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سطر ۲۲: |
| | |برچسب۸ = شابک | | |برچسب۸ = شابک |
| | |داده۸ = ۹۶۴-۷۱۶۳-۲۸-۲ | | |داده۸ = ۹۶۴-۷۱۶۳-۲۸-۲ |
| − | |برچسب۹ = دانلود
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| − | |داده۹ = [http://dl-al-adl.ir/libfiles/ebooks/fabook/fvz/PDF/fabookfvz13.pdf PDF]
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| | + | ==فهرست کتاب احکام تالارهای پذیرایی== |
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| | + | ۱ سخن ناشر |
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| | + | ۲ مقدمه |
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| | + | ۳ فصل اول: احکام غذا و مواد غذایی |
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| | + | ۳.۱ بخش اول: انواع مواد غذایی |
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| | + | ۳.۱.۱ الف) غذاهای گیاهی |
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| | + | ۳.۱.۲ ب) غذاهای گوشتی (چهارپایان) |
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| | + | ۳.۱.۲.۱ پرندگان |
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| | + | ۳.۱.۲.۲ آبزیان |
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| | + | ۳.۲ بخش دوم: پاک و نجس بودن مواد غذایی |
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| | + | ۳.۲.۱ الف. احکام نجاسات |
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| | + | ۳.۲.۲ ب. راه ثابت شدن نجاست |
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| | + | ۳.۲.۳ ج. نجاسات و مواد غذایی |
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| | + | ۳.۲.۴ د. مردار |
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| | + | ۳.۲.۴.۱ احکام کشتن و شکار حیوانات |
| | + | |
| | + | ۳.۲.۴.۲ احکام ذبح |
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| | + | ۳.۲.۴.۳ شکار |
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| | + | ۳.۲.۵ دستور کشتن شتر |
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| | + | ۳.۲.۵.۱ صید ماهی |
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| | + | ۳.۲.۶ ه. خون |
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| | + | ۳.۲.۷ ز. سگ و خوک |
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| | + | ۳.۲.۸ ح. کافر |
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| | + | ۳.۲.۹ ط. شراب و فقاع |
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| | + | ۳.۳ روش پاک کردن مواد نجس شده |
| | + | |
| | + | ۳.۳.۱ ظروف نجس شده |
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| | + | ۳.۳.۲ طهارت کارکنان غذاخوری |
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| | + | ۳.۳.۳ طهارت محل غذاخوری |
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| | + | ۳.۴ بخش چهارم: خرید و فروش مواد غذایی |
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| | + | ۳.۴.۱ فروش غذای فاسد شده |
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| | + | ۳.۴.۲ غش در فروش |
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| | + | ۳.۴.۳ کم فروشی و گران فروشی |
| | + | |
| | + | ۳.۴.۳.۱ احتکار |
| | + | |
| | + | ۳.۴.۴ فروش اجباری |
| | + | |
| | + | ۳.۴.۵ تعیین نکردن نرخ غذا و خدمات |
| | + | |
| | + | ۳.۴.۶ فروش مواد سهمیهای |
| | + | |
| | + | ۳.۴.۷ جلب مشتری |
| | + | |
| | + | ۴ فصل دوم: منکرات اجتماعی |
| | + | |
| | + | ۴.۱ بخش اول: شکل مجلس |
| | + | |
| | + | ۴.۱.۱ اختلاط زن و مرد |
| | + | |
| | + | ۴.۱.۲ فیلم برداری و عکاسی |
| | + | |
| | + | ۴.۲ بخش دوم: محتوای مجالس |
| | + | |
| | + | ۴.۲.۱ رقص |
| | + | |
| | + | ۴.۲.۲ غنا و موسیقی |
| | + | |
| | + | ۴.۲.۳ شعبده بازی |
| | + | |
| | + | ۴.۲.۴ شادیهای حرام |
| | + | |
| | + | ۴.۳ سخنی با هنرمندان |
| | + | |
| | + | ۵ فصل سوم: آداب میهمانی و میهمان داری |
| | + | |
| | + | ۵.۱ وظایف میهمان دار |
| | + | |
| | + | ۵.۱.۱ نسبت به مشتری |
| | + | |
| | + | ۵.۱.۲ نسبت به امکانات و مکان |
| | + | |
| | + | ۵.۲ مناسبتها |
| | + | |
| | + | ۵.۳ وظایف میهمان |
| | + | |
| | + | ۵.۴ اشیای به جا مانده |
| | + | |
| | + | ۵.۵ مراتب امر به معروف و نهی از منکر |
| | + | |
| | + | ۶ فصل چهارم: ارتباط کارفرما و کارگر |
| | + | |
| | + | ۶.۱ پرداخت حقوق واقعی کارگر |
| | + | |
| | + | ۶.۲ حفظ حرمت کارگر |
| | + | |
| | + | ۶.۳ وظایف کارگر |
| | + | |
| | + | ۷ فصل پنجم: خمس |
| | + | |
| | + | ۷.۱ سال خمسی |
| | + | |
| | + | ۷.۲ آنچه خمس ندارد عبارت است از |
| | + | |
| | + | ۷.۳ پیآمدهای ندادن خمس |
| | + | |
| | + | ۷.۴ احکام خمس |
| | + | |
| | + | ۸ خودآموز |
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| | + | ۹ پانویس |
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| | == سخن ناشر == | | == سخن ناشر == |
| سطر ۳۵: |
سطر ۱۶۷: |
| | انتشارات نورالسجاد<br/> | | انتشارات نورالسجاد<br/> |
| | | | |
| − | == مقدمه ==
| |
| − | از منظر اسلام، کار و کسب امری مقدس و عبادت است. رسول اکرم صلی الله علیه و آله میفرماید: کسی که برای خانوادهاش زحمت میکشد مانند شخصی است که در راه خدا [[جهاد]] میکند.<ref>. قال رسول الله صلی الله علیه و آله : الکاد علی عیآله کالمجاهد فی سبیل الله. بحارالانوار، ج93، ص 324، روایت 13 </ref><br/>
| |
| − | کار در تالارها و سالنهای غذاخوری، در کنار این ارزش عمومی، دو ویژگی نیز دارد؛ یکی آماده سازی غذا برای مصرف کنندگان؛ که موجب آسایش و راحتی آنان میشود واز این جهت مصداق حدیث رسول اکرم صلی الله علیه و آله قرار میگیرد که فرمود: کسی که نیاز مؤمن را برآورده سازد، مانند کسیاست که یک عمر خدا را عبادت کرده است.<ref>. قال رسول الله صلی الله علیه و آله : من قضی لاخیه المومن حاجه کان کمن عبدالله دهراً. همان، ج 9، ص 383، باب 26، روایت 4.</ref><br/>
| |
| − | ویژگی دوم، تهیه جا و مکان لازم برای برگزاری مراسم شادی یا عزاداری است. چنین کارکردهایی موجب میشود که از طرفی آشنایی با مسائل شرعی و اخلاقی برای کارکنان این صنف ضرورت یابد تا احتمال لغزش و [[گناه]] به حداقل برسد، همان خطری که امام علی علیهالسلام در مورد آن این گونه هشدار میدهد: ای تجار! ابتدا مسائل فقهی مربوط به تجارت را بیاموزید، بعد به خرید و فروش مشغول شوید. و سه مرتبه تکرار نمودند.<ref>. قال علی علیهالسلام: الفقه ثم المتجر. فروغ کافی، ج 50، ص 150، باب آداب التجاره روایت 1.</ref><br/>
| |
| − | از طرف دیگر، آشنایی با منکراتی که ممکن است در حین کار رخ دهد، نیز تأثیر زیادی در جلوگیری از معصیت و [[گناه]] دارد.<br/>
| |
| − | با درک این ضرورتهاست که نوشته حاضر تقدیم میشود تا راهگشای کارکنان این صنف باشد و سبب شود آنان علاوه بر کسب روزی دنیوی، از برکات معنوی کار نیز بهرهمند گردند. <br/>
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| − |
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| − | == فصل اول: احکام غذا و مواد غذایی ==
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| − | در رستورانها و تالارهای پذیرایی، مواد غذایی عامل ارتباط کارکنان رستوارنها و مشتریان است. به همین خاطر مناسب است که بحث را با مواد غذایی و احکام آن آغاز کنیم.<br/>
| |
| − | === بخش اول: انواع مواد غذایی ===
| |
| − | انواع خوراکیها عبارتند از:<br/>
| |
| − | الف ـ گیاهی، شامل میوهها و سبزیجات.<br/>
| |
| − | ب ـ حیوانی، شامل چهارپایان (اهلی ،وحشی)، پرندگان و آبزیان <br/>
| |
| − | ==== الف) غذاهای گیاهی ====
| |
| − | تمام میوهها و سبزیجات پاک و حلال است، مگر آن که نجس شده باشد، یا برای بدن ضرر مهم داشته باشد، یا از غیر راه حلال به دست آمده باشد.<br/>
| |
| − | غذاهای غیر گوشتی اعم از سبزیجات، حبوبات، میوهها و فراوردههای لبنیاتی، مانند پنیر، ماست، کره و خامه که از حیوان حلال گوشت گرفته میشود، تخم مرغ و سایر پرندگان حلال گوشت، نان، بیسکویت، شکلات، آدامس، شیرینی وسایر خوردنیهایی که از گوشت حیوان نیست، پاک و خوردن آنها حلال است، مگر آن که ثابت شود که نجس شده یا بدن کافر با رطوبت به آن رسیده است.<ref>. استفتائات امام ره، ج 2، ص 507.</ref><br/>
| |
| − | ==== ب) غذاهای گوشتی (چهارپایان)<ref>. تحریر الوسیله، ج 1، ص 156، م 5.</ref> ====
| |
| − | چهارپایان اهلی سه قسماند:<br/>
| |
| − | ۱ـ حلال گوشت:انواع گوسفندان، گاو و شتر. <br/>
| |
| − | ۲ـ مکروه: اسب، قاطر و الاغ.<br/>
| |
| − | ۳ـ حرام گوشت: سگ و گربه .<br/>
| |
| − | چهارپایان وحشی نیز دو قسماند:<br/>
| |
| − | ۱ـ حلال گوشت: آهو، گاو، بزکوهی و گورخر.<ref>. بزکوهی نوعی گوسفند است و گاومیش هم نوعی گاو است.</ref>
| |
| − | ۲ـ حرام گوشت: تمام حیوانهای درنده مانند گرگ و پلنگ... .<br/>
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| − | مسئله:<br/>
| |
| − | ۱ـ تمام حیوانهای درنده حرام گوشت هستند، هر چند از نظر قدرت و درندگی ضعیف باشند، مانند روباه.<br/>
| |
| − | ۲ـ خوردن گوشت خرگوش حرام است.<ref>. استفتائات آیت الله فاضل، ج 1، س 1362و تحریر الوسیله ج 2، ص 156،م5.</ref><br/>
| |
| − | ۳ـ گوشت تمام انواع حشرات حرام میباشد.<ref>. تحریر الوسیله، ج 2، ص 156، م 5.</ref><br/>
| |
| − | ===== پرندگان =====
| |
| − | پرندگان حلال گوشت عبارتند از:<br/>
| |
| − | ۱ـ تمام اقسام کبوترها (قمری هم نوعی کبوتر است)، <br/>
| |
| − | ۲ـ تمام اقسام گنجشکها (بلبل هم نوعی گنجشک است)، <br/>
| |
| − | ۳ـ مرغ، خروس، اردک و مرغابی.<ref>. همان، م 6.</ref><br/>
| |
| − | پرندگان حرام گوشت عبارتند از:<br/>
| |
| − | خفاش، طاوس، کلاغ (زاغ هم نوعی کلاغ است) و تمام پرندگانی که چنگال دارند، مانند عقاب و... .<ref>. همان، م 6 و 7.</ref><br/>
| |
| − | مسئله:<br/>
| |
| − | ۱ـ خوردن گوشت هدهد مکروه است.<ref>. توضیح المسائل امام، م 2624.</ref><br/>
| |
| − | ۲ـ تخم مرغ و سایر پرندگان حلال گوشت، حلال است و تخم پرندگان حرام گوشت، حرام.<ref>. تحریر الوسیله، ج 2، ص 158، م 12.</ref><br/>
| |
| − | ۳ـ ملخ از پرندگان است و حلال گوشت میباشد.<ref>. توضیح المسائل امام، م 2632.</ref><br/>
| |
| − | سؤال: راه شناختن پرندگان حلال گوشت و حرام گوشت چیست؟<br/>
| |
| − | جواب: دو راه دارد:<br/>
| |
| − | ۱ـ پرندهای که هنگام پرواز بال زدنش بیشتر باشد تا نگه داشتن بال، حلال است.<br/>
| |
| − | ۲ـ پرندگانی که سنگدان یا چینه دان یا انگشت جدایی مانند انسان شصت دارند، حلال است و پرندگان دریایی و غیر دریایی دراین حکم مساوی هستند.<ref>. تحریر الوسیله، ج 2، ص 157، م 8.</ref><br/>
| |
| − | ===== آبزیان =====
| |
| − | ۱ـ از حیوانهای دریایی تنها ماهی پولکدار و برخی از پرندگان دریایی حلال گوشت هستند.<ref>. همان، ص 155، م 1 و 2.</ref><br/>
| |
| − | ۲ـ میگو همان ملخ دریای و از پرندگان است<ref>. فرهنگ دانشگاهی، احمد سیاح، ص 502.</ref> و حلال گوشت میباشد.<ref>. توضیح المسائل امام، م 2622.</ref> <br/>
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| − | === بخش دوم: پاک و نجس بودن مواد غذایی ===
| |
| − | ==== الف. احکام نجاسات ====
| |
| − | مسئله ۱. خوردن و آشامیدن چیز نجس، حرام است و نیز خورانیدن عین نجس به کودکان در صورتی که ضرر داشته باشد حرام است، بلکه اگر ضرر هم نداشته باشد، بنابر احتیاط واجب باید از آن خودداری کند.<ref>. همان، م 141.</ref><br/>
| |
| − | مسئله ۲. اگر میزبان در بین غذا خوردن بفهمد غذا نجس است، باید به مهمانها بگوید، اما اگر یکی از مهمانها فهمید، لازم نیست به دیگران خبر دهد، ولی چنانچه طوری با آنان معاشرت دارد که میداند به واسطه نگفتن خود او هم نجس میشود باید بعد از غذا به آنان بگوید.<ref>. همان، م 145، غذای نجس را میتوان به حیوان داد. از استفتائات امام ج 2،ص 504.</ref><br/>
| |
| − | بنابراین، اگر رستوران داران متوجه شدند غذایی نجس شده نمیتوانند آن غذا را به مشتریان عرضه کنند. حتی اگر برخی از مشتریان مشغول استفاده از چنین غذایی باشند، بر میزبان (رستوران دار و عوامل دست اندرکار) واجب است به آنها اطلاع دهند و قیمت چنین غذایی را هم نباید دریافت کند.<br/>
| |
| − | ==== ب. راه ثابت شدن نجاست ====
| |
| − | راه ثابت شدن نجاست آن است که :<br/>
| |
| − | ۱ـ خود انسان یقین کند و اگر شک، گمان داشته باشد، لازم نیست دوری نماید.<br/>
| |
| − | ۲ـ کسی که چیزی در اختیار اوست، بگوید آن چیز نجس است، مثلاً آشپز بگوید لوازم آشپزخانه نجس شده است.<br/>
| |
| − | ۳ـ دو مرد عادل بگویند چیزی نجس است ونیز یک نفر عادل هم بگوید بنابر احتیاط واجب باید اجتناب کرد. <br/>
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| − | ==== ج. نجاسات و مواد غذایی ====
| |
| − | هر چند قانون کلی اسلام در اشیاء پاک بودن آنهاست و همه عالم، بجز چند مورد استثنایی، همگی پاک میباشد، ولی از آنجا که ممکن است در تهیه مواد غذایی برخی از آنها نجس شود، آشنایی با برخی از آلودگیها و نجاساتی که مورد نیاز میباشد لازم مینماید.<br/>
| |
| − | مسئله ۱. ادرار و مدفوع هر حیوان حرام گوشت که خون جهنده دارد، نجس است. فضله حیوانات کوچک مانند پشه و مگس که گوشت ندارند، پاک است.<ref>. همان، م 84.</ref><br/>
| |
| − | مسئله ۲. فضله پرندگان حرام گوشت، نجس است.<ref>. همان، م 85.به فتوای برخی از مراجع تقلید، پاک است.</ref> <br/>
| |
| − | مسئله ۳. گربه و موش پاکاند؛ ولی ادرار و مدفوعشان نجس است.<ref>. همان، م 83.</ref><br/>
| |
| − | سؤال: اگر شک داریم که شیئی سیاه رنگ که در غذا دیده شده فضله موش است یا نه، آیا غذا نجس است؟<br/>
| |
| − | جواب: در فرض شک، پاک است و تفحص لازم نیست. <ref>. همان، م 123.</ref> <br/>
| |
| − | سؤال: اگر برنج را تازه خیس کردهایم و فضله موش در آن دیده شد، راه پاک شدن دارد، یا نه؟<br/>
| |
| − | جواب: اگر آب نجس به باطن برنج نفوذ نکرده، میشود آن را آب کشید.<ref>. همان، م 164.</ref><br/>
| |
| − | سؤال: در فرض بالا اگر شک کنیم که آب نجس به باطن رسیده یا نه، چه حکمی دارد؟<br/>
| |
| − | جواب: باطن برنج پاک است.<ref>. همان، م 165.</ref><br/>
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| − | سؤال: اگر بعد از پخته شدن برنج و دم کشیدن آن، فضله موش ببینم و ندانیم هنگام خیس کردن بوده یا بعد از پخته شدن افتاده است، چه حکمی دارد؟<br/>
| |
| − | جواب: اگر احتمال میدهید بعد از پخته شدن و تمام شدن آب برنج افتاده، همان جای نجس و مقداری از اطراف آن را بردارید، بقیه پاک است.<ref>. همان، 129.</ref><br/>
| |
| − | سؤال: اگر فضله موش یا خون یا نجاست دیگری در آبگوشت و خورشت دیده شود، چه حکمی دارد؟<br/>
| |
| − | جواب: آب آبگوشت و خورشت نجس است ولی مواد دیگر اگر در آب نجس نجوشیده و آب نجس در آن نفوذ نکرده، با آب کشیدن پاک میشود.<ref>. همان، 164.</ref><br/>
| |
| − | ==== د. مردار ====
| |
| − | مرده حیوانی که خون جهنده دارد، نجس است... ماهی مرده چون خون جهنده ندارد، پاک است.<ref>. همان، م 884 و 2615.</ref><br/>
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| − | سؤال: حکم بچه مرده حیوان که از شکم حیوان زنده بیرون آمده، چیست؟<br/>
| |
