ شَبابَكَ قَبْلَ هَرَمِكَ وَ صِحَّتَكَ قَبْلَ سُقْمِكَ)(289)
جوانى ات را قبل از پيرى و سلامتت را قبل از بيمارى درياب .
امـام كـاظـم عـليـه السـلام از پـدران خـود، درتـفـسـيـرآيـه (وَلاتـَنـْسَ نـَصـيـبـَكَ مـِنـَ الدُّنْيا)(290) فرمود:
(لا تـَنـْسَ صـِحَّتـَكَ وَقـُوَّتـَكَ وَ فـَراغـَكَ وَشـَبـابـَكَ وَ نـِشـاطـَكَ وَ غـِنـاكَ وَاَنْ تـَطْلُبَ بِهِ الاْ خَرَةَ)(291) سـلامـت ، نـيـرومندى ، فراغت ، جوانى ، نشاط و بى نيازى خود را فراموش مكن و (در دنيا از آنها بهره بردارى كن ) از آن (سرمايه هاى عظيم ) به نفع آخرت خود استفاده كن .
جوانى را درچه راههايى غنيمت بشماريم ؟
راهـهـايـى كـه فـرصـت جـوانـى بـايـد در آنـهـا مـصـرف شـود، در روايـات اهل بيت عليهم السلام نشان داده شده كه به برخى از آنها اشاره مى كنيم :
الف ـ تـحـصـيـل عـلم : از رسـول خـدا صـلى الله عـليـه وآله نقل شده كه فرمود:
(مَنْ تَعَلَّمَ فى شَبابِهِ كانَ بِمَنْزَلَةِ الرَّسْمِ فِى الْحَجَرِ)(292)
كسى كه درجوانى دانش بياموزد، مانند نقشى است كه بر سنگ كنده باشند.
امام صادق عليه السلام فرمود:
(لَسـْتُ اُحـِبُّ اَنْ اَرَى الشـّابَّ مـِنـْكـُمْ اِلاّ غـادِياً فى حالَيْنِ: اِمّا عالِماً اَوْ مُتعَلِّماً، فَاِنْ لَمْ يَفْعَلْ فـَرَّطَ، فـَاِنْ فـَرَّطَ ضـَيَّعَ، فـَاِنْ ضـَيَّعَ اَثـِمَ وَاِنْ اَثـِمَ سـَكـَنَ النـّارَ وَالَّذى بـَعـَثَ مـُحـَمَّداً بِالْحَقِّ)(293)
دوسـت نـدارم ، جـوانى از شما مسلمانان را ببينم مگر آنكه روز او به يكى از دوحالت آغاز شود؛ يا دانشمند باشد يا دانشجو، اگر چنين نكرد ( ودر نادانى به سر برد) در اداى وظيفه كوتاهى كـرده و كـوتاهى دراداى وظيفه از بين بردن جوانى است . از بين بردن جوانى گناه است و اگر مـرتـكـب گـناه شود، درعذاب الهى مسكن خواهد گزيد، قسم به خداوندى كه محمد(ص ) را به حق به نبوّت فرستاده است .
ب ـ عـبادت و بندگى : اسلام ، نسل جوان را دعوت مى كند كه بنده خدا باشند وخود را از افسار گـسـيـختگى و بى بند و باريهايى كه دشمنان اسلام پيش پاى جوانان مى گذارند، برهانند. آنـان كـه ايـام جـوانـى خود را صرف عبادت و بندگى خدا كرده ، از گناهان پرهيز مى كنند، در پـيـشـگـاه الهـى مـورد احـتـرام وارزش بـوده ، در سـايـه رحـمـت او بـهـره مـنـد خـواهـنـد بـود. رسول خداصلى الله عليه وآله فرمود:
(اِنَّ اللّهَ يُحِبُّ الشّابَّ الَّذى يُفْنى شَبابَهُ فى طاعَةِ اللّهِ)(294)
همانا خداوند، جوانى را كه جوانى خود را در اطاعت و بندگى خدا گذرانده ، دوست دارد.
همچنين فرمود:
(سـَبـْعـَةٌ يـُظـِلُّهـُمُ اللّهُ فـى ظـِلِّهِ يـَوْمَ لا ضـِلَّ اِلاّ ظـِلُّهُ: اِمـامٌ عـادِلٌ وَ شـابُّ نـَشـَاءَ فـى عـِبادَةِ اللّهِ...)(295)
خـداونـد هـفـت گـروه را در سـايـه رحمت خود جاى مى دهد، روزى كه سايه اى جز سايه او نيست ، اوّل زمامدار دادگر و دوّم جوانى كه در عبادت خداوند پرورش يافته باشد... .
ج ـ اخـلاق نـيـكـو: دوران جـوانـى ، بـهـتـريـن فـرصـت بـراى بـه دسـت آوردن فضايل اخلاقى است .