| − | جواب: اگر از شکم حیوان زنده بچه مردهای بیرون آید یا آن را بیرون آورند، خوردن گوشت آن حرام است.<ref>. همان، م 259.</ref><br/>
| |
| − | سؤال: حکم بچه مرده حیوان که از شکم حیوان ذبح شده بیرون آید چیست؟<br/>
| |
| − | جواب: اگر حیوانی را شکار کنند یا سر ببرند و بچه مردهای از شکمش بیرون آورند، چنانچه خلقت آن بچه کامل باشد و مو یا پشم در بدنش روییده، پاک و حلال است.<br/>
| |
| − | سؤال: حکم بچه زنده از حیوانی که شکار شده یا سر آن را بریدهاند، چیست؟<br/>
| |
| − | جواب: اگر حیوانی را شکار کنند یا سر ببرند و بچه زندهای از آن بیرون آید، چنانچه آن بچه را به دستوری که در شرع، معین شده سر ببرند حلال و اگر بدون سر بریدن بمیرد، حرام میباشد.<ref>. همان، م 2607.</ref><br/>
| |
| − | سؤال: حکم ماهیهای خارجی چیست؟<br/>
| |
| − | جواب: صید کننده ماهی لازم نیست مسلمان باشد، ولی انسان باید بداند ماهی را زنده از آب گرفتهاند و در خارج از آب جان داده است.<ref>. استفتائات امام، ج 2، ص 15.</ref><br/>
| |
| − | ===== احکام کشتن و شکار حیوانات =====
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| − | گاه مشاهده میشود که هتل داران و صاحبان رستورانهای خارج از شهر، خود اقدام به ذبح حیوانات میکنند. از این رو مناسب است که نگاهی داشته باشیم به شیوههای کشتن و شکار حیوانات مختلفی که برای تهیه غذا مورد استفاده قرار میگیرند.<br/>
| |
| − | ===== احکام ذبح =====
| |
| − | مسئله ۱. دستور سر بریدن حیوان آن است که چهار رگ بزرگ گردن را از پایین برآمدگی زیر گلو به طور کامل ببرند و اگر بشکافند، کافی نیست.<ref>. توضیح المسائل امام، م 2591.</ref><br/>
| |
| − | مسئله ۲. سر بریدن حیوان پنج شرط دارد (که اگر مراعات نکند حیوان حرام میشود):<br/>
| |
| − | ۱. کسی که سر حیوان را میبرد باید مسلمان باشد و اظهار دشمنی با اهل بیت پیمغبر صلی الله علیه و آله نکند. <br/>
| |
| − | ۲. سر حیوان را با چیزی ببرند که از آهن باشد، ولی اگر آهن پیدا نشود و طوری باشد که اگر سر حیوان را نبرند، میمیرد، با چیز تیزی که چهار رگ را ببرد، مانند شیشه و سنگ تیز میشود سر آن را برید.<br/>
| |
| − | ۳. جلوی بدن حیوان رو به قبله باشد، ولی در صورت فراموشی، ندانستن مسئله، اشتباه کردن قبله، ندانستن طرف قبله، یا در صورت عدم توانایی در رو به قبله کردن حیوان، اشکال ندارد.<br/>
| |
| − | ۴. نام خدا را بردن به نیت سر بریدن، ولی در صورت فراموشی اشکال ندارد.<br/>
| |
| − | ۵. حرکت کردن حیوان بعد از سر بریدن، مثل حرکت چشم، دم و پا، که معلوم شود زنده بوده است.<ref>. همان، م 2594.</ref><br/>
| |
| − | سؤال: آیا با چاقوی استیل جایز است سر بریدن یا نه؟<br/>
| |
| − | جواب: جایز است.<ref>. استفتائات آیت الله فاضل.ج 1، ص 376، س 344. برخی از مراجع تقلید سربریدن حیوان با چاقوی استیل را صحیح نمیدانند.</ref><br/>
| |
| − | مسئله. چند چیز از حیوان حلال گوشت حرام است:<br/>
| |
| − | ۱) خون ۲) مدفوع ۳) بچه دادن ۴) غدد ۵) دنبلان ۶) چیزی که در مغز کله است و به شکل نخود میباشد ۷) مغز حرام که در میان تیره پشت است، ۸) پیه که در دو طرف تیره پشت است، ۹) زهره دادن ۱۰) سپرز(طحال) ۱۱) بول دان (مثانه) ۱۲) حدقه چشم ۱۳) چیزی که در میان سُم است و به آن ذات الاشاجع میگویند و ۱۴) آلت تناسلی.<ref>. توضیح المسائل امام، م 2626.</ref><br/>
| |
| − | ===== شکار =====
| |
| − | اگر حیوان حلال گوشت وحشی با شرایطی که در رسآلههای عملیه آمده است، به وسیله سگ شکاری یا اسلحه شکار شود، حلال است.<ref>. ر.ک: همان، م 2614 تا 2583.</ref><br/>
| |
| − | ==== دستور کشتن شتر ====
| |
| − | اگر بخواهند شتر را بکشند باید با پنج شرطی که برای سر بریدن حیوانات گفته شد، کارد یا چیز دیگری را که از آهن و برنده باشد، در گودی بین گردن و سینهاش فرو کنند.<ref>. همان، م 2595.</ref><br/>
| |
| − | ===== صید ماهی =====
| |
| − | مسئله ۱ـ اگر ماهی پولک دار را زنده از آب بگیرند و یرون آب جان دهد پاک و خوردن آن حلال است و چنانچه در آب بمیرد پاک است، ولی خوردن آن حرام میباشد.<ref>. همان، م 2615.</ref><br/>
| |
| − | مسئله ۲ـ ماهی بی فلس را اگر چه زنده از آب بگیرند و بیرون آب جان دهد، حرام است.<ref>. همان، م 2615</ref><br/>
| |
| − | مسئله ۳ـ کسی که ماهی را صید میکند لازم نیست مسلمان باشد و در موقع گرفتن هم لازم نیست نام خدا را ببرد، ولی شخص مسلمان باید بداند که آن را زنده از آب گرفتهاند و در خارج آب مرده است. بنابراین در کشورهای غیراسلامی درصورتی که انسان بداند ماهی را زنده از آب میگیرند و بیرون آب جان میدهد، پاک و حلال است.<ref>. همان، م 2617.</ref><br/>
| |
| − | مسئله ۴ـ ماهی مردهای که معلوم نیست آن را زنده از آب گرفتهاند یا مرده، چنانچه در دست مسلمان باشد، حلال است و اگر در دست کافر باشد اگر چه بگوید زنده گرفتهام حرام میباشد.<ref>. همان، م 2618.</ref><br/>
| |
| − | مسئله ۵ـ لازم نیست ماهی پس از بیرون آمدن از آب خودش بمیرد، بلکه اگر آن را قطعه قطعه کنند و بدین سبب بمیرد، حلال است.<ref>. تحریر الوسیله، ج 2، ص 145، م 30.</ref><br/>
| |
| − | سؤال: خوردن تخم خاویار چه حکمی دارد؟<br/>
| |
| − | جواب: اگر از ماهی فلس دار باشد و یا معلوم نیست فلس دار است یا نه، خوردن آن اشکال ندارد، وگرنه حرام است.<ref>. استفتائات ج 2، ص 504.</ref><br/>
| |
| − | سؤال: خوردن ماهی زنده چه حکمی دارد؟<br/>
| |
| − | جواب: اشکال ندارد.<ref>. توضیح المسائل امام، م 2619. یادآوری میشود که خوردن ماهی زنده به فتوای برخی از مراجع معظم تقلید جایز نیست.</ref><br/>
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| − | سؤال: حکم بریان (کباب) کردن ماهی زنده چیست؟<br/>
| |
| − | جواب: اگر ماهی زنده را بریان کنند یا بیرون آب، قبل از جان دادن بکشند خوردن آن اشکال ندارد.<ref>. همان، م 2620.</ref><br/>
| |
| − | ==== ه. خون ====
| |
| − | مسئله ۱ـ خونِ هر حیوانی که جهنده باشد، نجس است. پس خون حیوانی که مثل ماهی و پشه جهنده نیست، پاک است.<ref>. همان، م 96.</ref><br/>
| |
| − | مسئله ۲ـ اگر حیوان حلال گوشت را به دستوری که قبلاً گفته شد بکشند...اگر به علت نفس کشیدن یا به واسطه این که سر حیوان در جای بلندی بوده، خون به بدن حیوان برگردد آن خون نجس است.<ref>. همان ، م 67.</ref> <br/>
| |
| − | مسئله ۳ـ گوشت خریده شده از بازار اگر به خون آلوده باشد و یقین نداشته باشد که از خونهای پاک است یا نجس، حکم به طهارت میشود.<ref>. همان، م 122.</ref><br/>
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| − | مسئله ۴ـ خونی که در تخم مرغ است، نجس نیست ولی خوردن آن حرام است.<ref>. همان، م 984. برخی از مراجع تقلید، خون در تخم مرغ را نجس میدانند.</ref><br/>
| |
| − | سؤال: اگر در برنج خیس خورده قطره خونی بیفتد، چه حکمی دارد؟<br/>
| |
| − | جواب: اگر تازه افتاده و آب نجس به باطن آن نرسیده، میشود آن را آب کشید، ولی اگر به باطن آن رسیده، قابل پاک شدن نیست و اگر شک داریم آب نجس به باطن رسیده یا نه، باطن پاک است.<ref>. همان، م 164 و 165.</ref><br/>
| |
| − | سؤال: اگر خون در برنج پخته شده که آب ندارد، افتاد چه حکمی دارد؟<br/>
| |
| − | جواب: همان جای نجس و مقداری از اطراف آن را بردارد، بقیه پاک است.<ref>. همان، م 129. به نظر برخی از مراجع تقلید آب کشیدن آن ممکن است.</ref><br/>
| |
| − | تذکر: خون گردن گوسفند بعد از سر بریدن نجس است و باید آب بکشند.<ref>. همان، م 96 و 97.</ref> <br/>
| |
| − | ==== ز. سگ و خوک ====
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| − | سگ و خوک که در خشکی زندگی میکنند، حتی مو، استخوان، پنجه، ناخن و رطوبت آنها نجس است. بنابراین در صورت برخورد هر یک از این قسمتها به مواد غذایی اگر در یکی رطوبت باشد، نجس خواهند شد بنابراین لازم است. رستورانهای بین راه و حتی شهری که سگها در اطراف آنها هستند، در تماس با محیط آشپزخانه و رستوران و مواد غذایی نباشند و ظروف و لوازم رستوران را از دسترس آنها دور نگهدارند.<br/>
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| − | سؤال: خوراکی که امروزه در آمریکا برای رشد سریع به مرغها داده میشود ۸۰٪ پروتئینی است که از گوشت خوک و گاو درست شده است. خوردن چنین مرغهایی که از اینگونه غذاها استفاده میکنند چه حکمی دارد؟ <br/>
| |
| − | جواب: اشکالی ندارد.<ref>. استفتائات، ج 2، ص 505.</ref><br/>
| |
| − | ==== ح. کافر ====
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| − | مسئله ۱ـ کافر کسی است که: منکر خدا است؛ یا برای خدا شریک قرار میدهد؛ یا پیغمبری خاتم الانبیاء صلی الله علیه و آله را قبول ندارد یا نسبت به یکی از اینها شک داشته باشد؛ یا یکی از ضروریات دین را که میداند ضروری است انکار کند به طوری که انکار آن به انکار خدا یا توحید و نبوت برگردد. مسئله ۲ـ تمام بدن کافر نجس است. بنابراین در صورت برخورد با مواد غذایی (اگر یکی از آن دو تر باشد) موجب نجس شدن مواد غذایی خواهد شد.<ref>. توضیح المسائل امام، مسئله 106.</ref>
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| − | سؤال: همان طور که اطلاع دارید، برادران اهل سنت مرغهایی که کشتار کشورهای غیرمسلمان است مصرف میکنند، به دلیل این که چنانچه ذابح اهل کتاب باشد، کافی میدانند و روی پاکت این مرغها جمله «ذبح علی حسب الشریعه الاسلامیه»، کشته شده به دستور اسلام، نیز نوشته شده، آیا استفاده کردن یک فرد شیعه از این مرغها جایز است یا خیر؟<br/>
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| − | جواب: تا احراز تذکیه <ref>. تذکیه: کشتن حیوان به دستور اسلام.</ref> نشود، و لو این که احتمال داده شود که وارد کننده مسلمان رعایت تذکیه شرعی را نموده و در اختیار مردم مسلمان برای استفاده گذاشته، حرام است.<ref>. استفتائات، ج 2، ص 499، س 16.</ref><br/>
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| − | سؤال: در یکی از شهرهای آمریکا برادران ایرانی از عربهای مسلمان گوشت، به اصطلاح ذبح اسلامی، میخریدند، ولی بعداً معلوم شده که خود عربها از گوشت ذبح شده یهودیها استفاده میکنند و با استناد به آیهای از قرآن (سوره مائده) میگویند که ما میتوانیم از ذبح اهل کتاب استفاده کنیم، لطفاً در مورد این آیه توضیح بفرمایید و در این صورت رابطه ما با کسانی که از این گوشتها استفاده میکنند از نظر پاکی و نجسی چگونه است؟<br/>
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| − | جواب: ذابح باید مسلمان باشد و منظور از طعام در آیه شریفه حبوب بخصوص گندم است و گوشتی که ذابح آن غیر مسلمان است در حکم میته است و نجس و نجس کننده است.<ref>. همان، س 20. </ref><br/>
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| − | سؤال: توسط اتحادیه چلوکبابیهای ایران گوشت یخ زده در کارتنهایی که معلوم نیست صادره از کدام کشور میباشد به چلوکبابیها جهت مصرف برای مشتریان داده میشود خواهشمند است بفرمایید مصرف این گوشتها از نظر شرع اسلام بلامانع است یا خیر؟ جواب: در فرض مذکور محکوم به حلّیت است.<ref>. همان، ص 498، س 14.</ref> سؤال: آیا مصرف کنسروهای ماهی که در بازار مسلمین به فروش میرسد جایز است یا خیر؟<br/>
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| − | جواب: اگر ندانند از کجا وارد شده یا بدانند که از بلاد مسلمین است، مانع ندارد و اگر بدانند از بلاد کفر وارد میشود در صورتی محکوم به حلیت است که احتمال بدهند وارد کننده مسلمان احراز تذکیه آن را کرده و در دسترس مسلمین قرار داده است.<ref>. همان، س 15، صید.</ref><br/>
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| − | سؤال: روغنهای خارجی چه حکمی دارد؟ جواب: تا یقین ندارد که از حیوان حرام گوشت گرفته شده و یقین ندارد که با رطوبت با بدن کافر تماس گرفته، پاک و حلال است.<ref>. همان، ج 2، س 13 و توضیح المسائل امام، م 259 و م 94.</ref><br/>
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| − | سؤال: استفاده از لبنیات خارجی مانند پنیر، کره، شیر و ماست چه حکمی دارد؟<br/>
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| − | جواب: تا یقین به ملاقات (برخورد) چیزی با رطوبت با بدن کافر پیدا نکنید، پاک است.<ref>. همان، ص 508، س 11.</ref><br/>
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| − | سؤال: استفاده از نان، لوبیا، رب گوجه فرنگی، سبزی و امثال آن که در خارج هست یا از خارج وارد میشود چه حکمی دارد؟<br/>
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| − | جواب: در موارد غیرگوشتی تا یقین به نجاست آن ولو از طریق تماس آنها با بدن کافر با رطوبت ندارند، پاک است.<ref>. همان، س 14.</ref><br/>
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| − | ==== ط. شراب و فقاع ====
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| − | مسئله. شراب و هر چیزی که انسان را مست میکند، چنانچه به خودی خود روان باشد نجس و خوردن آن حرام است و اگر مثل بنگ و حشیش روان نباشد، اگر چه چیزی در آن بریزند که روان شود پاک است، ولی مصرف آن حرام است.<ref>. توضیح المسائل امام، م 111.</ref><br/>
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| − | مسئله. خرما و موز و کشمش و آب آنها اگر جوش بیایند پاک و خوردن آن حلال است. <br/>
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| − | مسئله. فقاع که از جو گرفته میشود و به آن آبجو میگویند، نجس و خوردن آن حرام است، ولی آبی که به دستور پزشک از جو میگیرند و به آن ماءالشعیر میگویند، پاک و خوردن آن حلال میباشد.<ref>. همان، م 114، برخی از مراجع معظم تقلید، آن را نجس میدانند.</ref><br/>
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| − | === روش پاک کردن مواد نجس شده ===
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| − | مطابق احکام اسلامی مواد غذایی غیرگوشتی، پاک است، مگر آن که یقین به نجاست آن داشته باشیم، پس :<br/>
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| − | ـ اگر انسان میداند چیزی نجس نشده، پاک و حلال است.<br/>
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| − | ـ اگر شک دارد، نجس است یا نه، پاک است؛<br/>
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| − | ـ اگر احتمال میدهد نجس شده، ولی یقین ندارد، پاک است.<ref>. احکام فقهی در سفرهای خارجی، محمد حسین فلاح زاده، ص 129.</ref><br/>
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| − | ==== ظروف نجس شده ====
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| − | روشن است که در صورت آلوده شدن ظرف به نجاست باید آن را پاک کرد، تا خود آن ظرف و غذایی که در آن ریخته میشود به نجاست آلوده نشود، زیرا پذیرایی از میهمان و مشتری در ظرف آلوده به نجاست حرام است.<ref>. توضیح المسائل امام، م 142 و 145.</ref><br/>
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| − | سؤال: ظروف نجس را چگونه با آب پاک کنیم؟ جواب: اگر با آب کر یا جاری مثل آب رودخانه و چشمهها یا با آب شیر که متصل به منبع کر است، آب بکشیم، بعد از برطرف شدن نجاست، یک مرتبه کافی است؛ گرچه بهتر سه مرتبه است، ولی اگر با آب قلیل (یعنی کمتر از کر) آب بکشیم بعد از برطرف شدن نجاست، سه مرتبه باید آب کشید.<ref>. همان، م 150.</ref><br/>
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| − | سؤال: ظرفی که به شراب نجس شده چگونه پاک میشود؟<br/>
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| − | جواب: با قلیل و کر سه مرتبه و بهتر است هفت مرتبه شسته شود.<ref>. همان، م 153، بعضی از مراجع معظم حکم مردن موش صحرایی در ظرف را مانند حکم خوردن خوک از ظرف میدانند.</ref><br/>
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| − | سؤال: اگر غیر مسلمان وارد چلوکبابی و تالار پذیرایی شد، از نظر غذا و طهارت و نجاست چه حکمی دارد؟ جواب: بدنش نجس است. اگر با رطوبت، دست به جایی زد یا غذا و آب خورد، باید ظرف را آب کشید.<ref>. همان، م 106. آیت الله خامنهای: پاک است؛ اگر اهل کتاب باشد. استفتائات ج 1، س 324 احکام نجاسات.</ref> <br/>
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| − | ==== طهارت کارکنان غذاخوری ====
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| − | اگر هنگام کار، یکی از کارکنان غذاخوری به نجاستی مثل خون آلوده شد، اولین کار و وظیفه این است که از سرایت و انتقال آن به جاهای دیگر و ظروف و احیاناً غذاها جلوگیری کند و گرنه هر چیزی که به نجس برخورد کند، آلوده خواهد شد. بنابراین باید نجاست را برطرف و آن را آب بکشد، یا به گونهای ببندد که مانع از سرایت آن شود.<br/>
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| − | سؤال: آیا خون اگر خشک شد و از بین رفت، محل خون پاک میشود؟<br/>
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| − | جواب: خیر، تا آن را آب نکشند پاک نمیشود.<ref>. همان، م 148 و 149.</ref> <br/>
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| − | سؤال: دست یا عضو نجس شده خود را چگونه پاک کنیم؟<br/>
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| − | جواب: بدن، با یک مرتبه آب کشیدن در آب کر پاک میشود و در قلیل دو مرتبه، در لباس و فرش و مانند آن احتیاطاً دو مرتبه با آب کر و قلیل، آب بکشند و در هر مرتبه لباس و مانند آن را فشار دهند تا آب داخل آن خارج شود.<ref>. همان، م 149.</ref>
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| − | ==== طهارت محل غذاخوری ====
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| − | اگر زمین و صندلی و میز و اشیای دیگر نجس شد، باید مواظب بود تا نجاست به جاهای دیگر نرسد و بهتر است آن محل را فوری آب بکشند.<br/>
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| − | ـ روش آب کشیدن زمین<br/>
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| − | اگر با آب کر باشد، بعد از برطرف شدن نجاستی مانند خون، با یک مرتبه پاک میشود و با آب قلیل دو مرتبه و آبهایی که جمع میشود، اگر در جایی فرو میرود همه زمین پاک میشود واگر چاه ندارد، یا زمین سفت است، آبهای جمع شده را باید با دستمال یا ابری جمع کرد و بیرون ریخت چون آبها نجس هستند.<ref>. همان، م 180.</ref><br/>
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| − | زمین نجس با نور آفتاب نیز پاک میشود، ولی شرایطی دارد که برخی از آنها عبارت است از: <br/>
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| − | ۱ـ زمین خیس باشد؛ <br/>
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| − | ۲ـ اول عین نجاست را برطرف کنند؛<br/>
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| − | ۳ـ چیزی مانند پرده یا ابر از تابش آفتاب جلوگیری نکند، مگر آنکه ابر رقیق یا پرده نازک باشد.<br/>
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| − | ۴ـ به کمک باد خشک نشود.<ref>. همان، م 191.</ref><br/>
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| − | سؤال: روش آب کشیدن میز و صندلی چگونه است؟<br/>
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| − | جواب: مثل آب کشیدن زمین است، ولی با آفتاب پاک نمیشود، مگر در زمین به گونهای کار گذاشته باشند که قابل حمل و نقل نباشد.<ref>. همان، م 191.</ref><br/>
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| − | سؤال: آیا زمین و میز و صندلی نجس را اگر دستمال بکشیم یا با «تی» پاک کنیم، بدون آب پاک میشود؟ جواب: نه، بلکه نجاست به جاهای دیگر هم سرایت میکند.<ref>. همان، م 148.</ref><br/>
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| − | === بخش چهارم: خرید و فروش مواد غذایی ===
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| − | صنف چلوکبابیها و تالارها مانند هر صنف خدماتی دیگر برای ارائه خدمت به مشتری از طریق فروش غذا و خدمات اقدام میکنند. از این نظر فرآیند خرید و فروش همانند اصناف دیگر است. اما ویژگیهایی دارد که به خاطر آن بخشی از مسایل و جلوههای خرید و فروش در آن بیشتر معمول است، مثلاً در این صنف کم پیش میآید که غذا به صورت نسیه فروخته شود و... از این روی در این بخش تنها به برخی از مسایل مورد ابتلا اشاره میکنیم. <br/>
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| − | مسئله: خرید و فروش نجاسات، مانند مشروبات الکلی، گوشت خوک و گوشت حیوانی که ذبح شرعی نشده و نجس است، حرام و معامله آن باطل است.<ref>. اشیایی که از پوست و چرم مردار تهیه شده، نجس و خرید و فروش آن حرام است، ولی [[خرید و فروش خون]] برای بیماران اشکال ندارد. مسائل جدید، آیه الله مکارم شیرازی، س 21؛ تحریر الوسیله، ج 1، ص 493، م 1 و توضیح المسائل امام، م 2063.</ref><br/>
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| − | سؤال: کم خوردن شراب، مثل یک قاشق آن، که برای بدن ضرر ندارد و عقل را ضایع نمیکند، لطفاً بفرمایید که چرا اسلام حتی یک ذّره آن را حرام میداند؟ جواب: ملاک دراین حکمِ اسلامی، تنها ضرر نیست.<ref>.توضیح المسائل امام، م 2081. </ref>
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| − | تذکر:<br/>
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| − | در باره شدّت حرمت شراب، در روایات میخوانیم که شراب ریشه همه بدیها و سرچشمه گناهان است. کسی که شراب میخورد عقل خود را از دست میدهد و در آن موقع خدا را نمیشناسد؛ از هیچ گناهی پروا ندارد؛ احترام هیچ کس را نگاه نمیدارد؛ حق خویشان نزدیک را مراعات نمیکند و...؛ خداوند، فرشتگان، پیامبران و مؤمنین او را لعنت میکنند، روز قیامت روی او سیاه است و زبان از دهانش بیرون میآید و فریاد تشنگی او بلند است و نمازش تا چهل روز قبول نیست،<ref>. منظور این نیست که [[نماز]] نخواند، و گرنه خود گناهی دیگر است. </ref> مگر این که توبه کند.<ref>. توضیح المسائل امام، خلاصه م 2633.</ref><br/>
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| − | کارفرمایان، کارگران و میهمانان باید به طور جدی از این [[گناه]] بزرگ دوری کنند؛ گناهی که از جمله گناهان کبیره است.<ref>. استفتائات، ج 2، ص 510، س 16.</ref><br/>
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| − | مسئله: نشستن سر سفرهای که در آن شراب میخورند، اگر انسان یکی از آنان حساب شود، حرام و چیز خوردن از آن سفره (اگر چه غیر شراب باشد) حرام است.<ref>. همان، م 2634.</ref><br/>
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| − | مسئله: اگر چیز پاکی مانند روغن که آب کشیدن آن ممکن نیست، نجس شود، چنانچه مثلاً روغن نجس را برای خوردن به خریدار بدهند، معامله باطل و عمل حرام است و اگر برای کاری بخواهند که شرط آن پاک بودن نیست، مانند درست کردن صابون از روغن نجس، فروش آن اشکال ندارد.<ref>. همان، م 2057.</ref><br/>
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| − | مسئله: فروختن چیز پاکی که نجس شده و آب کشیدن آن ممکن است، اشکال ندارد، ولی اگر مشتری بخواهد آن چیز را بخورد فروشنده باید نجس بودن آن را به او بگوید.<ref>. همان، م 2056.</ref><br/>
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| − | ==== فروش غذای فاسد شده ====
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| − | مسئله: استفاده و فروش غذای مانده و فاسد که موجب ضرر جانی و مسمومیت شود، شرعاً حرام <ref>. استفتائات، ج 2، س 90 و 15.</ref> و از لحاظ اخلاقی خلاف و از حیث قانونی هم جرم است.<br/>
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| − | سؤال: خوردن چیزی که ضرر دارد چه حکمی دارد؟<br/>
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| − | جواب: اگر ضرر مهم و قابل توجه باشد، حرام است.<ref>. توضیح المسائل امام، م 2630.</ref><br/>
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| − | سؤال: خوردن چیزهایی که طبیعت انسان از آنها بدش میآید، چه حکمی دارد؟<br/>
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| − | جواب: حرام است؛ مثل غذاهای بو گرفته فاسد.<ref>. همان، م 2627. </ref><br/>
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| − | سؤال: خوردن بعضی از غذاها مثل کالباس و سوسیس، که اگر تحقیق شود اکثر پزشکان آنها را برای سلامتی معده مضر میدانند، از لحاظ شرعی چگونه است؟<br/>
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| − | جواب: اگر یقین به بودن چیز حرامی در آن ندارند، اشکال ندارد، مگر معلوم شود که ضرر مهم و قابل توجه دارد.<ref>. استفتائات ج 2، ص 509، س 15. </ref> <br/>
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| − | سؤال: شخصی گوسفند مریض خود را مخفیانه به قیمت ارزانتری به قصاب میفروشد، قصاب هم گوسفند را ذبح کرده و به قیمت گوشت سالم به مشتریها میدهد. ممکن است مضر و مسموم باشد، آیا معامله قصاب با صاحب گوسفند و مشتری او حرام است یا علاوه بر حرمت باطل است؟ و در مورد پول و عوضی که میدهد چطور؟ جواب: معامله باطل نیست، اگر چه تدلیس حرام است.<ref>. همان، ص 34، س 91.( تدلیس: به اشتباه انداختن و فریب دادن دیگران)</ref><br/>
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| − | سؤال: تعدادی از روغنهای نباتی مایع خارجی که به صورت استریل در قوطیهای یک لیتری میباشد بر اثر خرابی لوله آب در انبار زنگ زده و در نتیجه سوراخ شده و روغنها... . با در نظر گرفتن این که مزه و طعم این روغنهابا طعم و مزه روغنهایی که در قوطیهای سالم است، فرقی ندارد. آیا میتوان فروخت؟<br/>
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| − | جواب: اگر فاسد نشده و ضرر هم نداشته باشد، اشکال ندارد.<ref>. همان، م 90.</ref><br/>
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| − | ==== غش در فروش ====
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| − | مسئله: غش در معامله، یعنی فروختن جنسی که با چیز دیگر مخلوط است، در صورتی که آن چیز معلوم نباشد و فروشنده هم به خریدار نگوید، مثل فروختن برنج نامرغوب که با برنج مرغوب مخلوط شده باشد، به نام برنج مرغوب.<br/>
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| − | پیامبر اکرم صلی الله علیه و آله فرموده است: «از ما نیست کسی که در معامله با مسلمانان غش کند یا به آنان ضرر بزند یا تقلب و حیله نماید و هر که با برادر مسلمان خود در خرید و فروش غش کند، خداوند برکت روزی او را از بین میبرد و راه معاش او را میبندد و او را به خودش واگذار میکند.»<ref>. همان، م 2055.</ref><br/>
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| − | تقلّب در فروش کاری خلاف اخلاق و در برخی موارد حرام و سبب باطل بودن معامله نیز خواهد بود. اکنون نمونههایی از آن را یادآور میشویم:<br/>
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| − | ـ صاحب غذاخوری به جای گوشت گوسفند از گوشت گاو استفاده کند؛ <br/>
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| − | ـ برنج درجه دو یا... را به عنوان برنج درجه یک و مرغوب حساب کند؛<br/>
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| − | ـ در پخت غذا از مرغ مریض استفاده کند؛<br/>
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| − | ـ به جای زعفران، گل رنگ مصرف کند؛<br/>
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| − | ـ به جای گوشت، سویا بریزد؛<br/>
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| − | ـ به جای روغن خوب، روغن نامرغوب یا دنبه مصرف کند؛<br/>
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| − | ـ به اسم سرویسهای غذاخوری بهداشتی و سالم مواد غذایی حفاظت نشده و تاریخ مصرف گذشته را در اختیار مشتریان بگذارد.<ref>. استفتائات امام، ج 2، س 58 کسبهای حرام و توضیح المسائل امام م 2139.</ref><br/>
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| − | مسئله: از مواردی که انسان میتواند معامله را فسخ کند عبارتست از:<br/>
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| − | ۱ـ فروشنده یا خریدار مال خود را بهتر از آنچه هست نشان دهد و طوری کند که قیمت مال در نظر مردم زیاد شود.<br/>
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| − | ۲ـ فروشنده خصوصیات جنس معینی را که مشتری ندیده به او بگوید، بعد معلوم شود طوری که گفته، نبوده است.<ref>. توضیح المسائل امام، م 2124.</ref><br/>
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| − | مسئله: اگر غذای اعلا را با غذای پست مخلوط کند و به اسم چای اعلا به مشتری بدهد، مشتری میتواند معامله را به هم بزند.<ref>. همان، م 2128.</ref><br/>
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| − | سؤال: این جانب در کارخانهای کار میکنم که کارش آب میوهگیری است. تقاضا دارم بفرمایید من چه وظیفهای در مقابل کارهای نامشروع این کارخانه دارم. برای این کار به ما دستور میدهند در آب پرتقال آب مخلوط نماییم. آیا به کار خود ادامه دهیم یا نه؟<br/>
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| − | جواب: اگر میدانید که در وقت فروش به عنوان آب پرتقال خالص فروخته میشود، باید دست از این کار بردارید و در غیراین صورت برای شما اشکالی ندارد.<ref>. استفتائات ج 2، ص 22، س 58.</ref> در رستورانها هم اگر این گونه اقدامات انجام شود کارگران و مسئولان هر دو مسؤول میباشند. <br/>
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| − | ==== کم فروشی و گران فروشی ====
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| − | کم فروشی از جمله گناهانی است که آیات زیادی در مذمت آن نازل شده است؛ مانند:<br/>
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| − | «اوفوا الکیل و لا تکونوا من المخسرین و وزنوا بالقسطاس المستقیم و لا تبخسوا الناس اشیائهم و لا تعثوا فی الارض مفسدین و اتقوا الذی خلقکم و الجبله الاولین»؛<ref>. شعراء/ 181 تا 183.</ref><br/>
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| − | پیمانه را در فروش پر کنید و از کم کنندگان نباشید و با ترازوی درست وزن کنید و از وزن و پیمانه کم نگذارید و در زمین فساد نکنید و از آن که شما و مردمان گذشته را آفریده است بترسید و [[تقوا]] پیشه کنید.<br/>
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| − | بر این اساس، لازم است مقدار مواد غذایی آن طبق مقررات و دستورات صنف مذکور باشد واز هر نوع خلاف، مانند کم گذاشتن برنج، گوشت، سالاد، ماست، نان و یا هر خدمت دیگر پرهیز شود.<br/>
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| − | سؤال: اصولاً کسی که کاسبی میکند، چه مبلغی از جنس را باید سود ببرد که مالش حرام نشود؟<br/>
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| − | جواب: اگر مقرراتی از طرف دولت اسلامی هست، باید مراعات شود و در هر صورت اجحاف و گرانفروشی موجب حرام شدن مال نیست.<ref>. استفتائات ج 2، ص 62، س 172.</ref><br/>
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| − | ===== احتکار =====
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| − | یکی از کارهای خلاف، پنهان کردن جنس و عرضه نکردن آن است؛ با این هدف که به افراد مورد نظر با قیمت بالاتر بفروشد.<br/>