رسول خدا (ص )فرمود:
(شابُّ سَخِىُّ حَسَنُ الْخُلْقِ اَحَبُّ اِلَى اللّهِ مِنْ شَيْخٍ بَخيلٍ عابِدٍ سَىِّءِ الْخُلْقِ)(296)
جوان سخاوتمند خوش اخلاق ، در نزد خدا از پير بخيلِ عابدِ بداخلاق ، محبوبتر است .
د ـ تـوبـه : جـوانـى ، بهترين فرصت براى تغيير مسير از زشتيها و پليديها به پاكيهاست . اسـلام بـه جـوانـان ، پـناهگاه مطمئن ومحكمى را نشان داده و آنها نيز بايد براى درامان ماندن از سـقـوط و افـتـادن درمـنـجـلاب گناه ، به آن پناهگاه پناه برده توبه نمايند كه جوانى ، بهار توبه است . پيامبر اكرم (ص ) فرمود:
(اِنَّ اللّهَ تَعالى يُحِبُّ الشّابَّ التّائِبَ)(297)
خداوند، جوان توبه كاررا دوست دارد.
همچنين فرمود:
(اَلتَّوْبَةُ حَسَنَةٌ، لكِنَّهُ فِى الشِّبابِ اَحْسَنُ)(298)
توبه از گناه ، هميشه پسنديده است ، ولى درجوانى بهتر و پسنديده تر است .
جوانان چه بياموزند
اسـلام ، كـسـب عـلم در زمـيـنـه هـاى مـختلف را براى جوانان جايز دانسته و توصيه كرده است كه فرصت جوانى را در آن زمينه ها به كار برند. اينك به برخى از آنها اشاره مى كنيم :
الف ـ ديـن شـنـاسى : اولياى گرامى اسلام در ضمن سخنان گهربار خود، جوانان را دعوت مى كنند كه بخشى از اوقات شبانه روز را صرف دين شناسى و آموزشهاى دينى نمايند و كسانى را كه در اين امر كوتاهى مى كنند مورد سرزنش قرار داده ، سزاوار كيفر مى دانند.
امام باقر عليه السلام فرمود:
(لَوْاُتيتُ بِشابٍّ مِنْ شَبابِ الشَّيعَةِ لا يَتَفَقَّهُ فِى الدّينِ لاََوْجَعْتُهُ)(299)
اگر جوانى از جوانان شيعه را نزد من آورده شد كه در دين تفقه ( تفكر و تدبر) نمى كند او را به وضع دردناكى مجازات خواهم كرد.
ب ـ قرآن و معارف آن : آشنايى با قرآن و معارف آن نيز يكى از چيزهايى است كه در اسلام به جوانان سفارش شده است .
امام صادق عليه السلام فرمود:
(مَنْ قَرَءَ الْقُرْانَ وَهُوَ شابُّ مُؤْمِنٌ اِخْتَلَطَ الْقُرْانُ بِلَحْمِهِ وَ دَمِهِ)(300)
كـسـى كـه قـرآن را تـلاوت مـى كـنـد در حالى كه جوان مؤ منى باشد، قرآن با گوشت و خونش آميخته مى شود (ودر همه بدنش اثر مى گذارد).
ج ـ احـاديـث اسـلامـى : فراگيرى تعاليم بزرگان دين و احاديث اسلامى نيز از جمله امورى است كه جوانان عزيز نبايد از آن غافل باشند.
امام صادق (ع ) فرمود:
(بادِرُوا اَحْداثَكُمْ بِالْحَديثِ قَبْلَ اَنْ يَسْبِقَكُمْ اِلَيْهِمُ الْمُرْجِئَةِ)(301)
احاديث اسلامى را به جوانان خود بياموزيد و در انجام اين وظيفه تربيتى ، شتاب كنيد، پيش از آنـكـه مـرجئه (عده اى از مخالفان گمراه )، بر شما پيشى گيرند و آنان را باافكار انحرافى خود تحت تاءثير قرار دهند.
د ـ علوم روز: جوانان بايد علومى را كه در زندگى اجتماعى به آن نياز دارند، بياموزند.
اميرمؤ منان على عليه السلام فرمود:
(اَوْلَى الاَْشـْيـاءِ اَنْ يـَتـَعـَلَّمـَهـَاالاَْحـْداثُ الاَْشـْيـاءَ الَّتـى اِذا صـارُوا رِجـالاً احـْتـاجـُوا اِلَيْها)(302) بـهـترين چيزى كه شايسته است ، به نو جوانان تعليم دهيد، مسائلى است كه در سنين مردانگى به آن احتياج دارند.
نقل از قصار الجمل ، ج 2، ص 64. ________________________________________
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