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| − | ==== فروش اجباری ====
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| − | یکی از راههای نامشروع برای افزایش درآمد که گاه مورد استفاده صاحبان غذاخوریها نیز قرار میگیرد، فروش اجباری اجناس است. زمانی به بهانه نداشتن پول خرد، آدامس، شکلات و... به مشتری میدهند. این کار چون نقض یکی از شرایط لازم برای فروشنده و خریدار است، اشکال دارد. مگر آن که مشتری نیز رضایت داشته باشد.<br/>
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| − | مسئله: در مورد فروشنده و خریدار شش چیز شرط است...؛ از جمله این که، کسی آنها را مجبور نکرده باشد<ref>. توضیح المسائل امام، م 2081.</ref>. <br/>
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| − | به این ترتیب اگر خود آنها هم یکدیگر را مجبور کنند، معامله اشکال خواهد داشت.<br/>
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| − | ==== تعیین نکردن نرخ غذا و خدمات ====
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| − | مسئله: جنسی که میفروشند و چیزی که در عوض آن میگیرند شرایطی دارد، از جمله:<br/>
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| − | ۱ـ مقدار آن با وزن یا پیمانه یا شماره و مانند اینها معلوم باشد.<br/>
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| − | ۲ـ بتوانند آن را تحویل دهند.<br/>
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| − | ۳ـ خصوصیاتی را که در جنس و عوض هست و به واسطه آنها میل مردم به معامله فرق میکند معین نماید<ref>. همان، م 2090.</ref>.<br/>
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| − | مسئله: اگر یکی از شرطهایی که گفته شد در معامله نباشد معامله باطل است، ولی اگر خریدار و فروشنده راضی باشند که در مال یکدیگر تصرف کنند تصرف آنها اشکال ندارد<ref>. همان، م 2093.</ref>.<br/>
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| − | شایسته است فروشندگان مواد غذایی در سالنها و تالارهای پذیرایی قیمت را به اطلاع مشتری برسانند. این کار میتواند با نصب تابلوهای قیمت در محلهای کاملاً قابل مشاهده صورت بگیرد تا مشتری با اطلاع از قیمتها نسبت به خرید غذا تصمیم بگیرد. <br/>
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| − | در این باره از امام رضا داستانی نقل شده که مضمون و خلاصه آن این است که: آن حضرت باغی داشتند، روزی به آن جا رفتند و دیدند عدهای کارگر مشغول به کار هستند. حضرت پرسیدند. دربارهٔ مزد با اینها صحبت کردهاید؟ مسئول کار گفت: نه! هر چه بدهیم راضی میشوند.امام علیهالسلامناراحت شدند و فرمودند: اگر از اول مشخص کنید که مزدش چقدر است و بعد اضافه دهید میفهمد احسان کردهاید و اگر به اندازهاش بدهید میداند که حقش را گرفته است، اما اگر از اول صحبت نکنید، بعداً اگر زیاد هم مزد بدهید فکر میکند حقش است یا حتی کمتر از حقش را گرفته است<ref>. منتهی الامال ج 2، حالات امام رضا، ش 9، از مکارم اخلاق حضرت.</ref>.<br/>
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| − | ==== فروش مواد سهمیهای ====
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| − | اگر سهمیهای در اختیار غذاخوریها قرار میگیرد، به خاطر استفاده مشتریهاست. بنابراین، باید در همان مورد به مصرف برسد و اگر آن را به مشتریان عرضه نکند و به طور آزاد به فروش رساند نوعی تجاوز به حقوق دیگران است و فروش به قیمت گرانتر یا مصرف در غیر مورد تعیین شده از نظر حکومت اسلامی، [[گناه]] است<ref>. استفتائات امام ره، ج 2، س 147، کسبهای حرام.</ref>.<br/>
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| − | سؤال: سهم قند و شکر که به قنادیها و... میدهند اگر بفروشند سود او حلال است یا نه؟<br/>
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| − | جواب: باید مقررات دولت اسلامی را رعایت کنند<ref>. همان، س 144.</ref>.<br/>
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| − | سؤال: با توجه به اینکه بیشتر اجناسی که در بازار هست از طریق تعاونیها توزیع میشود و باید به دست مردم برسد، چند سؤال مطرح است: سؤال اول : برخی اجناس هست که به طور مستقیم زیر نظر تعاون نیست، مثلاً به فلان کاسب به نرخ معین داده میشود و به او گفته میشود که به این قیمت به طور خرده فروشی به دست مصرف کننده و خریدار بدهد. حال در صورت تخلف... آیا حرام است؟<br/>
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| − | سؤال دوم: همان اجناسی که هر کسی میداند و آگاهی کامل دارد که مال تعاونی است، ولی ما میبینیم در بازار تهران و یا...به فروش میرسانند من و امثال من که میرویم و این اجناس را میخریم و به بازار میآوریم و با قیمت گرانتر به دست مصرف کننده میرسانیم لطفاً در این زمینه نظر خود را بفرمایید.<br/>
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| − | جواب: مخالفت با مقررات دولت اسلامی جایز نیست، ولی اگر نمیداند جنسی که در بازار به فروش میرسد از چه طریقی تهیه شده خرید و فروش آن اشکال ندارد.<ref>. همان، س 145.</ref><br/>
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| − | ==== جلب مشتری ====
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| − | از جمله کارهای ناشایست برخی غذاخوریها این است که با علم به این که اختیار مسافران دست راننده است، با پیشنهاد مبلغی به وی و یا در اختیار گذاشتن غذا و امکانات ویژه که مسافران در آن حقی ندارند، او را تشویق میکنند مسافرانش را در آن جا پیاده کند. چنین عملی، از آن جهت که مشتری را در واقع به نوعی مجبور به صرف غذا میکند، خلاف است و از نظر اخلاقی هم عمل زشتی را مرتکب شدهاند، زیرا حق مردم را نادیده گرفته و رابطه دوستی را بر قانون و حق مردم، بی جهت مقدم کردهاند. <br/>
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| − | [[اسراف]] در غذا [[اسراف]] در لغت به معنای تجاوز از حد و میانه روی است.<ref>. المنجد ذیل کلمه سرف.</ref> در خصوص مواد غذایی میتوان به آیه شریفه «کُلُوا وَ اشْرِبُوا وَ لا تُسْرِفوُا» <ref>. بخورید و بیاشامید و [[اسراف]] نکنید.اعراف / 31.</ref> استناد کرد. در روایات نیز ائمه به شدت از این عمل ناپسند نهی کردهاند. امام صادق علیهالسلام میفرماید:<br/>
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| − | «اَدْنَی اَلْاِسْرافِ هِراقَهٌ فَضْلِ الْاِناءِ وَ ابْتِذالُ ثَوْبِ الصَّونِ وَ اِلْقاءُ النَّوی»<ref>. وسایل الشیعه، ج 3، باب 28، ص 374، چاپ اسلامیه.</ref>.<br/>
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| − | یعنی، پایینترین مرتبه [[اسراف]] عبارت است از دور ریختن آبی که از آشامیدن اضافه آمده است، یکی بودن لباس کار و منزل و دور انداختن هسته خرما پس از خوردن آن. <br/>
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| − | بنابراین [[اسراف]] در مواد غذایی که مورد عنایت ویژه قرآن کریم نیز هست، از گناهان مسلم است.<ref>. امام خمینی قدسسره تحریرالوسیله، ج 1، ص 275 [[اسراف]] را جزء گناهان کبیره میداند.</ref> برخی از اسرافهای مورد ابتلای صنف غذاخوریها عبارت است از:<br/>
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| − | ـ [[اسراف]] در آب<br/>
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| − | به دلیل مراجعان زیاد، شیرهای آب خیلی زود خراب میشوند و این امر چنان عادی میشود که بعضی مسؤلان غذاخوریها تعمیر آن را کاری جزئی و وقت گیر میدانند. <br/>
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| − | بعضی مشتریان نیز به دلیل بی توجهی در بستن صحیح شیرهای آب سبب [[اسراف]] میشوند. <br/>
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| − | نکته: نقل است که امام خمینی (ره) اگر مقداری از آب لیوان را مینوشید، روی لیوان سرپوش میگذاشت تا دفعهبعد بقیه آب را بنوشد.<br/>
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| − | ـ [[اسراف]] در برق<br/>
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| − | گاهی برای جذب مشتری، لامپهای پرمصرف به تعداد زیاد و خارج از حد متعارف استفاده میشود و یا برخی لامپها در جاهایی که اصلاً مراجعه کنندهای ندارد روشن میمانند وگاه صورت فریب هم به خود میگیرد، زیرا فروشنده تلاش میکند برخلاف واقعیت، مشتری را وادار به خرید کند که این خود خلافی دیگر است.<br/>
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| − | ـ [[اسراف]] در غذا<br/>
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| − | معمولاً برای تمام مسافران و مشتریها غذا به یک اندازه داده میشود و حال آن که میل و اشتهای افراد متفاوت است. خستگی، اضطرابها، خواب آلودگی، کمبود فرصت و دهها عامل دیگر باعث میشود که برخی کمتر غذا بخورند. به همین خاطر بقیه غذای آنان باقی میماند. چنانچه مسئولان غذاخوریها، برای مصرف شدن این غذا فکری نکنند و آن را دور بریزند دچار [[اسراف]] شدهاند. شایسته آن است که بخشهای دست نخورده غذا را جمعآوری و برای فقرا بفرستند، یا لااقل برای خوراک دام و طیور از آن استفاده کنند. از طرفی هم شایسته است که مسافران در صورتی که نیاز به غذای کمتری دارند، آن را به اطلاع میهمان دار برسانند تا از زیاد آمدن و [[اسراف]] غذا جلوگیری شود. گاهی به علت سفارش بیش از نیاز مشتری، در مراسمهای شادی یا عزا مقداری غذا در چلوکبابی باقی میماند، در این گونه موارد بهتر است مسئولان تالارها با هماهنگی صاحبان غذا، آن را به عنوان دیون مالی آنان به فقرا برسانند و یا در اختیار مؤسسات خیریه قرار دهند.<br/>
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| − | سؤال: زیاده روی در مصرف آب و برق در صورتی که موجب کمبودهایی در سطح عمومی شود، چه حکمی دارد؟<br/>
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| − | جواب: زیادهروی به نحو غیرشفاف حرام است و چنانچه موجب اتلاف و ضرر باشد، موجب ضمان است.<ref>. استفتائات امام، ج 2، ص 622، س 23.</ref> <br/>
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| − | سؤال: اگر مشتری و میهمان مقداری غذا یا نوشابه بخورد و بقیه بماند، میتوان از آن استفاده کرد؟<br/>
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| − | جواب: اگر صرف نظر کرده باشد، اشکال ندارد،<ref>. مستفاد از استفتاات امام ج 2، ص 602، س 7 لفظه.</ref> البته بهتر است برای نوشیدنیهای این چنینی لیوان در نظر گرفته شود تا باقی مانده نوشابه از جهت بهداشتی مشکل نداشته باشد.<br/>
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| − | == فصل دوم: منکرات اجتماعی ==
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| − | این صنف به دلیل ارتباط گسترده با مردم و فراهم آوردن بستر لازم برای اجتماعات و برگزاری مراسم، از جهاتی در معرض آسیبپذیری است که در صورت ترویج رفتارهای شایسته، این آسیبها در محدوده ارتباطات اجتماعی مسلمانان به حداقل خواهد رسید و اجتماعات هماهنگ با ارزشهای اخلاقی و اجتماعی شکل خواهد گرفت. شکلگیری مجالس گناه، (مجالسی که در آن ارزشهای دینی خدشهدار میشود) گاه مانند اختلاط محرم و نامحرم، گاه به نوع غذاها(مانند مسکرات و غذاهای حرام) و گاه به محتوا و برنامه هاست؛ مانند مجالسی که برای رقص و ابتذال تشکیل میشود.<br/>
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| − | === بخش اول: شکل مجلس ===
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| − | ==== اختلاط زن و مرد ====
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| − | حضور زنان و مردان در میهمانیهای مشترک، خصوصاً عروسیها و شادیها، گاه به اختلاط نامشروع آنان میانجامد. از نظر اسلام، لازم است که صاحبان غذاخوریها از فراهم کردن چنین مجالسی خودداری کنند و در صورت وقوع، وظیفه دارند که جلوگیری و نهی از منکر کنند. در داستان حضرت موسی علیهالسلام آمده است که: وقتی آن حضرت بر سر چاه آبی در حوالی شهر مَدْین رسید، جماعتی را دید که گوسفندان خود را سیراب میکردند. او دو زن را دید که دور از مردان در کناری به
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| − | جمع آوری گوسفندان خود مشغولاند. حضرت موسی علیهالسلام به طرف آنها رفت و پرسید: شما در این جا چه کار دارید؟ آن دو گفتند: (به خاطر عدم اختلاط با مردان) این جا به انتظار نشستهایم که مردان گوسفندان خود را سیراب کنند و بروند، آن گاه ما گوسفندان خود را سیراب کنیم<ref>. قصص/ 23.</ref>.<br/>
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| − | امام علی علیهالسلام خطاب به اهل عراق که به نوعی دچار این مشکل شدهاند میفرماید: «یا اَهْلَ الْعِراق نُبِّئتُ اَنَّ نِساءَ کُمْ یدافِعنَ الرِّجالَ فِی الطَّریق اَما تَسْتَحْیون؟ لَعَنَ اللُّه مَنْ لا یغار»<ref>. وسایل الشیعه، ج 14، ص 174.</ref>.<br/>
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| − | ای اهل عراق! به من خبر دادهاند که زنان شما در راه با مردان برخورد و اختلاط دارند، آیا شرم نمیکنید؟ خدا لعنت کند انسانهای بی غیرت را!<br/>
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| − | مسئله. اختلاط زن و مرد اگر موجب مفسده باشد، حرام است<ref>. احکام دختران،محمد وحیدی، ص 198، س 3، از اختلاط و تماس زیاد با نامحرم اجتناب شود.</ref>.<br/>
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| − | مسئله. هدف از مختلط نشدن، محدود کردن فعالیت اجتماعی زنان نیست، جلوگیری از مفاسد است. به همین خاطر حضور آنان در مجامعی مثل [[نماز]] جماعت و جمعه، نه تنها مکروه نیست، گاه مطلوب نیز میباشد.<ref>. همان، ص 200، س 8.</ref><br/>
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| − | مسئله. شنیدن صدای زنها اگر به قصد لذّت باشد حرام است.<ref>. تحریر الوسیله امام ره، ج 2، نکاح، م 29، ص 245.</ref><br/>
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| − | مسئله. گفتگوی زن با مرد نامحرم و مرد با زن نامحرم، اگر زمینه [[گناه]] باشد یا سبب فساد و تحریک شهوت شود، حرام است.<ref>. همان.</ref><br/>
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| − | با توجه به مطالب گفته شده، مسئولان این صنف وظیفه دارند که حتی الامکان مانع هرگونه اختلاطی بشوند و در صورت ناچاری، زمینههای مفسده را از بین ببرند و اگر عمداً آنها را در معرض اختلاط مفسدهانگیز قرار دهند، امر حرامی را مرتکب شدهاند.<br/>
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| − | سؤال: در برخی غذاخوریها، محل وضوی زن و مرد به گونهای است که آنان همدیگر را میبینند، آیا [[وضو گرفتن]] به این نحو اشکال دارد؟<br/>
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| − | جواب: نباید آن جا وضو بگیرد، چنانچه گرفت، وضو صحیح است ولی [[گناه]] کرده است.<ref>. عروه الوثقی، ج 1، شرایط الوضوء، م 3.</ref><br/>
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| − | سؤال: در برخی مسافرخانهها محل [[نماز]] زن و مرد جدا از هم نیست و مانعی مثل پرده بین آنها وجود ندارد، آیا [[نماز]] اشکال دارد؟<br/>
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| − | جواب: در صورتی که مفسدهای نیست، پرده لزومی ندارد، بلکه در [[نماز]] احتیاط آن است که زن عقبتر از مرد باشد؛ مگر در صورتی که بین آنان مانعی مثل پرده باشد.<ref>. احکام دختران، محمد وحیدی، ص 156.</ref><br/>
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| − | برای جلوگیری از تشکیل مراسم مختلط و مفسدهانگیز توجه به این نکات لازم است:<br/>
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| − | ۱. محل کار مردان و زنان و سرویس دهی به آنان جدا باشد. متاسفانه برخی مسؤولان از فروشندگان زن برای جلب مشتری استفاده میکنند که در صورت داشتن مفسده، امر حرامی مرتکب شدهاند.<br/>
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| − | ۲. دربهای ورودی برای زن و مرد مستقل باشد.<br/>
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| − | ۳. بانوان بی [[حجاب]] دعوت به [[حجاب]] شوند.<br/>
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| − | ۴. صدای زنها به مردها نرسد.<br/>
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| − | ۵. از رفت و آمد مردها به قسمت زنان پرهیز شود؛ حتی داماد<ref>. ورود داماد در مجلس زنها برای دیدن عروس، در صورتی جایز است که هم او به نامحرم نگاه نکند و هم زنهای غیرمحرم حجابشان را رعایت کنند. (احکام دختران، محمد وحیدی، ص 302، م 6.) </ref> و برای امور ضروری هم از زنان استفاده شود.<br/>
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| − | ۶. از فضای تنگ که موجب فشرده شدن جمعیت میشود، استفاده نشود.<br/>
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| − | ==== فیلم برداری و عکاسی ====
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| − | معمولاً در مراسمی که در رستورآنهاو تالارها برگزار میشود خصوصاً جشنها و عروسی، عکس یا فیلم برداری میکنند، هر چند این کار اگر همراه با [[گناه]] نباشد اشکال ندارد ولی در این میان حضور زنان نامحرم و سوءاستفادههای احتمالی از عکس و فیلمها، منکرات و گناهانی را در پی دارد. مسؤولان غذاخوریها وظیفه دارند که [[امر به معروف]] و نهی از منکر کنند و زمینه چنین اموری را فراهم ننمایند.<br/>
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| − | مسئله ۱: عکس گرفتن و فیلم برداری مرد از زنان نامحرمِ بی [[حجاب]] یا بد حجاب، حرام است، گرچه در عروسی باشد<ref>. همان، م 2433.</ref>.<br/>
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| − | مسئله ۲: نگاه کردن و گرفتن فیلم و عکس از دستها و صورت زنان نامحرم که آرایش شده، حتی اگر با [[حجاب]] باشند، حرام است<ref>. همان، م 2433 و 2439.<br/>
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| − | </ref>.<br/>
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| − | مسئله ۳: در فیلم گرفتن و عکس انداختن، نگاه کردن به بدن و موی زن نامحرم، گرچه بدون قصد لذت باشد، حرام است<ref>. همان، م 2433.</ref>.<br/>
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| − | مسئله ۴: نگاه به عکس و فیلم نامحرم بدون لذت و در صورتی که نامحرم را نشناسد و ترس [[گناه]] و فساد نباشد مانعی ندارد، اما در پخش مستقیم نگاه به بدن و موی زن نامحرم حرام است گرچه بدون قصد لذت باشد<ref>. توضیح المسائل امام و حواشی مراجع معظم، م 2439.</ref> .<br/>
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| − | مسئله ۵:فرقی بین زن و مرد فیلم بردار یا عکس بردار نیست و حتی نگاه به نامحرم در فیلمهای ورزشی برای خانمها با تلذذ و ریبه جایز نیست<ref>. احکام دختران، محمد وحیدی، ص 193.</ref> .<br/>
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| − | از آن جا که غالب مردم علاقهمند به تهیه عکس یا فیلم از مراسمهای خود هستند، بهتر است از قبل یکی از محرمها را برای چنین کاری آماده کنند.<br/>
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| − | === بخش دوم: محتوای مجالس ===
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| − | ==== رقص ====
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| − | متاسفانه در برخی از مجالس عروسی و جشنها که در هتلها، غذاخوریها و یا هر مرکز پذیرایی میهمانان برگزار میشود، حدود آلهٔ رعایت نمیشود. این مجالس به صحنههای غیر شرعی، همانند رقص پایکوبی و نوازندگی تبدیل میشود. در این باب باید بدانیم که:<br/>
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| − | ـ در اختیار گذاشتن سالن یا هر مکان دیگر برای انجام امور غیر شرعی، مانند رقص، پایکوبی و نوازندگی [[گناه]] و عملی حرام است. بنابراین صاحبان اماکن باید از چنین عملی پرهیز کنند. زیرا استفادهای که مال را برای آن اجاره میدهند شرایطی دارد، از جمله اینکه استفاده حلال باشد<ref>. توضیح المسائل امام، م 2178.</ref><br />
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| − | ـ چنان که بدون هماهنگی و اطلاع، چنین برنامهای اجرا شد، وظیفه صاحبان اماکن، [[امر به معروف]] و نهی از منکر و در صورت بی تاثیر بودن، تعطیلی آن جلسه یا اطلاع دادن به نیروهای مسؤول منکرات است.<br/>
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| − | ـ دعوت از رقاص و مطرب و امثال آن برای رقص و آواز و موسیقی، حرام است<ref>. همان، م 2187 و استفتائات امام، ج 2، ص 63.</ref>.<br/>
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| − | ـ پول دادن و پول گرفتن برای رقصیدن یا کارهای حرام دیگر، حرام است<ref>. توضیح المسائل امام، م 2187. </ref>.<br/>
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| − | در مورد رقص نیز لازم است که دانسته شود:<br/>
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| − | رقص زن برای مرد نامحرم یا رقص مرد در مقابل زنان نامحرم، حرام است<ref>. استفتائات رهبر معظم انقلاب ج 2، س 82.</ref>.<br/>
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| − | ـ در صورتی که برای کودکان رقص مفسده نداشته باشد، اشکال ندارد<ref>. بنابر فتوای برخی از مراجع معظم، رقص زن برای زنان و مرد برای مردان، اگر همراه کار حرام و سبب تحریک شهوت و مفسده نباشد، اشکال ندارد، احکام دختران، محمد وحیدی، ص 301.</ref>.<br/>
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| − | رقص زن برای همسرش و مرد برای زنش در صورتی که کار حرام دیگری ؛ مثلاً نوازندگی حرام، همراه آن نباشد، اشکال ندارد<ref>. استفتائات امام، ج 2، س 35، رقص زن برای زنان و مرد برای مردان، اگر همراه با کار حرام و سبب تحریک شهوت و مفسده دیگری نباشد به فتوای برخی از مراجع معظم تقلید اشکال ندارد.</ref>.<br/>
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| − | ==== غنا و موسیقی ====
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| − | مسئله ۱. غنا، یعنی کشیدن، به گلو انداختن و بالا و پایین کردن صدا، به گونهای که انسان را از حالت طبیعی خارج کند و مناسب مجالس [[لهو]] و خوش گذرانی با آلات [[لهو]] و موسیقی باشد<ref>. تحریر الوسیله، ج 1، ص 457، م 13.</ref>.<br/>
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| − | مسئله ۲. آواز خوانی و خوانندگی زن یا مرد که غنا باشد، یا زمینه [[گناه]] و سبب فساد و مهیج شهوت باشد، حرام است<ref>. استفتائات امام، ج 2، س 34.</ref>.<br/>
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| − | مسئله ۳. آواز خواندن زن برای زنان حتی اگر به حد غنا برسد، بعید نیست که در مجالس عروسی جایز باشد، اگر چه احتیاط مستحب آن است که ترک شود، البته باید همراه با چیزهای حرام دیگر مانند شنیدن نامحرم و استعمال آلات [[لهو]] باشد<ref>. تحریر الوسیله، ج 1، ص 457، م 3.</ref>.<br/>
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| − | سؤال: اگر خود میهمانها بگویند ما مقداری پول بیشتر میدهیم به شرط این که آوازخوان مرد یا زن بیاوریم که آواز حرام بخواند، صاحب غذاخوری چه وظیفهای دارد؟<br/>
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| − | جواب: کسب از راه عمل حرام، حرام است<ref>. تحریر الوسیله، ج 1، ص 457، م 13.</ref>.<br/>
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| − | مسئله ۱. موسیقی مطرب، یعنی آنچه انسان را به شادی و هیجان میآورد، و از حالت طبیعی خارج میکند و مناسب مجالس [[لهو]] و [[لعب]] است، حرام است.<br/>
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| − | مسئله ۲. گوش دادن و نواختن ترانه و موسیقی مطرب حرام است<ref>. استفتائات امام، ج 2، س 25.</ref>.<br/>
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| − | مسئله ۳. نشستن و شرکت در مجلس [[گناه]] حرام است<ref>. استفتائات آیت الله مکارم، ج 1، ص 149، س 537.</ref>.<br/>
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| − | مسئله ۴. صاحبان غذاخوریها و دیگران، در مقابل پخش نوار ترانه و اجرای موسیقی مطرب، وظیفه دارند که [[امر به معروف]] و نهی از منکر کنند و در صورت عدم توجه باید خود از محل خارج و به کسانی که وظیفه جلوگیری دارند، اطلاع دهند<ref>. استفتائات رهبر معظم انقلاب، ج 1، س 1089 و 1088.</ref>.<br/>
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| − | ==== شعبده بازی ====
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| − | شعبده آن است که به واسطه حرکات سریع و تند، غیر واقع را واقع نشان دهد و این عمل حرام است، ولی هر تردستیی شعبده نیست<ref>. تحریر الوسیله، ج 1، م 16.</ref>.<br/>
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| − | گاه در برخی مجالس از شعبده بازان برای اجرای برنامههایی که مردم را سرگرم کند، استفاده میشود که در اختیار گذاشتن مکان برای این اعمال نیز حرام است<ref>. توضیح المسائل امام، م 2187.</ref>.<br/>
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| − | سؤال: دانش شعبده و تردستی را فرا گرفتن یا دیدن آن چه صورت دارد؟<br/>
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| − | جواب: تعلیم و تعلم شعبده و انجام دادن آن حرام است<ref>. استفتائات امام، ج 2، ص 22، س 56.</ref>.<br/>
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| − | ==== شادیهای حرام ====
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| − | برخی از مراسم جشن یا عروسی، برای شاد کردن میهمانان از فرد یا افرادی دعوت به عمل میآید که با خواندن شعر یا گفتن لطیفه و... مجلس را شاد کنند، مروری بر آداب اسلامی و روش معصومان علیهالسلام نشان میدهد که شادی و شاد کردن مؤمنان موضوعی بسیار با اهمیت است، اما به این شرط که در مدار ارزشهای آلهٔ قرار بگیرد.<br/>
| |
| − | پیامبر اکرم صلی الله علیه و آله میفرماید: اِنّی لَامزَحُ وَ لا اَقُولُ اِلّا الٌحَقّ؛<ref>. مجمع البحرین، ماده مزح.</ref> من شوخی میکنم، ولی غیر حق چیزی نمیگویم.<br/>
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| − | طریحی مینویسد: «لَقَدْ کانَ رَسَولُ اللّه یداعِبُ الرّجُلَ یرُیدُ اَنْ یسُرَّهُ»؛<ref>. وسائل الشیعه، ج 12، ص 113. باب 80.</ref> رسول خدا صلی الله علیه و آله با مردان شوخی میکرد، به این قصد که آنها را شاد کند. <br/>
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| − | خلاصه در ارزش شاد کردن مؤمن همین بس که پیامبر صلی الله علیه و آله فرمود: «مَنْ سَرَّ مُؤمناً فَقَدْ سَرَّنی وَ مَنْ سَرَّنی فَقَدْ سَرّ اللَّه»؛<ref>. بحارالانوار، ج 71، ص 287.</ref> هر کسی مؤمنی را شاد کند، مرا شاد کرده و هر کس مرا شاد کند خدا را شاد کرده است.<br/>
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| − | شخصی نزد امام موسی بن جعفر علیهالسلام آمد و پرسید: فدایت شوم! گاه در میان گروهی هستیم که میگویند و میخندند چه کنم؟ فرمود: اشکالی ندارد به شرطی که ناسزا نباشد<ref>. کافی، ج 2، ص 668.</ref>.<br/>
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| − | === سخنی با هنرمندان ===
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| − | امام باقر علیهالسلام فرموده است: خداوند به حضرت موسی علیهالسلام فرمود من بندگانی دارم که بهشت خود را بر آنها مباح کردهام و آنان را حاکم بر بهشت قرار دادهام. <br/>
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| − | حضرت موسی پرسید: آنها چه کسانی هستند؟ خداوند فرمود: کسانیاند که مؤمنی را شاد کنند.<ref>. بحار الانوار، ج 13، ص 356.</ref> <br/>
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| − | این توصیهها پیرامون شاد کردن مؤمنان گواه این مطلب است که هنرمندانی که وظیفه شاد کردن مخاطبان مؤمن را به عهده دارند، به نوعی مورد لطف و عنایت خداوند متعال هستند، به این شرط که کاری ارزشی انجام دهند. پس بهتر است برای حفظ کردن ارزش کار خود به آنچه در شرع مقدس برای آنها معین شده توجه و به تکالیف شرعی خود عمل کنند. برخی از این بایستهها چنین است:<br/>
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| − | ۱ـ از هر کاری که زمینه [[گناه]] و فساد را آماده میکند، یا سبب بروز مسائل شهوانی میشود، خودداری کنند. <br/>
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| − | ۲ـ از شعرها، شوخیها و لطیفههای نامناسب وخلاف شؤون اسلامی پرهیز کنند.<br/>
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| − | ۳ـ از اجرای نمایشها و برنامههای خلاف شرع برحذر باشند.<br/>
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| − | ۴ـ زمینه ساز لذت [[گناه]] آلود برای دیگران و عذاب اخروی برای خود نباشد.<br/>
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| − | ۵ـ برای خنداندن مردم غیبت نکنند، تهمت نزنند، دروغ نگویند و... در یک کلام خدا را به غضب نیاورند.<br/>
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| − | ۶ـ هرگز دیگران را مسخره نکنند.<br/>
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| − | ۷ـ برنامهها را با دقت در نوع مخاطبان خود اجرا کنند؛ اگر در مجلس دختران حضور دارند، روحیه شرم و حیای آن را پاس دارند و باعث تهیج شهوت نشوند. اگر مخاطبان جوان هستند، مطالب مربوط به متأهلها را طرح نکنند و ... . <br/>
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| − | خلاصه این که یک هنرمند میتواند ارزشها را حفظ کند و مردم را بخنداند و در این صورت کار او ارزشی و عبادت خواهد بود و این سخن رسول اکرم صلی الله علیه و آله دربارهٔ آنها صدق خواهد کرد که: بهترین عمل بعد از نماز، شاد کردن دل مؤمن است، البته به وسیله چیزهایی که [[گناه]] نباشد<ref>. همان، ج 44، ص 194، اَفْضَلُ الْاعْمالِ بَعْدَ الصّلاهِ اِدْخالُ السُّرورِ فی قَلْبِ المُومِنْ بِما لا اِثْمَ فِیه.</ref>.<br/>
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| − | == فصل سوم: آداب میهمانی و میهمان داری ==
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| − | مشتریان اماکن پذیرایی، تنها برای ساعاتی یا چند روزی میهمان صاحبان اماکن هستند. در این مدت کوتاه، میزبان و میهمان وظایف و تعهداتی در قبال هم دارند. هر دو طرف این تعامل اجتماعی، میتوانند به رفتار خود رنگ و بوی دینی بدهند؛ به این صورت که مهماندار میتواند به حرفه خود به عنوان رفتاری دینی (میزبانی مؤمنان) بنگرد، که مورد سفارش بزرگان دین است. این قصد و نیت مانع از آن نخواهد شد که او در مقابل خدمتی که ارائه میکند وجهی دریافت کند.<br/>
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| − | === وظایف میهمان دار ===
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| − | ==== نسبت به مشتری ====
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| − | حفظ حرمت مشتری؛ لازم است که میهمان دار در نهایت ادب و احترام با میهمان خود رفتار کند و از اعمال و گفتاری که سبب تحقیر و خدشه دارد شدن شخصیت او شود پرهیز کند. رسول خدا صلی الله علیه و آله میفرماید: «مَنْ کانَ یؤمِنُ بِاللّه وَ الْیومِ الاخِر فَلْیکِرم ضَیفَه»؛<ref>. بحار الانوار، ج 43، ص 61، ح 52. </ref> هر کس به خدا و آخرت [[ایمان]] دارد میهمانش را احترام کند.<br/>
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| − | کنار آمدن با مشتری؛ <br/>
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| − | همدردی و همراهی بامشتریان عزادار؛ در صورتی که مشتری به مناسبت مصیبتی قرار است در رستوران از گروهی پذیرایی کند، شایسته است تمام اعضای اماکن پذیرایی و نیز فضای مکانها با صاحبان عزا هماهنگ باشند. خداوند میفرماید: کسی که بنده مؤمن مرا بیازارد به من اعلان جنگ کرده و آن کس که بنده مؤمن مرا گرامی بدارد، از غضب من در امان است<ref>. قال الله عزّوجل لَیاذَنْ بِحْربٍ منّی مَن اذی عبدیَ المومنَ وَ لْیامَن غَضَبی مَن اَکْرَمَ عَبدیَ المُومِن...، اصول کافی، ج 4، ص 51.</ref>.<br/>
| |
| − | خدمت بیشتر به زائران اماکن مقدسه؛<br/>
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| − | شایسته است که صاحبان این گونه اماکن توجه بیشتری به مسافران و زائران حرام ائمه اطهار و امام زادگان داشته باشند. در این صورت هم احترام و حرمت ائمه علیهم االسلام حفظ شده، هم بهرهای از ثواب زیارت آنان نصیبشان گردیده است.<br/>
| |
| − | عمل به وعدهها؛ <br/>
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| − | اگر صاحبان غذاخوریها برای میهمانی یا مراسمی در سالن یا خارج آن وعده دادهاند، وظیفه دارند به قرار خود عمل کنند و غذا را سر ساعت آماده سازند. در قرآن کریم، خداوند میفرماید: <br/>
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| − | «اوفوا بالعهد ان العهد کان مسئولا»؛به عهد و پیمان وفا کنید که از عهد سؤال میشود<ref>. اسرا/34.</ref>.<br/>
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| − | امام علی علیهالسلام نیز میفرماید: هیچ یک از واجبات آلهٔ همانند وفای به عهد نیست که همه مردم جهان، با تمام اختلافاتی که در افکار و تمایلات دارند، در آن اتفاق نظر داشته باشند...<ref>. قال علی ع: لیس من فرائض الله شی الناس اشد علیه اجتماعاً مع تفرق اهوائهم و تشتت آرائهم من تعظیم الوفاء بالعهود... (نهج البلاغه، نامه 53، ترجمه محمد دشتی.)</ref> .<br/>
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| − | رفتار اسلامی با خارجیها؛<br/>
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| − | گسترش ارتباطات و علاقهمندی انسانها به شناخت بیشتر فرهنگهای ملل و مذاهب دیگر، موجب رشد سریع صنعت جهانگردی شده است. صاحبان اماکن پذیرایی و اقامتی در برابر این پدیده و مشتریان وظایفی بر عهده دارند که برخی از آنها عبارتند از:<br/>
| |
| − | ۱ـ رعایت اخلاق و رفتار اسلامی<br/>
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| − | ۲ـ پاسخ ندادن به خواستههای نامشروع مشتریان، از قبیل تقاضای تهیه غذای حرام، شراب و... .<br/>
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| − | ۳ـ پرهیز از اجحاف و تقلب در سرویس دهی به مشتریان، مخصوصاً مشتریان خارجی.<br/>
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| − | سؤال: دستگاههایی هستند اتوماتیک که با انداختن پول در آنها، در آنها باز میشود و شخص میتواند به مقدار نامعین از داخل آنها روزنامه بردارد، آیا جهت ضرر زدن به کفار اجازه میدهید در مقابل پول یک روزنامه، مقدار زیادتری از روزنامهها برداشته شود؟<br/>
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| − | جواب: اجازه نیست<ref>. استفتائات امام، ج 2، ص 39، س 109.</ref>.<br/>
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| − | سفارش امیر مؤمنان علی علیهالسلام: مهربانی بامردم را پوشش دل خویش قرار بده و با همه دوست و مهربان باش، مبادا چون حیوان درنده باشی که خوردن آنان را غنیمت دانی، زیرا مردم دو دستهاند؛ دستهای برادر دینی تو و دسته دیگر همانند تو در آفرینش میباشند<ref>. قال علی ع: وَ اَشْعر قَلبکَ الرّحمه للرعّیه لَهُم و المَحَبّه لَهُم و اللُطفَ بِهم و لا تَکُونَنَّ عَلیهمْ سَبُعاً ضاریاً تَغْتِنمُ فَاِنَّهُم صنفانِ اِما اخٌ لکَ فی الدینِ اَوْ نظیرٌ لکَ فی الخَلق. (نهج البلاغه فیض، نامه 53، ص 993.)</ref> .<br/>
| |
| − | تلاش برای کسب رضایت میهمانان؛<br/>
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| − | سؤال: اینجانب چندین سال است کارمند دولت هستم. چندین بار کار را صحیح و کامل انجام ندادهام ولی پولش را دریافت کردهام، وظیفه من چیست؟<br/>
| |
| − | جواب: اگر کار را انجام ندادهاید، پولی که در مقابل آن گرفتهاید را به همان محلی که گرفتهاید برگردانید<ref>. استفتائات امام خمینی، ج 2، س 140.</ref>.<br/>
| |
| − | رسول اکرم صلی الله علیه و آله دربارهٔ کامل انجام دادن اعمال فرموده است؛ وقتی یکی از شما کاری انجام میدهد، محکم و خوب انجام دهد<ref>. اِذَا عَمِلَ اَحَدَکُم عملاً فَلْیتْقِنْ، کافی ج 3، ص 262 قال الصادق: ...و لکن اللّه یحبُّ عبداً اذا عملَ عَملاً اَحْکَمَه. (وسایل الشیعه، ج 2،ص 884)</ref>.<br/>
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| − | خیانت نکردن؛<br/>
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| − | خداوند میفرماید: «اِن اللّه لا یحِبُّ مَن کانَ خَوّاناً اثیماً»<ref>. نساء/107.</ref>؛ خداوند خیانتکار گناهکار را دوست ندارد... «وَ مَن یغْلُلْ یاتِ بِما غَلّ یوْمَ القیمه»<ref>. آل عمران/161.</ref>؛ هر کس خیانت کند، روز قیامت آنچه را که خیانت کرده میآورد.<br/>
| |
| − | ==== نسبت به امکانات و مکان ====
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| − | علاوه بر وظایفی که کارفرمایان اماکن پذیرایی نسبت به شخص مشتری به عهده دارند، وظایفی نیز در قبال امکانات اماکن بر عهده دارند، که عبارتند از:<br/>
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| − | آرامش و آسایش محل؛ <br/>
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| − | شایسته است محلی که برای مهمانان در نظر گرفته میشود اسباب آرامش آنان را فراهم سازد و از صداهای گوش خراش، رفت و آمدهای زیاد، تنگی محل غذاخوری و... پیراسته شود. همچنین از فضای موجود میتوان برای پیامهای مذهبی در قالب پوستر، نقاشی، خطاطی و... استفاده کرد<ref>. قال النبی: لئن یهدی الله علی یدیک رجلا خیر لک مما طلعت علیه الشمس و غربت؛ اگر به دست تو یک نفر هدایت شود برای تو بهتر است از آنچه خورشید بر آن میتابد و غروب میکند. بحار، ج 21، ص 361</ref>.<br/>
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| − | نظافت؛ <br/>
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| − | موضوع تمیزی و نظافت مورد تاکید اسلاماست. رسول خدا صلی الله علیه و آله میفرماید:<br/>
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| − | ان اللّه طیبُ یحِبُّ الطیب، نظیفٌ یحبُّ النظافه؛<ref>. میزان الحکمه ج 10، ص 92، ح 20014.</ref> خداوند پاک و پاکیزه است و پاکی و پاکیزگی را دوست دارد. <br/>
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| − | باز فرموده است: اِن الاسلامِ نَظیفٌ فَتنظّفُوا فَانّهُ لا یدخُل الجّنه اِلّا نظیف؛<ref>. کنز العمال، ص 278، ج 9، ح 26007.</ref> اسلام پاکیزه است شما نیز پاکیزه باشید، زیرا داخل بهشت نمیشود مگر فرد پاکیزه. بنابراین لازم است: محل غذاخوری <ref>. قال علی ع: نظفوا بیوتکم من حوک العنکوبت، خانههای خود را از تارعنکبوت پاکیزه کنید،(وسایل الشیعه، ج 3، ص 575)</ref>، ظروف<ref>. قال الصادق ع: [[غسل]] الاناء... مُجْلَبهُ للرّزق، شستن ظرف سبب جلب رزق و روزی است، (وسایل الشیعه، ج 3، ص 571)</ref> و کارکنان نظیف باشند. امکانات خدماتی جنبی؛ به دلیل مسافر بودن برخی مشتریها، وجود تأسیساتی که بتواند نیازهای آنها را فراهم کند، ضروری است، از جمله سرویس بهداشتی و نمازخانه.<br/>
| |
| − | شایسته است که:<br/>
| |
| − | ـ [[نماز]] خانه وسیع، تمیز و زیبا باشد؛<br/>
| |
| − | ـ محل [[نماز]] خانمها و آقایان جدا و دارای پوشش مناسب باشد؛<br/>
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| − | ـ مهر، تسبیح، پارچهها و زیرانداز تمیز و به اندازه کافی و امکانات مناسب و در شأن نمازگزاران تهیه شود؛<br/>
| |
| − | ـ حتی الامکان در محل [[نماز]] آن نسخهای از قرآن و مفاتیح و توضیح المسائل وجود داشته باشد.<br/>
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| − | ـ جهت قبله با علامتی ساده مشخص شود و در سمت قبله تصاویری که موجب حواس پرتی نمازگزار میشود نصب نشود؛<br/>
| |
| − | ـ دارای دستگاههای گرمازا و خنککننده باشد. <br/>
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| − | غصبی نبودن محل؛<br/>
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| − | علاوه بر آن چه گفتیم، میهمان دار وظیفه دارد، مکانی را برای پذیرایی در اختیار مشتری بگذارد که استفاده از آن حلال باشد؛<br/>
| |
| − | بنابراین :<br/>
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| − | ۱ـ مکان پذیرایی و اقامت، نباید بدون رضای مالک شرعی، مورد استفاده قرار گیرد<ref>. توضیح المسائل امام، م 2187.</ref>.<br/>
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| − | ۲ـ اگر وقفی است، به صورت غیرشرعی واگذار نشده باشد و بر خلاف قانون حکومت اسلامی مورد استفاده قرار نگیرد<ref>. استفتائات امام، ج 2، س 136.</ref>.<br/>
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| − | ۳ـ از نظر امکانات، مانند برق، گاز و تلفن، مشکل شرعی نداشته و برخلاف قانون حکومت اسلامی نباشد<ref>. همان، س 135.</ref>.<br/>
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| − | ۴ـ آنچه را مشکل شرعی یا قانونی دارد در اختیار مشتری قرار ندهد<ref>. همان، س 135.</ref>.<br/>
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| − | هر چند اگر مشتری اطلاعی از این موضوع نداشته باشد تکلیفی ندارد.<br/>
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| − | === مناسبتها ===
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| − | در طول سال، روزهایی وجود دارد که به دلیل قرار گرفتن مناسبت خاصی، دارای موقعیتی ویژه است و حفظ حرمت و احترام آن بر همه لازم است، مانند ایام شهادت ائمه علیهماالسلامبه خصوص ماه محرم و ایام ماه مبارک رمضان. در این جا به برخی احکام ماه رمضان اشاره میشود که تالارها وظیفه دارند آنها را رعایت کنند:<br/>
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| − | ۱ـ از هر گونه عملی که تظاهر به روزهخواری به شمار آید، پرهیز و جلوگیری کنند. <br/>
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| − | ۲ـ فروش غذا برای مسافران و کسانی که عذر دارند، باید به دور از انظار عمومی باشد. <br/>
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| − | ۳ـ از فروش غذا به کسانی که میدانند بدون عذرروزهخواری میکنند، خودداری کنند.<br/>
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| − | مسئله. اگر کسی به طور علنی [[روزه]] خواری کند به حکم قاضی شرع ۲۵ ضربه شلاق میخورد<ref>. عروه الوثقی، ج 2، اول بحث روزه. در چنین مواردی وظیفه اصلی بر دوش مأموران حکومت است و مشتری فقط حق تذکر زبانی و یا اعلام به مراجع مربوط را دارد.</ref>.<br/>
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| − | سؤال: اگر چلوکبابی و امثال آن در داخل شهر و در روزهای ماه مبارک رمضان فعالیت کند و مخفیانه از مراجعان پذیرایی کند یا برای آنها غذا بفرستد، کار او چه حکمی دارد و وظیفه کسی که آن جا کار میکند، چیست؟<br/>
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| − | جواب: کار او خلاف است و کسی که میداند باید او را [[امر به معروف]] و نهی از منکر کند، اگر ثر نکرد به نیروهایی که وظیفه مقابله با منکرات را دارند، خبر دهد<ref>. استفتائات آیت الله خامنهای، ج 1 ترجمه شده،س 1088.</ref>.<br/>
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| − | سؤال: شاطر نانوایی، به خاطر گرمای بیش از حد تنور، روزهاش را میخورد و میگوید با این گرمای هوا و گرمای تنور نمیتوانم [[روزه]] بگیرم و شاید در زمستان قضای [[روزه]] را بگیرد، آیا او مجاز است این کار را بکند؟ و هر فردی که این قبیل شغلها را دارد میتواند در این فصل [[روزه]] نگیرد؟<br/>
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| − | جواب: عذرهای ذکر شده سبب جواز افطار نیست.<ref>. استفتائات امام، ج 2، ص 320، س 49. </ref>
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| − | همان گونه که صاحبان اماکن در مقابل احکام شرع مسئولیت دارند، همان طور موظفاند که قوانین و مقررات جمهوری اسلامی را مراعات نمایند. <br/>
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| − | استفتاء: هر گونه عملی که برخلاف مقررات دولت اسلامی یا موجب فساد در جامعه باشد، جایز نیست<ref>. همان، ج 2، س 147، کسبهای حرام.</ref>.<br/>
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| − | === وظایف میهمان ===
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| − | طبیعی است در برابر تعهداتی که میزبان و صاحب مکان پذیرایی بر عهده دارد، میهمان و مشتری هم تعهدات و آدابی را باید بپذیرد و به انجام آن همت گمارد. برخی از این امور عبارتند از:<br/>
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| − | ۱ـ میهمان وظیفه دارد از اموال مکان پذیرایی مواظبت کند.<br/>
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| − | سؤال: اگر ظرفی که مربوط به اماکن پذیرایی است از دست ما یا بچه ما بیفتد و بشکند یا خسارتی به امکانات سالن وارد شود چه وظیفهای داریم؟<br/>
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| − | جواب: اگر در نگهداری آن کوتاهی یا درنحوه استفاده از آن زیادهروی کرده باشد، جبران خسرات لازم است، گر چه عمدی نباشد، مگر این که صاحب مال ببخشد یا حلال کند<ref>. تحریر الوسیله امام، ج 2، کتاب غصب، مسئله 3.</ref>.<br/>
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| − | سؤال: اگر در گذشته یا دوران کودکی مالی از مردم را از بین بردهایم یا دزدی کردهایم، یا در رستوران غذا خوردهایم ولی وجه آن را نپرداختهایم یا لوازم رستوران را شکستهایم یا در حساب کردن قیمت اشتباه کردهایم و... چه باید بکنیم؟<br/>
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| − | جواب: این مسئله چند صورت دارد:<br/>
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| − | الف ـ اگر صاحبش را میشناسیم یا میتوانیم با تحقیق بشناسیم و مقدار بدهکاری را هم میدانیم، باید قیمت چیزی را که تلف کردهایم، به قیمت روز به او بدهیم و اگر خود جنس موجود بود آن را برگردانیم. <br/>
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| − | در مورد این فرض دو نکته قابل توجه است:<br/>
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| − | اول این که، لازم نیست خود ما بدهکاری را بدهیم، بلکه میتوانیم به کسی که مورد اطمینان است بسپاریم، تا او بدهد و بگوید کسی بدهکار بود، داد. <br/>
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| − | دوم این که، لازم نیست بگوییم، این پول از چه بابت است، فقط کافی است آن را به صاحبش برسانیم.<br/>
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| − | سوم آن که، اگر بعد از تحقیق معلوم شد صاحب آن مرده است، باید به ورثهاش تحویل دهیم و طبق قانون ارث آن را بین ورثه تقسیم کنیم و سپردن به یک نفر کافی نیست، مگر آن که مطمئن باشیم خودشان به طور صحیح تقسیم میکنند.<br/>
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| − | ب ـ اگر بعد از تحقیق صاحبش را نشناختیم، ولی مقدار بدهکاری را میدانیم، باید بهای آن را به قیمت روز از طرف صاحبش به فقیر شرعی <ref>. فقیر شرعی یعنی کسی که درآمدش برای مخارج معمولی زندگی او کفایت نمیکند و کم میآورد. توضیح المسائل امام خمینی (ره، م 1992 و 1925)</ref> غیر سید، که فقیر بودن او را میدانیم، با اجازه مجتهد، صدقه دهیم. <br/>
| |
| − | ج ـ اگر مالک را میشناسیم، ولی مقدار بدهکاری را نمیدانیم، باید یکدیگر راضی کنیم و اگر راضی نشد، مقداری را که یقین داریم مال اوست و حتماً کمتر از آن نبوه، به او بدهیم، هر چند احتیاط این است که مقدار بیشتری را که احتمال میدهیم مال اوست، به او بپردازیم.<br/>
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| − | د ـ مالک را نمیشناسیم، مقدار حرام و بدهکاری هم معلوم نیست. در این صورت باید از طرف صاحبش مقدار یقینی را به فقیر شرعی غیر سید، با اجازه مجتهد، صدقه دهیم<ref>. توضیح المسائل امام ره، م 1815 و 1814.</ref>.<br/>
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| − | ۲ـ همان طور که مشتری انتظار دارد با مکان نظیف و میزبان مؤدب روبرو شود، خودش نیز وظیفه دارد احترام میزبان و کارکنان را نگه دارد و نظافت اماکنی را که در اختیار اوست مراعات نماید<ref>. قال رسول الله ص: النظافه من الایمان؛ پاکیزگی از [[ایمان]] است. (بحار، ج59، ص 291)</ref>.<br/>
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| − | ۳ـ میهمان باید فقط از وسایل و امکاناتی که برای او تهیه شده استفاده کند، در غیر این صورت چنین کاری در حکم غصب و حرام است.<br/>
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| − | سؤال: آیا میشود از امکانات تالار، از قبیل تلفن، سرویس دستشویی، همراه بردن غذا و استفاده از میز و صندلی و فضا و... بدون اجازه مسئولان اماکن، استفاده کرد؟<br/>
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| − | جواب: بدون اجازه جایز نیست، مگر این که عمومی باشد و مالک جلوگیری نکند، یعنی اطمینان به رضایت حاصل شود<ref>. تحریر الوسیله امام، ج 2، کتاب غصب، مسئله 3. </ref>.<br/>
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| − | ۴ـ میهمان وظیفه دارد مثل میزبان از کارهایی که سبب معصیت میشود، از قبیل برپایی مجلس گناه، استفاده از غذای حرام و... پرهیز و در صورت مشاهده گناه، امربه معروف و نهی از منکر کند. <br/>
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| − | ۵ـ مناسب است تا حد امکان طبق آداب اسلامی بخورد و بیاشامد. شایسته است مدیران رستورانها آداب مذکور را از رسآلههای عملیه استخراج و با خط زیبا در سالنهای غذاخوری نصب کنند<ref>. ر.ک: توضیح المسائل امام، م 2636 تا 2639. </ref>.<br/>
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| − | === اشیای به جا مانده ===
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| − | رفت و آمدها و نشست و برخاستهایی که در میهمانیها صورت میگیرد و حال و هوایی که مراسم میهمانی دارد، گاهی سبب میشود، که وسایل میهمانها و مشتریان جا بماند و یا به دلیل عجله مسافر و... وسیله یا وسایلی مربوط به اماکن پذیرایی را اشتباهی با خود ببرد.<br/>
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| − | سؤال: اگر یکی از میهمانداران چیزی را که از مسافران به جای مانده بردارد، چه حکمی دارد؟<br/>
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| − | جواب: باید صاحب آن را جستجو کند و با دادن نشانی صحیح، به او بدهد و بعد از جستجو یا ناامیدی از پیدا شدن صاحب آن، از طرف صاحبش آن را به فقیر غیرسید، با اجازه مجتهد، صدقه دهد<ref>. استفتائات امام ره، ج 2، س 15.</ref>.<br/>
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| − | سؤال: اگر انسان چیزی را پیدا کند چه حکمی دارد؟<br/>
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| − | جواب:الف ـ اگر نشانهای ندارد که بتوان به واسطه آن صاحبش را پیدا کرد، احتیاط واجب آن است که از طرف صاحبش صدقه دهد<ref>. صدقه را احتیاطاً باید به فقیر غیرسید و با اجازه مجتهد بدهد. مستفاد از حاشیه بعضی مراجع تقلید بر عروه الوثقی</ref>.<br/>
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| − | ب ـ اگر نشانه دارد، هر چند قیمت آن از یک درهم <ref>. یک درهم برابر با 6/12 نخود نقره مسکوک میباشد و اکنون اردیبهشت سال 1381 حدود سیصد تومان ارزش دارد. </ref> کمتر ولی صاحبش معلوم باشد، باید به او بدهد.<br/>
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| − | ج ـ اگر با تمام شرایط فوق فقط صاحبش معلوم نباشد، میتواند برای خود بردارد و اگر تلف شد نباید عوض آن را بدهد. <br/>
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| − | د ـ اگر نشانه دارد و قیمت آن به یک درهم میرسد باید تا یک سال اعلان کند. اگر صاحبش پیدا شد، به او بدهد و اگر پیدا نشد میتواند یا برای خود بردارد، به قصد اینکه هر وقت صاحبش پیدا شد عوض آن را به او بدهد،یا برای صاحبش نگاه دارد،ولی احتیاطاً و با اجازه مجتهد به فقیر غیرسید بدهد<ref>. توضیح المسائل امام، م 2564 تا 2568. در بعضی موارد اختلاف فتوایی بین مراجع معظم وجود دارد.</ref>.<br/> [[امر به معروف]] و نهی از منکر [[امر به معروف]] و نهی از منکر، اساسیترین حق متقابل مردم در جامعه اسلامی است که قرآن کریم با واژههایی چون تواصی <ref>. عصر/ 3. </ref> و تناهی <ref>. مائده/ 79.</ref> (یکدیگر را سفارش کردن و یکدیگر رابازداشتن) از آن یاد کرده است. این ویژگی که سلامت جامعه اسلامی را در پی دارد، بارزترین خصوصیت جامعه مسلمانان نیز میباشد. خداوند میفرماید:<br/>
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| − | «کُنْتُمْ خَیرَ اُمّهٍ اُخْرِجَتْ لِلنّاس تَامُرُون بِالمَعُروف وَ تَنْهَونَ عَنِ المُنکر وَ تُومِنُون بِالله»<ref>. آل عمران/ 110.</ref>.<br/>
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| − | یعنی، شما بهترین امتی بودید که برای مردم پدید آمدهاید. (چه این که) به نیکی فرمان میدهید و از منکر باز میدارید و به خدا [[ایمان]] دارید. بر اساس آنچه گفته شد، اقامه [[امر به معروف]] و نهی از منکر وظیفه همگانی است و صاحب مکان پذایریی و مشتری هر دو در قبال منکرات یا [[ترک واجبات]] از طرف مقابل وظیفه اجتماعی دارند.<br/>
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| − | مسئله ۱. [[امر به معروف]] و نهی از منکر واجب کفایی است، یعنی در صورتی که بعضی از مسلمانان بالغ و عاقل آن را انجام دهند از دیگران ساقط است و اگر برپایی معروف و جلوگیری از منکر توقف بر اجتماع جمعی از مسلمانان داشته باشد، واجب است اجتماع کنند<ref>. توضیح المسائل امام، م 2787.</ref>.<br/>
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| − | مسئله ۲. اگر بعضی امر و نهی کنند و موثر نشود و بعضی دیگر احتمال بدهند که امر یا نهی آنها موثر است، واجب است امر و نهی کنند<ref>. همان، م 2788.</ref>.<br/>
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| − | مسئله ۳. در [[امر به معروف]] و نهی از منکر بیان احکام دینی کفایت نمیکند، بلکه باید امر و نهی کند.<ref>. همان، 2789.</ref>
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| − | مسئله ۴. چند چیز در واجب بودن [[امر به معروف]] و نهیاز منکر شرط است:<br/>
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| − | اول آن که، کسی که میخواهد امر و نهی کند بداند آنچه شخص ملکف به جا نمیآورد واجب است به جا آورد، و آنچه به جا میآورد باید ترک کند.<br/>
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| − | دوم آن که، احتمال بدهد امر و نهی تأثیر میکند، پس اگر بداند اثر نمیکند واجب نیست.<br/>
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| − | سوم آن که، بداند شخص معصیت کار بنا دارد که معصیت خود را تکرار کند، پس اگر بداند یا گمان کند یا احتمال صحیح بدهد که تکرار نمیکند، واجب نیست.<br/>
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| − | چهارم آن که، در امر و نهی مفسدهای نباشد، پس اگر بداند یا گمان کند که اگر امر یا نهی کند ضرر جانی یا آبرویی یا مالی قابل توجه به او میرسد، واجب نیست، بلکه اگر احتمال ضررهای مذکور را هم بدهد، واجب نیست و بالاتر از آن اگر احتمال دهد که در اثر آن ضرر جانی یا آبرویی یا مالی و مشقت زیاد متوجه بعضی مؤمنین شود واجب نمیشود؛ بلکه در بسیاری از موارد هم حرام است. <br/>
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| − | مسئله. اگر معروف یا منکر از اموری باشد که شارعمقدس به آن اهمیت زیاد میدهد، مثل اصول دین یا مذهب و حفظ قرآن مجید و حفظ عقاید مسلمانان یا احکام ضروری، باید ملاحظه اهمیت شود و مجرد ضرر موجب واجب نبودن نمیشود. پس اگر توقف داشته باشد حفظ عقاید مسلمانان یا حفظ احکام ضروری اسلام بر دادن جان و مال، واجب است بدهد.<ref>. توضیح المسائل امام،م 2792.</ref>
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| − | مسئله. اگر احتمال صحیح داده شود که سکوت سبب میشود که منکری معروف یا معروفی منکر شود، واجب است خصوصاً بر علمای اعلام، اظهار حق و اعلام آن و جایز نیست سکوت<ref>. همان، م 2794.</ref>.<br/>
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| − | === مراتب امر به معروف و نهی از منکر ===
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| − | مسئله. اول آن که، با شخص معصیت کار طوری عمل شود که بفهمد به خاطر معصیت او این نحو با او عمل شده است، مثل این که از او رو برگرداند، یا با چهره گرفته با او ملاقات کند یا با او ترک رفت و آمد کند و از او اعراض کند<ref>. توضیح المسائل امام، م 2805.</ref>.<br/>
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| − | مسئله. مرتبه دوم از [[امر به معروف]] و نهی از منکر، امر و نهی به زبان است. پس با احتمال تأثیر و حصول سایر شرایط گذشته، واجب است اهل معصیت را نهی کند و تارک واجب را امر کند به به جا آوردن واجب<ref>. همان، م 2813.</ref>.<br/>
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| − | مسئله. اگر میداند که نصیحت تاثیر ندارد، واجب است با احتمال تأثیر، امر و نهی الزامی کند و اگر تأثیر نمیکند، مگر با شدّت در گفتار و تهدید بر مخالفت، لازم است؛ لکن باید از دروغ و معصیت دیگر دوری شود<ref>. همان، م 2815.</ref>.<br/>
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| − | مسئله. مرتبه سوم توسل به زور و جبر است، ولی با توجه به حاکمیت و اقتدار حکومت اسلامی این امر به نیروهای امنیتی داخلی و قوه قضائیه واگذار میشود و در صورت نیاز به توسل به زور موضوع را به نیروی انتظامی و قوه قضائیه اطلاع دهند<ref>. استفتائات رهبر معظم انقلاب، ج 1، س 1088.</ref>.<br/>
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| − | مسئله. اگر جلوگیری از منکرات و اقامه واجبات، موقوف باشد بر زخمی کردن و کشتن، جایز نیست مگر به اذن مجتهد جامع الشرائط با حصول شرایط آن<ref>. اگر منکر از اموری است که شارع به وقوع آن، به هیج وجه راضی نیست، مانند کشتن کسی که جایز القتل نیست، باید به هر نحو ممکن آن را دفع کرد و اگر [[دفاع]] از قتل مظلوم ممکن نشد مگر با قتل ظالم باید او را کشت، لکن باید مراعات شود که در صورت امکان جلوگیری به نحو دیگر که به قتل منجر شود، به آن عمل کند و اگر از حد لازم تجاوز کند معصیت کار و احکام متعدی بر او جاری خواهد شد. توضیح المسائل امام، م 2824 و 2825.</ref>.<br/>
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| − | == فصل چهارم: ارتباط کارفرما و کارگر ==
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| − | شایسته است کارفرما، برای حفظ ارزشهای آلهٔ در محیط کسب و کار، همواره از کارگرانی استفاده کند که آداب اسلامی را سرلوحه اعمال خویش قرار دهند. هنگام استخدام بانوان، تا حد امکان از بانوان متأهل، متدین و مؤدب به آداب اسلامی استفاده کنند. علاوه بر آنچه گفتیم کارفرما وظایف دیگری نیز در مقابل کارگران اماکن پذیرایی و اقامتی بر عهده دارد که میتوان به این موارد اشاره کرد:<br/>
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| − | === پرداخت حقوق واقعی کارگر ===
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| − | سؤال: ممکن است کارگری خودش به حقوق کم راضی شود و یا کار بدون بیمه را بپذیرد، آیا استفاده از او اشکال دارد؟<br/>
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| − | جواب: اگر واقعاً راضی است، اشکالی ندارد، و اگر به خاطر ناچاری و عدم رضایت واقعی است، محل اشکال است.<br/>
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| − | === حفظ حرمت کارگر ===
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| − | کارفرما موظف است کرامت انسانی و حرمت او را نگاه دارد. این وظیفه در فرهنگ مسلمانان چنان جایگاه رفیعی دارد که پیامبر اکرم صلی الله علیه و آله دست کارگر را بوسید.<ref>. اسد الغابه، ج2، ص 269، فقبل یده رسول الله صلی الله علیه و آله .</ref> بنابراین، کارفرما نباید کارگران خود را در هر موقعیت و رتبهای که باشند، تحقیر کند. امام علی علیهالسلام میفرماید: هیچ بندهای از بندگان خدا را کوچک نشمار، چه بسا او دوست خدا باشد و تو ندانی<ref>. «فلا تستصغرن عبداً من عبیدالله. فَرُبَّما یکونُ وَلیه وانت لا تعلم»مواعظ علاییه، ص 125.</ref>.<br/>
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| − | بر همین اساس، شایسته است کارفرما نسبت به نیازهای کارگران خود دلسوزی نشان دهد،<ref>. من اصبح و لا یهتم بامور المسلمین فلیس بمسلم؛ کسی که صبح کند و به کارهای مسلمانان همتی نداشته باشد مسلمانواقعی نیست. (بحارالانوار، ج 74، ص 337) .</ref> فرصت کافی برای انجام امور شخصی و عبادی آنان اختصاص دهد، نسبت به آنان خوش اخلاق و خوش رفتار باشد و در قبال اشتباهاتی که انجام میدهند ضمن تذکر و هدایت، با گذشت و نرمی برخورد کند، زیرا خداوند از مسلمانان میخواهد نسبت به هم گذشت داشته باشند<ref>. نور/22.</ref>.<br/>
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| − | === وظایف کارگر ===
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| − | در کنار آنچه گفتیم کارگر نیز وظیفه دارد، حقوق کارفرما را رعایت کند و... .<br/>
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| − | سؤال: آیا کارگر میتواند بدون اجازه کارفرما از امکانات تالار، مثل تلفن، تلویزیون و... استفاده کند؟<br/>
| |
| − | جواب: خیر<ref>. تحریر الوسیله، ج 2، اول کتاب غصب، ص 172.</ref>.<br/>
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| − | سؤال: اگر کارفرما دروغ میگوید کار کردن نزد او چه حکمی دارد؟<br/>
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| − | جواب: کار کردن اشکال ندارد، ولی دروغ و قسم دروغ حرام است، او را نهی از منکر نمایید<ref>. استفتائات امام، ج 1، س 11، امربه معروف و نهی از منکر.<br/>
| |
| − | </ref>.<br/>
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| − | سؤال: اگر کارگری برای غیرمسلمان کار میکند وظیفه او چیست و آیاحقوقی که میگیرد، اشکال دارد یا نه؟<br/>
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| − | جواب: مزد و حقوق اشکال ندارد<ref>. همان، ج 2، س 107، کسبهای حرام. </ref>.<br/>
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| − | سؤال: در صورتی که کارگر به خاطر کوتاهی در انجام وظیفه، موجب ضرر به کارفرما شود، چه حکمی دارد؟<br/>
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| − | جواب: ضامن و مدیون است و باید جبران کند<ref>. تحریر الوسیله، ج2، کتاب غصب م 3.</ref>.<br/>
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| − | == فصل پنجم: خمس ==
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| − | پرداخت خمس، یکی از تکالیف اقتصادی مسلمانان است، و آنان باید در برخی موارد یک پنجم مال خود را برای مصارف مشخصی به حاکم اسلامی بپردازند. منفعت کسب (آنچه از خرج سال اضافه میآید) یکی از موارد هفت گانه مشمول خمس است، که عموم کسانی که درآمد دارند، از جمله صاحبان اماکن با آن روبرو هستند<ref>. ر.ک: توضیح المسائل، م 1751 و 1752.</ref>.<br/>
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| − | منظور از خرج سال چیست؟ هر مسلمان میتواند در طول سال تمام مخارج معمولی مورد نیاز خود را از درآمدش تأمین کند و اگر در آخر سال چیزی زیاد نیامد، [[پرداخت خمس]] واجب نیست و اگر بعد از مصارف متعارف، در آخر سال چیزی زیاد آمد باید ۵۱ آن را برای مصارف مشخصی بپردازد.<br/>
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| − | === سال خمسی ===
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| − | انسان از اولین روز بلوغ خود باید [[نماز]] بخواند و در اولین ماه رمضان سال بلوغ [[روزه]] بگیرد و پس از گذشت یک سال از اولین درآمد، مازاد درآمدی که برایش مانده، مبلغ معینی را بدهد. پس در محاسبه سال خمسی، ابتدای سال، اولین درآمد و پایان آن گذشتن یک سال شمسی یا قمری است<ref>. رجوع کنید، توضیح السمائل، م 1765 و 1794.</ref>.<br/>
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| − | === آنچه خمس ندارد عبارت است از ===
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| − | ۱ـ رستوران و امکانات آن؛ از قبیل یخچال و فریزر و ظروف آشپزخانه و میز و صندلی و سایر چیزهایی که سرمایه کسب محسوب میشود، در صورتی که از درآمد تهیه شده باشد، [[پرداخت خمس]] آن واجب است. چنانچه فعلاً نتواند خمس آن را بپردازد، میتواند با مراجعه و دستگران و اجازه و مهلت گرفتن، در وقت توان بپردازد<ref>. تحریر الوسیله، ج 1، ص 327، م 13.</ref>.<br/>
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| − | ۲ـ مالی که از راه ارث به دست آید، ۳ـ به انسان ببخشند، ۴ـ جایزه بگیرد، ۵ـ عیدی بگیرد، ۶ـ مهریه<ref>. توضیح المسائل امام، م 1753. شماره 2 تا 4، اگر از مخارج سالش زیاد بیاید بعضی مراجع میفرمایند باید خمس بدهد.</ref>.<br/>
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| − | === پیآمدهای ندادن خمس ===
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| − | ۱ـ نمیتواند در آن مال تصرف کند، یعنی غذایی که در آن خمس باشد نمیتواند بخورد و با پولی که خمس آن را نداده نمیتواند چیزی بخرد، گرچه قصد دادن خمس را داشته باشد<ref>. توضیح المسائل، م 1790.</ref>.<br/>
| |
| − | ۲ـ اگر با پول خمس نداده خرید و فروش کند، (بدون اجازه حاکم شرع) ۵۱ آن معامله باطل است<ref>. مستفاد از همان. م 1760 برخی از مراجع معظم تقلید معامله را صحیح میدانند، هر چند پرداخت ضمن واجب است.</ref>.<br/>
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| − | ۳ـ اگر بخواهد پول خمس نداده به صاحب حمام بدهد و در حمام [[غسل]] کند، [[غسل]] او باطل است<ref>. همان، م 383. به نظر برخی از مراجع معظم تقلید هر چند کار حرامی است ولی [[غسل]] او باطل نیست. </ref>.<br/>
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| − | ۴ـ اگر با پولی که خمس آن را نداده است، خانه بخرد، [[نماز]] خواندن در آن خانه باطل است<ref>. توضیح المسائل، م 873، به نظر برخی از مراجع معظم تقلید، هر چند [[پرداخت خمس]] واجب است ولی [[نماز]] وی باطل نیست.</ref>.<br/>
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| − | === احکام خمس ===
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| − | ۱ـ اگر اثاثیهای که برای منزل خریده، از منفعت کسب و قبل از [[پرداخت خمس]] باشد و در بین سال نیازش از آن برطرف شود، واجب است خمس آن را بدهد. مثل آن که یخچال بزرگتری بخرد و به یخچال قبلی نیاز نداشته باشد<ref>. همان، م 1781، به نظر برخی از مراجع معظم تقلید، [[پرداخت خمس]] آن احتیاط مستحب است. </ref>.<br/>
| |
| − | ۲ـ آذوقهای که از درآمد سال برای مصرف سالش خریده، مانند برنج، روغن و چای اگر در آخر سال زیاد بیاید باید خمس آن را بدهد<ref>. همان، م 1780. </ref>.<br/>
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| − | سؤال: آیا کمک به فقرا و صدقه یا خرج کردن برای عزای امام حسین علیهالسلام به جای خمس حساب میشود؟<br/>
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| − | جواب: خیر.<br/>
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| − | سؤال: آیا مالیات به جای خمس حساب میشود؟<br/>
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| − | جواب: خیر<ref>. استفتائات امام، ج 1، بحث خمس س 200.</ref>.<br/>
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| − | الحمدالله رب العالمین.<br/>
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| − |
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| − | == خودآموز ==
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| − | ۱. این جمله از کیست؟ « کسی که برای خانوادهاش زحمت میکشد<br/>
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| − | مانند شخصی است که در راه خدا [[جهاد]] میکند».<br/>
| |
| − | الف) حضرت علی (ع) ب) حضرت رسول اکرم (ص)<br/>
| |
| − | ج) امام حسین (ع) د) هیچکدام <br/>
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| − | ۲. سخن « کسی که نیاز مؤمنی را برآورده سازد، مانند کسی است که یک عمر خدا را عبادت کرده است » از چه کسی است؟<br/>
| |
| − | الف) حضرت محمد (ص) ب) حضرت علی (ع)<br/>
| |
| − | ج) امام حسین (ع) د) هیچکدام <br/>
| |
| − | ۳. این سخن از کیست؟ « ای تجار، ابتدا مسائل فقهی مربوط به تجارت را بیاموزید، بعد به خرید و فروش مشغول شوید و سه مرتبه تکرار نمودند».<br/>
| |
| − | الف) حضرت علی (ع) ب) امام حسن عسکری (ع)<br/>
| |
| − | ج) امام حسین (ع) د) هیچکدام <br/>
| |
| − | ۴. گوشت حیوانات درنده چه حکمی دارد؟<br/>
| |
| − | الف) حرام است. ب) مکروه است.<br/>
| |
| − | ج) مستحب است. د) جایز است.<br/>
| |
| − | ۵. کدام گزینه صحیح نیست؟<br/>
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| − | الف) گوسفند و گاو و شتر حلال گوشت هستند.<br/>
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| − | ب) خوردن گوشت اسب، قاطر، الاغ و خرگوش مکروه است.<br/>
| |
| − | ج) خوردن گوشت حشرات حرام است.<br/>
| |
| − | د) تمام حیوانات درنده حرام گوشت هستند.<br/>
| |
| − | ۶. کدام پرونده خوردن گوشتش حلال است؟<br/>
| |
| − | الف) قمری وحشی ب) گنجشک<br/>
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| − | ج) عقاب د) هیچکدام <br/>
| |
| − | ۷. خوردن گوشت هُدهُد چه حکمی دارد؟<br/>
| |
| − | الف) حرام است. ب) بستگی به نظر مرجع تقلید دارد.<br/>
| |
| − | ج) مکروه است. د) حلال است.<br/>
| |
| − | ۸. ملخ جزو چه دستهای از جانداران و خوردن گوشت آن چه حکمی دارد؟<br/>
| |
| − | الف) جزو حشرات و حرام گوشت است.<br/>
| |
| − | ب) جزو حشرات و حلال گوشت است.<br/>
| |
| − | ج) جزو پرندگان و حلال گوشت است.<br/>
| |
| − | د) جزو پرندگان و حرام گوشت است.<br/>
| |
| − | ۹. راه شناخت پرندگان حلال گوشت و حرام گوشت چیست؟<br/>
| |
| − | الف) ذبح کردن پرندگان<br/>
| |
| − | ب) پرندهای که هنگام پرواز بال زدنش بیشتر باشد تا نگه داشتن بال حلال است.<br/>
| |
| − | ج) پروندهای که هنگام پرواز بال زدنش کمتر باشد تا نگه داشتن بال حلال است.<br/>
| |
| − | د) هیچکدام <br/>
| |
| − | ۱۰. اگر شک داریم که شیء سیاه رنگ در غذا دیده شده فضله موش است یا نه غذا چه حکمی دارد؟<br/>
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| − | الف) نجس و خوردن آن حرام است.<br/>
| |
| − | ب) مکروه است.<br/>
| |
| − | ج) در فرض شک، پاک است و تفحص لازم نیست.<br/>
| |
| − | د) هیچکدام <br/>
| |
| − | ۱۱. اگر برنج را تازه خیس کردهایم و فضله موش در آن دیده شده، راه پاک شدن دارد یا نه؟<br/>
| |
| − | الف) ندارد<br/>
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| − | ب) اگر آب نجس به باطن برنج نفوذ نکرده میشود آن را آب کشید.<br/>
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| − | ج) به خودی خود پاک است.<br/>
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| − | د) اگر رطوبت فضله به برنج نرسد میتوان را را آب کشی کرد.<br/>
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| − | ۱۲. حکم بچه مرده حیوان که از شکم حیوان زنده بیرون آمده، چیست؟<br/>
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| − | الف) خوردن آن جایز است. ب) خوردن آن حرام است.<br/>
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| − | ج) خوردن آن مکروه است. د) حکمی ندارد.<br/>
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| − | ۱۳. استفاده و فروش غذای مانده و فاسد در چه صورتی شرعاً حرام است؟<br/>
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| − | الف) در صورتیکه موجب ناراحتی مشخص شود.<br/>
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| − | ب) موجب ضرر جانی و مسمومیت شود.<br/>
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| − | ج) موجب عوارض و بیماریها گردد.<br/>
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| − | د) همه موارد<br/>
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| − | ۱۴. خوردن چیزهایی که طبیعت انسان از آنها بدش میآید چه حکمی دارد؟<br/>
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| − | الف) مکروه است. ب) حرام است.<br/>
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| − | ج) مباح است. د) حکم خاصی ندارد. <br/>
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| − | ۱۵. خوردن بعضی از غذاها مثل کالباس و سوسیس که پزشکان آن را مضر میدانند از لحاظ شرعی چگونه است؟<br/>
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| − | الف) اشکال ندارد.<br/>
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| − | ب) اگر به یقین بداند چه حرامی در آن نیست اشکالی ندارد.<br/>
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| − | ج) بلامانع است. د) هیچکدام <br/>
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| − | ۱۶. تقلب در فروش کاری ··· و در برخی از موارد ··· و سبب ··· معامله خواهد بود.<br/>
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| − | الف) حرام ـ باطل بودن ـ خلاف اخلاق<br/>
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| − | ب) باطل بودن ـ حرام ـ خلاف اخلاق <br/>
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| − | ج) خلاف اخلاق ـ باطل بودن ـ حرام <br/>
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| − | د) خلاف اخلاق ـ حرام ـ باطل بودن<br/>
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| − | ۱۷. احتکار یعنی:<br/>
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| − | الف) فروش جنس به ده برابر آن <br/>
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| − | ب) پنهان کردن جنس و عرضه نکردن به بازار با این هدف که به قیمت بالا بفروشیم.<br/>
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| − | ج) کم فروشی<br/>
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| − | د) هیچکدام <br/>
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| − | ۱۸. [[اسراف]] در لغت به چه معنا است؟<br/>
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| − | الف) به معنای زیادهروی و از هم گسیختگی <br/>
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| − | ب) به معنای اعتدال در مصرف<br/>
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| − | ج) به معنی تجاوز از حد و میانه روی <br/>
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| − | د) به معنا کم مصرف کردن<br/>
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| − | ۱۹. هدف از مختلط نشدن زن و مرد در مجالس عروسی چیست؟<br/>
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| − | الف) جلوگیری از مفاسد<br/>
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| − | ب) محدود کردن فعالیتهای اجتماعی زنان است.<br/>
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| − | ج) محدود کردن فعالیتهای اجتماعی زنان نیست و جلوگیری از مفاسد<br/>
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| − | د) هیچکدام <br/>
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| − | ۲۰. شنیدن صدای زنها اگر به قصد لذت باشد چه حکمی دارد؟<br/>
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| − | الف) حلال است. ب) حرام است.<br/>
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| − | ج) مکروه است. د) مانعی ندارد.<br/>
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| − | == پانویس ==
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| | <div class="return">بازگشت به [[مجموعه فقه و زندگی]] </div> | | <div class="return">بازگشت به [[مجموعه فقه و زندگی]] </div> |
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۳.۲.۱ الف. احکام نجاسات
۳.۲.۲ ب. راه ثابت شدن نجاست
۳.۲.۳ ج. نجاسات و مواد غذایی
۳.۲.۴ د. مردار
۳.۲.۶ ه. خون
۳.۲.۷ ز. سگ و خوک
۳.۲.۸ ح. کافر
۳.۲.۹ ط. شراب و فقاع
از نظر اسلام، همان گونه که دین راهنمای اندیشه، اخلاق و عبادت است، راهنمای انتخاب شغل و بایدها و نبایدها در قلمرو تولید، توزیع،مصرف،مدیریت و اقتصاد نیز هست. شناخت صنایع و مشاغل حلال و حرام ضرورت زندگی اسلامی است. مشاغل مختلف، صدها حکم واجب و مستحب و شرایط حقوقی و اخلاقی دارد که دانستن آن در سلامت روابط اجتماعی و تکامل اخلاقی و معنوی انسان اثر میگذارد. همچنین صدها حرام و مکروه دارد که انجام آن فضای زندگی جمعی و اسلامی را آلوده میسازد و ابهام آن دلهره و تردید میآفریند.
آشنایی با احکام ویژه هر صنف برای دست اندرکاران آن ضرورت حتمی و برای مراجعان به آن مشاغل نیاز قطعی و برای اهل مطالعه دانش اجتماعی و دینی مفید است.
طرح پژوهشی «فقه و زندگی» که با سفارش «ستاد احیاء امر به معروف و نهی از منکر» و نظارت علمی حجج اسلام محمدحسین فلاح زاده و محمود مهدی پور شکل گرفته، پاسخی است به نیازهای بشر در همه عرصههای زندگی. مجموعه حاضر نقطه پیوند «فقه» و «زندگی» است؛ که چگونگی تأمین معیشت حلال را به مسلمانان و صاحبان مشاغل گوناگون میآموزد و فقه را از تئوری به عمل نزدیک میسازد.
انتشارات نورالسجاد مفتخر است که با چاپ هفتمین شماره از این مجموعه، تداوم و تکمیل آن را بهعهده دارد و امیدوار است که همچنان از حمایتهای فکری و مالی ستاد احیای امر به معروف و نهی از منکر بهرهمند گردد. به امید آن که بتوانیم گامی هر چند کوچک در راستای ترویج احکام متعالی اسلام برداریم. انشاءالله.
خواهشمند است هر گونه نقد و نظر تجربی و علمی خود را جهت تکمیل این مجموعه با ما به نشانی قم ـ خ معلم ۱۶ متری عباس آباد، جنب مدرسه شهیدین، یا تلفن ۷۸۳۵۵۵۴ ـ۰۲۵۱ در میان بگذارید.
انه ولیٌ قدیر
انتشارات نورالسجاد